Book Review: समाज की मानसिकता को सामने लाती लघुकथाएँ

By दीपक गिरकर | Apr 09, 2025

वरिष्ठ साहित्यकार और प्रसिद्ध नाटक “पर्दा उठने दो" के लेखक डॉ. सुरेश वशिष्ठ एक संवेदनशील लेखक हैं। हाल ही में इनका नया लघुकथा संग्रह "रंगे हुए सियार" प्रकाशित होकर आया है। डॉ. सुरेश वशिष्ठ के लेखन का सफ़र बहुत लंबा है। डॉ. सुरेश वशिष्ठ की प्रमुख रचनाओं में "पर्दा उठने दो", "बेला की पुकार", "सैलाबगंज का नुक्कड़, "रेत के ढेर पर", "अंधे शहर में", "सुनो दास्तान -1919", "एक अजेय योद्धा", "रंग बदलेगा जरूर !!", "नी हिन्द तेरी शान बदले" (नाटक), "खुरदुरी जमीन", "चली पिया के देस", "सिपाही की रस्म", "घेरती दीवारें", "नीर बहे", "बहती धारा", "प्रवाह पथ", "श्रृंगारण", "लोकताल", "रक्तचरित्र", "भुला नहीं सका हूँ", "अधूरी दास्तान", "निर्झर नीर", "सरवर  ताल", "मुझे बोलने दो", "अंधा संगीतज्ञ", "ताल मधुरम", "आधी डगर" (तीन खंड), "काले मेघ", "अँधेरे गलियारे" और "सूखे डबरा" (कथा संग्रह), "लावा", "मेवदंश" (उपन्यास), "नन्ही चिरैया और कलिकृत" (बाल उपन्यास), हिंदी नाटक और रंगमंच : ब्रटोल्ट ब्रेख्त का प्रभाव, कला रंग और लोक, हिंदी के लोकनाट्य (आलोचना), लघुकथा के सहयात्री और लघुकथा के हमराही (संपादन) शामिल हैं। इस संकलन में 60 लघुकथाएँ संकलित है। इस संग्रह की लघुकथाएँ मानवीय संवेदना से लबरेज हैं। इनकी लघुकथाएँ हमारे आसपास की हैं। इस संग्रह की रचनाएँ अपने आप में मुकम्मल और उद्देश्यपूर्ण लघुकथाएँ हैं और पाठकों को मानवीय संवेदनाओं के विविध रंगों से रूबरू करवाती है। लघुकथा एक कठिन विधा है। इसकी संरचना में कसावट का विशेष ध्यान रखना होता है। एक अतिरिक्त शब्द भी इसे कमजोर बना सकता है। डॉ. सुरेश वशिष्ठ की लघुकथाओं में कसावट है। डॉ. सुरेश वशिष्ठ हिन्दी भाषा के एक संवेदनशील लेखक हैं।

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"दाग" लघुकथा बहुत दिलचस्प और भावुक है। इसमें जोहरा की कहानी और उसके अतीत की चुप्प है। वह उस समय के बारे में बात करती है जब वह अपनी माँ-बाप से बिछुड़ गई थी और मौसी ने उसे अपनाया था। यह बताती है कि उसकी पहचान और अपने गाँव से जुड़ी कोई यादें नहीं हैं और उसकी मौसी ने उसे जोहरा नाम दिया। जोहरा के लिए यह एक तरह का आत्म-साक्षात्कार है, कि वह अपने असल रिश्तेदारों से कट चुकी है और उसकी पहचान अब उसके मौसी द्वारा बनाई गई है। इसके बाद, जोहरा की सहेली का बयान और भी अधिक दिल तोड़ने वाला हो जाता है जब वह यह बताती है कि अपने गाँव लौटने के बावजूद, उसके अम्मा-बापू और परिवार ने उसे पहचानने से इंकार कर दिया। जोहरा के सवाल "गाँव अगर याद होता तो चली न जाती मैं" भले ही जोहरा को अपने गाँव की यादें और पहचान मिल जाए, लेकिन उसका वहाँ लौटने का कोई मतलब नहीं है क्योंकि वहाँ उसे वह स्वीकार्यता और प्यार नहीं मिलेगा और तो और उसे कोई पहचानेगा भी नहीं। "लाशें" लघुकथा एक गहरी सामाजिक और मानसिक स्थिति को चित्रित कराती  है, जहाँ धार्मिक पहचान, सांस्कृतिक विश्वास और सामूहिक उन्माद एक जटिल परिस्थिति का रूप लेते हैं। गंगा स्नान जैसे पवित्र स्थल पर हुई भगदड़ और उसमें हुई मौतों के बीच, एक विधर्मी महिला का विलाप और उसकी पहचान पर उठे सवाल समाज में जातिवाद, धार्मिक भेदभाव और सांस्कृतिक असहिष्णुता को उजागर करते हैं। यहाँ पर जो दृश्य उपस्थित होता है, वह न केवल मानवीय करुणा का अभाव दिखाता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि हम अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक अस्मिता से इतनी जकड़े हुए होते हैं कि किसी व्यक्ति की मौत और उसके परिवार के दुःख को भी हम धर्म और जाति के दृष्टिकोण से देखने लगते हैं। इस दृश्य में यह पंक्तियाँ, "यह विधर्मी गंगातट पर क्या कर रहा था?" केवल एक सवाल नहीं हैं, बल्कि यह हमारे समाज की मानसिकता को स्पष्ट रूप से उजागर करती हैं, जो भेदभाव और असहिष्णुता से ग्रस्त है। यह लघुकथा यह भी दर्शाती है कि कैसे सामूहिक उन्माद और सामाजिक तनाव एक छोटी सी घटना को और भी गंभीर बना सकते हैं, जैसे कि उस भगदड़ के बाद और लाशों का उभरना, जो दिखाता है कि समाज किस हद तक अनियंत्रित और हिंसक हो सकता है जब वह अपनी सामूहिक पहचान और विश्वासों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हो जाता है। "फिक्रमंद" लघुकथा नशेड़ी युवाओं के दोहरे चेहरों को बेनकाब करती है। "इरादा" लघुकथा को पढ़ने के पश्चात मंजुल का सशक्त, स्पष्टवादी और गरिमामय व्यक्तित्व मन-मस्तिष्क पर छा जाता है। "पापिन" स्त्री विमर्श पर एक उत्कृष्ट लघुकथा है। "किसका घर" एक संवेदनशील और विचारणीय लघुकथा है।

"रंगे हुए सियार" एक बेहद गहरी और चिंता जनक सामाजिक और राजनीतिक स्थिति को उजागर करती लघुकथा है। इसमें गाँव में बाहरी लोगों के बसने के बाद के बदलावों को दिखाया गया है और किस तरह से एक सत्ता-प्रेरित व्यवस्था ने इन लोगों को सुविधाएं दीं, लेकिन इसके साथ ही समाज में अपराध और अव्यवस्था भी बढ़ती गई। लघुकथा में वर्णित बाहरी लोगों का आना और उनकी सुविधाओं के नाम पर उन्हें सत्ता से मिल रही विशेष सहूलतें एक बड़ी सामाजिक और राजनीतिक समस्या को जन्म देती हैं। यह उन ग्रामीण इलाकों में शक्ति का शोषण, असंतुलित समाज व्यवस्था और अपराधों को बढ़ावा देने की स्थिति को दर्शाता है, जब नेताओं के निजी लाभ के लिए लोकल निवासियों के अधिकारों और सुरक्षाओं को अनदेखा किया जाता है। पानी, बिजली और राशन कार्ड जैसी सुविधाओं का वितरण जब वोटबैंक के रूप में किया जाता है, तो यह उन लोगों के लिए एक तरह का व्यापार बन जाता है, जो बदले में राजनीतिक समर्थन प्राप्त करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। इसके परिणामस्वरूप गाँव में बढ़ते अपराध, चोरी, लूट, और महिलाओं के खिलाफ हिंसा की घटनाएं होती हैं और यह सब सत्ता के संरक्षण में हो रहा है। जब बच्ची के साथ कुकर्म की घटना होती है, तो यह सिर्फ उस समाज के अंदर व्याप्त भ्रष्टाचार, असुरक्षा और असमर्थता को ही नहीं दर्शाता, बल्कि यह भी दिखाता है कि जब सत्ता और राजनीति का खेल इस कदर समाज के लिए हानिकारक हो जाए, तो उन आम लोगों का क्या हाल होता है, जो इसके शिकार बनते हैं। सबसे चिंताजनक यह है कि बच्चों के लिए शिक्षा और राष्ट्रवाद की अवधारणा को लेकर इस गाँव में जो तनाव है, वह भी समाज के टूटते हुए बुनियादी ढांचे को दर्शाता है। राष्ट्रगीत को लेकर हंगामा और बच्चों के माता-पिता का विरोध यह बताता है कि इस समाज में बुनियादी असहमति और विघटन कितना गहरा हो चुका है। यह लघुकथा राजनीतिक पाखंड, सामाजिक ध्रुवीकरण और जातिवाद के मुद्दे पर बहुत स्पष्ट और तीखा सवाल उठाती है। यह दिखाती है कि जब राजनीति और वोटबैंक की राजनीति की खातिर, समाज की सुरक्षा, शांति और कल्याण को नजरअंदाज किया जाता है, तो उसका परिणाम कितनी खतरनाक स्थिति में बदल सकता है। "पत्थर बाज" लघुकथा में लेखक ने असली गुनाहगारों के चेहरों से मुखौटे उतारे हैं। "मिताली का मौन" डायरी के रूप में एक रोचक लघुकथा है। मिताली मौन है। मिताली अपने ससुराल नहीं जाना चाहती है क्योंकि मिताली का पति समलैंगिक है। "डुबकी" लघुकथा में डॉ. सुरेश वशिष्ठ बुजुर्ग जीवन की व्यथा को बखूबी उजागर करते हैं। "द्वेष" लघुकथा में लघुकथाकार पात्रों की संवेदनहीनता तथा व्यावहारिक प्रवृत्ति पर प्रकाश डालते हैं। "बहके कदम" लघुकथा अँजुरी की मजबूर मन: स्थिति का बखान करती है। संवाद कथाएँ यथार्थवादी जीवन का सटीक चित्रण है। इस संग्रह की अन्य लघुकथाएँ मन को छूकर उसके मर्म से पहचान करा जाती है। 

       

संवेदनात्मक स्तर पर ये लघुकथाएँ भीतर तक उद्वेलित करती हैं। हर लघुकथा खत्म होने के लंबे अंतराल तक ज़ेहन में अपना प्रभाव छोड़ती हैं। इस संग्रह की लघुकथाओं में जीवन और समाज के हर पक्ष को बड़ी बारीकी से देखा और परखा गया है। डॉ. सुरेश वशिष्ठ ने पात्रों के मानसिक धरातल को समझकर उनके मन की तह तक पहुँचकर लघुकथाओं का सृजन किया है। पाठक डॉ. सुरेश वशिष्ठ की लघुकथाओं को पढ़ना प्रारम्भ करता है तो एक बैठक में उन्हें पढ़कर ही सांस लेता है। लघुकथाओं के कथ्यों में विविधता हैं। ये लघुकथाएँ जीवन से सार्थक संवाद करती हैं। इस संग्रह की रचनाएँ वास्तविक यथार्थ को प्रस्तुत करती है। विषयवस्तु और विचारों में नयापन है। जीवन के अनेक तथ्य एवं सत्य इन लघुकथाओं में उद्भासित हुए हैं। लघुकथाकार की लघुकथाएँ समाज के ज्वलंत मुद्दों से मुठभेड़ करती है और उस समस्या का समाधान भी प्रस्तुत करती है। लघुकथाकार ने बहुत ही सटीकता से सामाजिक-पारिवारिक मूल्यों के ह्रास के प्रति चिंता व्यक्त की है। इस कृति की रचनाओं में गहरे मानवीय सरोकार तथा समाज के यथार्थ चित्र मिलते हैं। डॉ. सुरेश वशिष्ठ ने अनेक चेहरों से मुखौटे उतारे हैं। लेखक जीवन की विसंगतियों और जीवन के कच्चे चिठ्ठों को उद्घाटित करने में सफल हुए हैं। इस पुस्तक से लेखक की समाज के प्रति सकारात्मक सक्रियता दृष्टिगोचर होती है। इस संग्रह की लघुकथाएँ अपनी सार्थकता सिद्ध करती हैं। इनकी लघुकथाओं में व्याप्त स्वाभाविकता, सजीवता और मार्मिकता पाठकों के मन-मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव छोड़ने में सक्षम है। लेखक के इस संग्रह की लघुकथाएँ मानवीय संवेदनाओं और यथार्थ की भावभूमि पर खरी उतरती हैं। लघुकथाकार ने समाज के मार्मिक और ह्रदयस्पर्शी चित्रों को संवेदना के साथ उकेरा है। लेखक ने अपनी लघुकथाओं के माध्यम से समय के सच को अभिव्यक्त किया है। डॉ. सुरेश वशिष्ठ की रचनाओं की भाषा सहज, स्वाभाविक और सम्प्रेषणीय है। इस संग्रह की लघुकथाओं के शीर्षक कथानक के अनुसार है। 96 पृष्ठ का यह लघुकथा संग्रह आपको कई विषयों पर सोचने के लिए मजबूर कर देता है। आशा है प्रबुद्ध पाठकों में इस लघुकथा संग्रह का स्वागत होगा।

पुस्तक: रंगे हुए सियार (लघुकथा संग्रह)   

लेखक: डॉ. सुरेश वशिष्ठ     

प्रकाशक: प्रेम प्रकाशन मंदिर, 2/12, अंसारी रोड, दरियागंज, दिल्ली - 110002 

आईएसबीएन: 978-93-49518-11-7   

मूल्य: 200/- रूपए

- दीपक गिरकर

समीक्षक

28-सी, वैभव नगर, कनाडिया रोड,

इंदौर- 452016

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