By अंकित सिंह | Apr 04, 2022
पांच राज्यों में करारी शिकस्त के बाद कांग्रेस विरोधियों के साथ-साथ अपनों के भी निशाने पर है। महाराष्ट्र में कांग्रेस के साझेदार शिवसेना ने तो यह तक कह दिया कि कांग्रेस की नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन में बदलाव की जरूरत है। इसके साथ ही शिवसेना ने ऐसे नेताओं के भी नाम दिए हैं जो कि यूपीए का नेतृत्व कर सकते हैं। कहीं ना कहीं, इसे शिवसेना का कांग्रेस पर निशाना बताया जा रहा है। हालांकि सवाल यह है कि महाराष्ट्र में कांग्रेस के साथ गठबंधन के बावजूद शिवसेना यूपीए में बदलाव क्यों चाहती है? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि महाराष्ट्र की राजनीति में एक साथ सरकार में होने के बावजूद शिवसेना और कांग्रेस के बीच कुछ ना कुछ विवाद होता रहता है। यही कारण है कि सरकार का नेतृत्व करने वाली शिवसेना असहज स्थिति में हो जाती है।
वर्तमान में देखें तो महाराष्ट्र में कांग्रेस के साथ शिवसेना और एनसीपी महा विकास आघाडी की सरकार में साझीदार है। एनसीपी और शिवसेना का महाराष्ट्र के बाहर कोई जनाधार नहीं है। बावजूद इसके वह दोनों कांग्रेस पर जबरदस्त तरीके से हमलावर रहते है। सवाल यह है कि अगर कांग्रेस यूपीए की कमान छोड़ देते हैं तो उसकी जगह कौन लेगा? क्योंकि कई पार्टियों के नेता यह मानते हैं कि वह फिलहाल यूपीए का अच्छा नेतृत्व कर सकते हैं। लेकिन इसके लिए फिलहाल एक नाम पर सहमति नहीं बन पा रही है और कांग्रेस यूपीए नेतृत्व को लेकर अब भी कायम है। वर्तमान में यूपीए का नेतृत्व सोनिया गांधी कर रही हैं। कुछ दिनों पहले शरद पवार से मुलाकात के बाद ममता बनर्जी ने यूपीए के अस्तित्व पर ही सवाल उठा दिया था। हालांकि राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि विपक्षी एकता को मजबूत रखने के लिए यूपीए का मजबूत होना बेहद जरूरी है। समय-समय पर इस बात की चर्चा होती रहती है कि यूपीए में बदलाव होंगे। लेकिन आज तक कुछ नहीं हो सकता है।
शिवसेना को लगता है कि यूपीए के मजबूत हुए बगैर विपक्ष का मजबूत होना मुमकिन नहीं है। यही कारण है कि शिवसेना के मुखपत्र सामना में ऐसे कई नेताओं के नाम लिए गए हैं जो कि यूपीए का नेतृत्व कर सकते हैं। सामना में कहा गया है कि उद्धव ठाकरे, ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल, चंद्रशेखर राव, शरद पवार और एमके स्टालिन इसका नेतृत्व कर सकते हैं। हालांकि यह सभी गैर कांग्रेसी हैं। लेकिन क्षेत्रीय नेता के तौर पर अधिक प्रभाव रखते हैं। लेकिन सवाल यही है कि क्या इन नेताओं के नाम पर सहमति बन पाएगी? यूपी के नेतृत्व में बदलाव को लेकर कांग्रेस को मनाना पड़ेगा। लेकिन कांग्रेस यूपीए के मालिकाना हक को लेकर फिलहाल नरम पड़ती दिखाई नहीं दे रही है।