Pakistan का बड़ा खेल EXPOSE! शांति के नाम पर सौदा करने को इधर से उधर घूम रहे Shehbaz Sharif और Munir हुए बेनकाब

By नीरज कुमार दुबे | Apr 17, 2026

पाकिस्तान एक बार फिर अपनी कूटनीतिक चालों के जरिए वैश्विक मंच पर खुद को अहम साबित करने की कोशिश में लगा है, लेकिन इस बार उसकी मंशा पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच खुद को मध्यस्थ के रूप में प्रस्तुत करने वाला पाकिस्तान दरअसल अपनी गहरी आर्थिक बदहाली से उबरने के लिए इस पूरे खेल को अंजाम दे रहा है।

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देखा जाये तो अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता में पाकिस्तान की भूमिका अचानक से नहीं उभरी है। इस भूमिका के पीछे उसकी सोची समझी रणनीति है। इस्लामाबाद में हुई लंबी वार्ता, जिसमें कोई ठोस समझौता नहीं हुआ, उसके बावजूद पाकिस्तान इसे अपनी कूटनीतिक जीत के रूप में पेश कर रहा है। सेना प्रमुख आसिम मुनीर का दोनों पक्षों के बीच भरोसेमंद चेहरा बनना भी इसी रणनीति का हिस्सा है।

दूसरी ओर, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा मुनीर की खुलकर तारीफ करना और भविष्य में पाकिस्तान जाने की इच्छा जताना इस बात का संकेत है कि पाकिस्तान ने अमेरिका के साथ अपने संबंधों को नए सिरे से साधने की कोशिश की है। वहीं ईरान के नेताओं से मुनीर की मुलाकातें यह दिखाती हैं कि पाकिस्तान दोनों पक्षों के बीच पुल बनने की कोशिश कर रहा है। लेकिन असली कहानी इसके पीछे छिपी हुई है। पाकिस्तान जानता है कि अगर वह अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता को आगे बढ़ाने में सफल दिखता है, तो उसे वैश्विक वित्तीय संस्थाओं जैसे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक से राहत मिल सकती है। यही कारण है कि जहां एक ओर उसके वित्त मंत्री कर्ज के लिए गुहार लगा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उसके शीर्ष नेता वैश्विक मंचों पर सक्रिय होकर अपनी उपयोगिता साबित करने की कोशिश कर रहे हैं।

शहबाज शरीफ का सऊदी अरब, कतर और तुर्की दौरा भी इसी कूटनीतिक प्रयास का हिस्सा है। इन देशों के साथ बैठकों में सिर्फ शांति और सुरक्षा की बात नहीं हो रही, बल्कि परोक्ष रूप से आर्थिक सहयोग और निवेश की जमीन भी तैयार की जा रही है। कतर और सऊदी अरब जैसे देश ऊर्जा और वित्तीय ताकत रखते हैं, और पाकिस्तान इनसे मदद की उम्मीद लगाए बैठा है।

रणनीतिक दृष्टि से देखें तो पाकिस्तान की यह चाल कई स्तरों पर काम कर रही है। एक तो वह खुद को एक जिम्मेदार और प्रभावशाली देश के रूप में पेश कर रहा है। इसके अलावा, वह अमेरिका के साथ अपने संबंधों को मजबूत कर रहा है, जिससे उसे सैन्य और आर्थिक दोनों तरह का लाभ मिल सकता है। इसके अलावा, वह खाड़ी देशों से आर्थिक मदद हासिल करने की कोशिश कर रहा है। लेकिन इस पूरी कवायद में एक बड़ा जोखिम भी छिपा है। अगर अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता विफल होती है, तो पाकिस्तान पर गंभीर सवाल उठेंगे।

यहां यह भी ध्यान देने वाली बात है कि पाकिस्तान की सेना का इस पूरे खेल में प्रमुख भूमिका निभाना उसके लोकतांत्रिक ढांचे पर भी सवाल खड़ा करता है। आसिम मुनीर का तेजी से उभरना और उन्हें मिली व्यापक शक्तियां यह संकेत देती हैं कि पाकिस्तान में असली सत्ता कहां केंद्रित है। कुल मिलाकर देखें तो पाकिस्तान की यह कूटनीति दरअसल एक सुनियोजित रणनीति है। आर्थिक संकट से जूझता देश अब शांति वार्ता के मंच को अपने लिए आर्थिक जीवन रेखा बनाने में जुटा है। लेकिन यह रणनीति कितनी टिकाऊ होगी, यह आने वाला समय बताएगा।

बहरहाल, इतना जरूर कहा जा सकता है कि पाकिस्तान शांति का झंडा उठाकर अपने हित साधने में लगा है। यह मध्यस्थता कम और अवसरवाद ज्यादा नजर आता है। अगर वैश्विक शक्तियां इस खेल को समझ गईं, तो पाकिस्तान की यह चाल उसी पर भारी पड़ सकती है।

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