Shyama Prasad Mukherjee Birth Anniversary Special: वह ऐतिहासिक कहानी, जब उन्होंने 'आधा पंजाब और आधा बंगाल' भारत के लिए बचा लिया

By रेनू तिवारी | Jul 06, 2026

भारतीय जनसंघ के संस्थापक, प्रखर राष्ट्रवादी और महान शिक्षाविद् डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का भारतीय राजनीति और इतिहास में एक विशिष्ट स्थान है। आज 6 जुलाई का दिन देश के इतिहास में बेहद खास है, क्योंकि आज ही के दिन (6 जुलाई 1901) को कोलकाता में इस महान विभूति का जन्म हुआ था। उनकी जयंती के इस विशेष अवसर पर, आइए जानते हैं उनके जीवन से जुड़ी एक ऐसी ऐतिहासिक और प्रेरणादायक कहानी, जिसने भारत के भूगोल और अखंडता को हमेशा के लिए बदल दिया।

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को आज अधिकांश लोग कश्मीर के पूर्ण विलय के लिए उनके द्वारा किए गए संघर्ष के लिए याद करते हैं। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि यदि आज पश्चिम बंगाल और पंजाब भारत का हिस्सा हैं, तो इसके पीछे डॉ. मुखर्जी की अद्भुत दूरदर्शिता और अटूट इच्छाशक्ति थी। यह कहानी साल 1946-47 के विभाजन के उस दौर की है, जब भारत का भविष्य तय हो रहा था।

जिन्ना की पूरी बंगाल पर थी नजर

साल 1947 में जब लॉर्ड माउंटबेटन ने भारत के विभाजन की योजना (थ्री जून प्लान) सामने रखी, तो मुस्लिम लीग के नेता मोहम्मद अली जिन्ना की मांग थी कि पूरे बंगाल और पूरे पंजाब को पाकिस्तान में शामिल किया जाए।

उस समय बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री एच. एस. सुहरावर्दी और कुछ अन्य नेता मिलकर एक 'स्वतंत्र और संयुक्त बंगाल' (United Bengal) का प्रस्ताव ला रहे थे, जो न भारत का हिस्सा होता और न पाकिस्तान का। लेकिन डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी इस कूटनीतिक चाल को समझ गए थे। उन्हें आभास था कि एक बार बंगाल भारत से अलग हुआ, तो वहां रहने वाले लाखों हिंदुओं और अल्पसंख्यकों का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा और अंततः वह हिस्सा पाकिस्तान में मिला लिया जाएगा।

इसे भी पढ़ें: FIFA के ऐतिहासिक फैसले से Team USA को बड़ी जीत, स्टार स्ट्राइकर Folarin Balogun का Red Card रद्द

"आपने भारत का विभाजन किया, मैंने पाकिस्तान का विभाजन किया"

डॉ. मुखर्जी ने इस योजना के खिलाफ एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन छेड़ दिया। उन्होंने तर्क दिया कि यदि धर्म के आधार पर देश का विभाजन हो रहा है, तो मुस्लिम बहुल आबादी के आधार पर पूरे बंगाल को पाकिस्तान को नहीं सौंपा जा सकता। उन्होंने मांग की कि बंगाल के हिंदू बहुल क्षेत्रों (जैसे कोलकाता और असम से सटे इलाके) को भारत में ही रहना चाहिए।

उन्होंने कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व और ब्रिटिश हुकूमत पर इतना जबरदस्त राजनीतिक दबाव बनाया कि अंततः माउंटबेटन को बंगाल और पंजाब के विभाजन के फॉर्मूले को स्वीकार करना पड़ा। इस प्रकार, पश्चिम बंगाल और पूर्वी पंजाब भारत का अभिन्न हिस्सा बने।

इस ऐतिहासिक घटना के बाद डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जिन्ना को घेरते हुए एक बेहद प्रसिद्ध वाक्य कहा था:

"आपने (जिन्ना ने) धर्म के आधार पर भारत का विभाजन किया, लेकिन मैंने आपके बनाए पाकिस्तान का विभाजन कर दिया।"

सबसे युवा कुलपति से कैबिनेट मंत्री तक का सफर

डॉ. मुखर्जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। वे केवल एक राजनेता नहीं थे, बल्कि एक असाधारण शिक्षाविद् भी थे।

एक अनोखा रिकॉर्ड: मात्र 33 वर्ष की आयु में वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे युवा कुलपति (Vice-Chancellor) बने थे, जो अपने आप में एक कीर्तिमान है।

आजाद भारत के पहले उद्योग मंत्री: स्वतंत्रता के बाद, पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें अपनी पहली कैबिनेट में उद्योग और आपूर्ति मंत्री के रूप में शामिल किया। भारत की पहली औद्योगिक नीति (1948) उन्हीं के मार्गदर्शन में तैयार हुई थी।

चित्तरंजन लोकोमोटिव वर्क्स (रेल इंजन कारखाना), सिंदरी उर्वरक कारखाना और हिंदुस्तान एयरक्राफ्ट जैसी भारत की शुरुआती औद्योगिक बुनियाद की स्थापना में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा।

वैचारिक मतभेद और कैबिनेट से इस्तीफा

भले ही वे नेहरू सरकार में मंत्री थे, लेकिन जब देश के आत्मसम्मान और नागरिकों के अधिकारों की बात आई, तो उन्होंने पद का मोह नहीं किया। 1950 में जब पाकिस्तान में हिंदुओं पर अत्याचार बढ़े, तो नेहरू और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली के बीच 'नेहरू-लियाकत समझौता' हुआ।

डॉ. मुखर्जी इस समझौते के सख्त खिलाफ थे। उनका मानना था कि यह समझौता पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा करने में पूरी तरह विफल रहेगा। अपने सिद्धांतों से समझौता न करते हुए उन्होंने 6 अप्रैल 1950 को कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया और बाद में अक्टूबर 1951 में 'भारतीय जनसंघ' की स्थापना की, जो आज भारतीय जनता पार्टी (BJP) के रूप में दुनिया का सबसे बड़ा राजनीतिक दल है।

निष्कर्ष: अखंड भारत के पुरोधा

6 जुलाई को जब पूरा देश डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती के उपलक्ष्य में कार्यक्रमों का आयोजन कर रहा है, तब उनका जीवन हमें यह याद दिलाता है कि राष्ट्रहित से ऊपर कुछ भी नहीं होता। 'एक देश में दो निशान, दो प्रधान और दो विधान नहीं चलेंगे' का नारा देकर कश्मीर के लिए सर्वस्व न्योछावर करने वाले डॉ. मुखर्जी का जीवन देश की एकता और अखंडता की सबसे मजबूत गाथा है।

(नोट: यह लेख पूरी तरह से ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित और कॉपीराइट-मुक्त है, जिसका उपयोग रचनात्मक और शैक्षिक उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है।)

प्रमुख खबरें

Instagram पर आपत्तिजनक विज्ञापन बर्दाश्त नहीं, Meta को सरकार का 7 दिन का अल्टीमेटम

Petrol-Diesel पर खुशखबरी! OPEC+ ने बढ़ाया Oil Production, क्या अब घटेंगे फ्यूल के दाम?

Mumbai Rain IMD Warning | मुंबई में भारी बारिश का Red Alert! प्राइवेट कंपनियों को WFH की सलाह, सरकारी दफ्तरों में आधे दिन का काम

FIFA World Cup 2026 से Brazil का Shocking Exit, आंसुओं के साथ Neymar ने लिया संन्यास