Gyan Ganga: श्रीराम ने श्रीजटाऊ जी को सम्मान देकर उनकी कीर्ति में अपार इजाफा किया

By सुखी भारती | Nov 28, 2023

गोस्वामी श्रीतुलसीदास जी सतसंग की महिमा का गान कर रहे हैं। विगत अंक में हमने देखा कि संसार में अगर कहीं भी किसी को भी कीर्ति की प्राप्ति होती है, तो इसके पीछे भी सतसंग का ही प्रभाव है। संसार में कौन ऐसा साधारण अथवा विशेष जन है, जिसे कीर्ति न भाति हो। लेकिन हमें चिंतन इस बात पर करना है, कि कीर्ति की वास्तविक परिभाषा क्या है? हम देखते हैं, कि इस जगत में जिसके पास जितना धन व संपदा होती है, उसकी उतनी ही कीर्ति मानी जाती है। अगर सचमुच ऐसा ही है, तो निश्चित ही हमारी चिंतन शक्ति में विवेक का अथाह अभाव है। कारण कि धन संपदा होने से ही अगर कीर्ति सिद्ध होती हो, तो शबरी के पास न तो कोई महल है, और न ही कोई राजपाट अथवा संपदा है। लेकिन तब भी संसार में जो कीर्ति शबरी की है, क्या वह किसी अन्य धनशाली अथवा बलशाली की है? कीर्ति जैसे महान शब्द को हम संपदा जैसे निम्न पदार्थ से जोड़ कर नहीं देख सकते।

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रावण का पुत्र मेघनाद भी कोई कम कीर्ति का स्वामी नहीं था। उस समय अकेला मेघनाद ही ऐसा था, जो स्वर्ग के राजा इन्द्र को हराने में सक्षम था। जिसके चलते उसे इन्द्रजीत के नाम से ख्याति मिली। वह ऐसे योद्धा था, जिसे कोई भी पराजित नहीं कर पा रहा था। क्या ऐसी कीर्ति किसी की देखी है? लेकिन तब भी उसके नाम से कोई अपनी संतान का नाम नहीं रखता।

दूसरी और जब हम जटाऊ जी का नाम लेते हैं, तो मन में एक श्रद्धा भाव उत्पन्न होता है। जटाऊ जी के संबंध में एक बात और चिंतन योग्य है, कि जटाऊ जी ने अपने जीवन में केवल एक बार ही युद्ध किया, और उसमें भी वे पराजित हो गए। जी हाँ, आपने ठीक समझा! जटाऊ जी ने रावण के साथ युद्ध किया था। जब रावण माता सीता जी का अपहरण करके ले जा रहा था, वे जटाऊ जी ही थे, जिन्होंने रावण को ललकारा था। जटाऊ जी ने रावण को दहाड़ते हुए कहा था, कि हे रावण! तुम माता सीता जी को तभी यहाँ से ले जा सकते हो, जब तुम मुझे युद्ध में परास्त करोगे। जटाऊ जी ने रावण को उस युद्ध में लगभग परास्त कर ही दिया था। लेकिन रावण ने वहाँ पर छल नीति का प्रयोग कर जटाऊ जी के पंख काट दिए।

संसार में अगर किसी व्यक्ति को आप हारा हुआ पायें, अथवा उसे चारों ओर से थक चुका हुआ देखें, तो उसके बारे में यही तो कहा जाता है, कि भाई वह तो अब किसी काम का नहीं रहा, उसके तो पंख ही कट चुके हैं। अब वह भला क्या करेगा? जिसके पंख ही कट चुके हों, उसका संसार में क्या सम्मान होगा? उसकी कीर्ति की तो कल्पना करना भी व्यर्थ है। लेकिन आप इस इतिहास से तो परिचित ही होंगे कि रावण उस युद्ध को जीता था और प्रभु का भक्त उस धर्म युद्ध को हार गया था। लेकिन तब भी रावण को उस युद्ध के प्रतिफल में कीर्ति से सुशोभित नहीं किया जाता। जबकि जटाऊ जी को उस युद्ध में पराजित होने पर भी, संपूर्ण जगत में सम्मान के साथ-साथ पूजा में भी सहभागी बनाया जाता है। श्रीराम कथाओं में उनकी वैसे ही कथा गाई जाती है, जैसे श्रीराम जी की गाई जाती है।

जटाऊ जी का परम सौभाग्य यहीं पर विराम नहीं लेता। हम जानते हैं कि राजा दशरथ जी ने सुमंत जी के माध्यम से, श्रीराम जी को बहुत मनवाया कि प्रभु श्रीराम जी वापिस अयोध्या लौट आयें, लेकिन श्रीराम जी वापिस नहीं लौटे। माना कि उस समय श्रीदशरथ जी जीवित थे, तो श्रीराम जी ने हठ कर लिया। लेकिन जब श्रीदशरथ जी की मृत्यु हो गई, तब तो उनका अधिकार बनता था कि वे अयोध्या लौट आते और अपने पिताश्री के अंतिम संस्कार में शामिल होकर, अपना पुत्र होने का कर्तव्य निभाते। लेकिन देखिए, श्रीराम जी ने यहाँ पुत्र होने का कोई कर्तव्य नहीं निभाया। किंतु जब जटाऊ जी अपनी देह का परित्याग करते हैं, तो श्रीराम एक पुत्र की भाँति जटाऊ जी का अंतिम संस्कार करते हैं। वेदों के अनुसार समस्त कर्म काण्ड करते हैं। श्रीराम जी ने श्रीजटाऊ जी को इतना सम्मान दिया, क्या इससे जटाऊ जी की कीर्ति नहीं बढ़ती?

इसके विपरीत रावण की अंतिम गति देख लीजिए। रावण कितनी ही देर तक तो रण भूमि में पड़ा सड़ता रहा। उसे कोई उठाने वाला नहीं था। होता भी कैसे? युद्ध में कोई जीवित ही नहीं बचा था। कितने ही समय के पश्चात रावण का अंतिम संस्कार हो सका। अब आप ही बताईये, अंतिम समय की दुर्गति के कारण रावण की कोई शौभा बनी? क्या इसमें आप रावण की कीर्ति को देखते हैं? निःसंदेह रावण की कीर्ति क्षण मात्र के लिए भी नहीं है।

गोस्वामी जी ने इसीलिए कहा है, कि संसार में अगर किसी ने भी, कहीं पर भी, अथवा कैसे भी कीर्ति को पाया है, तो वह सब सतसंग का ही प्रभाव है। आगे गोस्वामी जी क्या समझाते हैं, जानेंगे अगले अंक में---(क्रमशः)---जय श्रीराम।

- सुखी भारती

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