प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की साइप्रस यात्रा के मायने

By चेतनादित्य आलोक | Jun 17, 2025

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी साइप्रस, कनाडा और क्रोएशिया की अपनी अत्यंत महत्वपूर्ण यात्रा के पहले चरण में यूरोपीय संघ के सदस्य देश साइप्रस पहुंचे, जो भारत का पुराना मित्र भी है। राष्ट्रपति निकोस क्रिस्टोडुलाइड्स ने हवाई अड्डे पर पहुंचकर उनका जोरदार स्वागत किया। बाद में, उन्होंने पीएम मोदी को वहां के सर्वोच्च सम्मान से अलंकृत भी किया, जो भारत और साइप्रस के प्रगाढ़ होते संबंधों को दर्शाता है। पीएम मोदी की तीन देशों की इस यात्रा का प्रमुख उद्देश्य भारत के वैश्विक संबंधों को मजबूत करना, आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक सहयोग को बढ़ावा देना तथा वैश्विक दक्षिण (ग्लोबल साउथ) की प्राथमिकताओं को लेकर कूटनीतिक प्रयासों को और तेज करना है। देखा जाए तो उपर्युक्त तीन देशों में भी साइप्रस का भारत के लिए अत्यंत विशेष महत्व है। हालांकि, अब तक हमने इस ओर कम ही ध्यान दिया है। तभी तो, लगभग 22 वर्षों के बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने साइप्रस का आधिकारिक दौरा किया है। इससे पहले 1983 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने और 2002 में प्रधानमंत्री रहते अटल बिहारी वाजपेयी ने रिपब्लिक ऑफ साइप्रस की आधिकारिक यात्रा की थी। बहरहाल, पीएम मोदी के साइप्रस दौरे से दोनों देशों के संबंधों में आई मधुरता, एकजुटता और आपसी सहयोग की भावना आने वाले समय में तुर्कीए की नींद हराम करने वाली साबित होगी, इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए।

इसे भी पढ़ें: साइप्रस यात्रा के जरिए तुर्की को कूटनीतिक जवाब

आइएमईसी एक ऐसा व्यापारिक कॉरिडोर अथवा रास्ता है, जो भारत को मध्य-पूर्व के रास्ते यूरोप से जोड़ सकता है। यदि साइप्रस को इस कॉरिडोर में शामिल कर लिया जाए तो न केवल व्यापारिक गतिविधियों को आगे बढ़ाने, बल्कि तुर्कीए की अनपेक्षित हेकड़ी को बंद करने में भी सफलता मिल सकती है। दरअसल, इसी उद्देश्य से भारत ने हाल के वर्षों में तुर्कीए के तमाम विरोधी देशों, जिनमें ग्रीस, आर्मेनिया, मिस्र और साइप्रस के साथ अपने संबंधों को मजबूती प्रदान करने के प्रयास किए हैं। इस क्रम में ग्रीस, आर्मेनिया, और मिस्र के साथ मित्रता एवं व्यापारिक तथा सामरिक संबंधों को मजबूत करने के उद्देश्य से पीएम मोदी उन देशों के दौरे पहले ही कर चुके हैं। अब, उनकी यह साइप्रस यात्रा तुर्कीए को चारों तरफ से घेरने के भारत के रणनीतिक अभियान का ही एक हिस्सा प्रतीत होती है। वैसे, भारत के लिए साइप्रस की मित्रता हमेशा से बेहद महत्वपूर्ण रही है। बता दें कि संकट काल में साइप्रस ने हमेशा भारत का साथ दिया है, चाहे 1998 में भारत के परमाणु परीक्षण के बाद का समय हो, जब हम दुनिया में अलग-थलग पड़ने लगे थे या 2008 में भारत-अमेरिका परमाणु समझौते के समय अथवा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता के लिए वैश्विक समर्थन जुटाने का मामला हो। इसके अतिरिक्त, आतंकवाद और कश्मीर जैसे मुद्दों पर भी साइप्रस ने पाकिस्तान या तुर्कीए के बजाए हमेशा भारत का साथ दिया है।

वहीं, भारत भी हमेशा से साइप्रस की एकता और अखंडता का समर्थन करता रहा है, बल्कि भारत की तो यह मांग रही है कि साइप्रस का मुद्दा संयुक्त राष्ट्र के नियमों और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के अंतर्गत हल किया जाए। बता दें कि साइप्रस और तुर्कीए का संघर्ष 1974 से ही चला आ रहा है, जब ग्रीस के समर्थन से साइप्रस में तख्तापलट हुआ था, ताकि साइप्रस को ग्रीस के साथ मिलाया जा सके। यही वह समय था, जब तुर्कीए ने साइप्रस के उत्तरी हिस्से पर हमला कर उसे अपने कब्जे में ले लिया था, जिसके बाद से ही साइप्रस दो भागों में बंटा हुआ है। साइप्रस का दक्षिणी भाग ‘ग्रीक साइप्रियट्स’ अथवा ‘रिपब्लिक ऑफ साइप्रस’ कहलाता है, जिसे विश्व भर के देशों से मान्यता मिली हुई है। वहीं, इसका उत्तरी भाग ‘तुर्की साइप्रियट्स’ के नाम से जाना जाता है। इसे तुर्कीए ने ‘तुर्की रिपब्लिक ऑफ नॉर्दर्न साइप्रस’ घोषित किया हुआ है, लेकिन इसे अंतर्राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त नहीं है। तुर्कीए ने उत्तरी साइप्रस में अपनी सेना तैनात कर रखी है और समय-समय पर वहां की समुद्री सीमाओं पर भी अतिक्रमण करने का प्रयास करता रहता है। गौरतलब है कि साइप्रस की धरती में 12-15 ट्रिलियन क्यूबिक फीट प्राकृतिक गैस का भंडार मौजूद है, जिस पर तुर्कीए कब्जा करना चाहता है। इतना ही नहीं, तुर्कीए के हस्तक्षेप के कारण साइप्रस को अपनी ही गैस को निर्यात करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

यहां तक कि तुर्कीए साइप्रस के समुद्री क्षेत्र में अपने जहाज भेजकर गैस खोजने की कोशिशें भी कर चुका है, जिससे साइप्रस, ग्रीस और यूरोपीय संघ के साथ उसका तनाव बढ़ने की खबरें भी आती रही हैं। दरअसल, तुर्कीए का मानना है कि साइप्रस जैसे छोटे-से द्वीप को इतना बड़ा समुद्री क्षेत्र (ईईजेड) नहीं मिलना चाहिए। तुर्कीए के ये तमाम प्रयास ईईजेड से संबद्ध अंतरराष्ट्रीय कानूनों के खिलाफ हैं। जाहिर है कि यदि भारत साइप्रस के साथ संस्कृति, ऊर्जा, व्यापार या बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाता है, तो यह तुर्कीए के लिए बहुत बड़ा झटका साबित हो सकता है। वहीं, तुर्कीए की चतुर्दिक घेराबंदी और साइप्रस के साथ बढ़ते सहयोग एवं घनिष्ठता भारत की बढ़ती वैश्विक शक्ति एवं क्षमता का प्रतीक है।

− चेतनादित्य आलोक, 

वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार, स्तंभकार, आध्यात्मिक चिंतक एवं वास्तु ज्ञाता, रांची, झारखंड

प्रमुख खबरें

Shamar Joseph का पंजा, Rutherford की फिफ्टी, West Indies ने श्रीलंका से 2-1 से जीती T20 सीरीज

Mercedes S-Class Hybrid की भारत में धमाकेदार एंट्री, कीमत 2.20 करोड़, जानें दमदार Features

Salesforce ने खेला AI पर बड़ा दांव, Fin के अधिग्रहण से Agentforce Platform होगा और भी स्मार्ट।

England vs New Zealand: जोफ्रा आर्चर की वापसी से मजबूत हुई टीम, दो खिलाड़ी करेंगे Test डेब्यू