Siddhivinayak Temple: भगवान गणेश को समर्पित है सिद्धिविनायक मंदिर, जानिए इस मंदिर की कहानी

By अनन्या मिश्रा | Jun 25, 2024

भारत देश में भगवान गणेश को समर्पित कई मंदिर हैं। वहीं भक्त भी भगवान गणेश का आशीर्वाद पाने के लिए इन मंदिरों में दर्शन के लिए पहुंचते हैं। ऐसा ही एक मंदिर सिद्धि विनायक मंदिर है। इस मंदिर के पीछे एक रोचक कहानी भी है। सिद्धि विनायक मंदिर गणेश चतुर्थी के दिन रोशनी से जगमगा उठता है।

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सिद्धि विनायक मंदिर से जुड़े रोचक तथ्य

मुंबई स्थित भगवान गणेश के इस मंदिर को अमीर मंदिर माना जाता है। क्योंकि यहां पर हर साल भक्तों के द्वारा इतना चढ़ावा आता है कि उतने में पूरी मुंबई नगरी को भरपेट खाना खिलाया जा सकता है। बता दें कि बॉलीवुड की फिल्मों के कारण यह मंदिर अधिक फेमस है। यह भगवान गणेश का सबसे फेमस व लोकप्रिय मंदिर है।

आपने देखा होगा कि श्रीगणेश की प्रतिमाओं की सूड़ दाईं ओर मुड़ी होती है। वह सिद्घपीठ से जुड़ी होती है और इनके मंदिर सिद्धिविनायक मंदिर कहलाते हैं। बताया जाता है कि सिद्धिविनायक की महिमा अपार है। वह अपने भक्तों की इच्छा को तुरंत पूरा कर देते हैं।

मान्यता के अनुसार, भगवान गणेश जल्दी प्रसन्न होते हैं और उतनी ही जल्दी कुपित भी होते हैं। चतुर्भुजी विग्रह सिद्धिविनायक की एक अन्य विशेषता यह भी है कि वह चतुर्भुजी विग्रह है। सिद्धिविनायक मंदिर में सिर्फ हिंदू ही नहीं बल्कि हर धर्म के लोग पूजा-अर्चना व दर्शन के लिए आते हैं।

सिद्धिविनायक मंदिर की कहानी

पौराणिक कथा के अनुसार, जब भगवान श्रीहरि विष्णु सृष्टि की रचना कर रहे थे, तब उनको नींद आ गई। उस दौरान श्रीहरि के कानों से दो राक्षस मधु और कैटभ उत्पन्न हुए। मधु-कैटभ देवताओं और ऋषियों पर अत्याचार करने लगे। राक्षसों के अत्याचार से परेशान होकर देवताओं और मुनियों ने श्रीहरि विष्णु की आराधना की और मधु-कैटभ का वध करने के लिए कहा। देवताओं की स्तुति के बाद भगवान विष्णु नींद से जागे और राक्षसों को मारने का प्रयास किया और असफल रहे।

तब श्रीहरि ने भगवान शिव-शंकर से सहायता मांगी। तब भगवान शिव ने विष्णु भगवान को बताया कि यह कार्य भगवान गणेश के बिना मधु-कैटभ का वध संभव नहीं है। फिर भगवान श्रीहरि विष्णु ने श्रीगणेश का आह्वान किया और गणेश जी ने दोनों राक्षसों का वध किया। मधु-कैटभ के वध के बाद भगवान श्रीहरि ने एक पर्वत पर मंदिर बनवाया और श्रीगणेश की स्थापना की। बाद में इस स्थान को सिद्धिटेक और मंदिर को सिद्धिविनायक मंदिर के नाम से जाना जाने लगा।

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