शोकेस का टमाटर (व्यंग्य)

By डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ | Jul 10, 2023

किलो में बिकने वाला टमाटर कब कैरेट में बिकने लगा, इसका मुझे अनुमान भी न लगा। सड़क पर बिकने वाली चीज़ कब शोरूम का हिस्सा हो गई इसका पता लगाने तक मेरे बाल सफेद हो गए। फिर भी हिम्मत कर टमाटर के शोरूम पहुँचा। मानो टमाटर मुझे ताक रहा था और मैं उसे। खा न सका तो क्या हुआ जी भर के टमाटर को देख भी नहीं सकता क्या? वहाँ मुझे टमाटर के पास ज्यादा देर रूका देख सेल्समेन सहायता के लिये पास आया। उसने आते ही बताया कि ‘यह’ बहुत अच्छा टमाटर है। एक दम 24 कैरट। किसी हीरे से कम नहीं है। हमारे शोरूम पर हर टमाटर देखभाल कर, संतुष्ट होने के बाद ही रखा जाता है । कीमत थोड़ी ज्यादा है लेकिन गैरंटी देंगे। देखकर आपका पेट न भर जाए तो पैसे लौटा देंगे। साथ में एक स्क्रेच कार्ड भी है। स्क्रेच करेंगे तो गिफ्ट मिलेगा। एक महीने बाद शोरूम का अपना बंपर ड्रा होने जा रहा है। यदि अभी आप यह टमाटर खरीदते हैं तो उसमें आपको भाग लेने का मौका मिलेगा। पहला इनाम ऑडी कार है। पिछली बार यह इनाम आप जैसे ही किसी बंदे को खुला था। इसके अलावा शोरूम दो पास देगा जिससे आप और आपकी पत्नी दोनों तीन दिन और दो रातों के लिए थाईलैंड घूम सकते हैं। इतना टमाटरी व्याख्यान देने के बाद वह मुस्कराते हुए बोला- पैक करवा दूं सर?

‘‘पैक करवा दूं सर ?’’ इस बार कहते हुए उसने टमाटर को शोकेस से बाहर निकाला।

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‘‘नहीं-नहीं, अभी नहीं, मैं फिर कभी आऊँगा।’’ मैंने कहा। उसकी आंखें चमकीं, जैसे कुछ ताड़ लिया हो 

‘‘फिर कभी क्यों सर?..... क्या कैश खत्म हो गया है ?’’

‘‘हां ।‘‘

‘‘क्रेडिट कार्ड नहीं है ?’’ इस बार उसने ‘आप’ और ‘सर’ का इस्तेमाल नहीं किया।

‘‘तो फिर यहां क्या कर रहे हो?’’

‘‘क्यों भई ! बाजार है...... कोई भी आ सकता है .....’’

‘‘ बिना पैसे के बाजार में आना महापाप है..... समझे ...। ..... गार्ड ..... गार्ड ..... इधर आना ....’’

मैं कुछ कहूं इसके पहले गार्ड आ जाता है। ‘‘इनको गेट दिखाओ।’’ कह कर वह चला जाता है। मैं लौटता हूं। पीछे से आवाज सुनाई देती है ‘बड़ा चला था टमाटर के दीदार करने’।

- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’,

(हिंदी अकादमी, मुंबई से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

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