By कमलेश पांडे | Sep 03, 2026
उत्तरप्रदेश की आध्यात्मिक राजधानी अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण भारतीय राजनीति के सबसे लंबे और निर्णायक अध्यायों में से एक रहा है। इस मंदिर आंदोलन ने भारतीय राजनीति की दिशा बदली, भाजपा को राष्ट्रीय सत्ता के केंद्र तक पहुंचाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई और अंततः 22 जनवरी 2024 को रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा के साथ आंदोलन का सबसे बड़ा प्रतीकात्मक लक्ष्य पूरा हुआ।
मसलन, लगभग 5,585 आवेदनों में से बहुस्तरीय चयन प्रक्रिया के बाद तीन नामों के पैनल में से उनका चयन हुआ। मिश्र अप्रैल 2026 में भारतीय वायुसेना के पश्चिमी वायु कमान के प्रमुख पद से सेवानिवृत्त हुए थे और ऑपरेशन सिंदूर के दौरान उनकी भूमिका के कारण राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित रहे। सवाल इसलिए बड़ा है कि राम मंदिर जैसे धार्मिक-सांस्कृतिक संस्थान का CEO एक पूर्व शीर्ष सैन्य कमांडर ही क्यों? और उससे भी बड़ा सवाल यह कि क्या यह सिर्फ प्रशासनिक नियुक्ति है या अयोध्या के लिए तैयार किए जा रहे किसी बड़े संस्थागत मॉडल का संकेत?
मेरे अनुभवजन्य आकलन में इसके कम-से-कम सात बड़े प्रशासनिक व सियासी संदेश हैं, जो इसप्रकार हैं:-
पहला, राम मंदिर अब ‘आंदोलन’ नहीं, ‘सुव्यवस्थित संस्थान’ है: राम मंदिर आंदोलन के समय सबसे बड़ी आवश्यकता राजनीतिक-सामाजिक लामबंदी की थी, जबकि मंदिर निर्माण के बाद आवश्यकता बदल गई है। अब करोड़ों श्रद्धालुओं की व्यवस्था, दर्शन प्रणाली, सुरक्षा, दान, वित्त, कर्मचारियों, तकनीक, निर्माण, यातायात और अंतरराष्ट्रीय धार्मिक पर्यटन का प्रबंधन करना है। इसलिए CEO की नियुक्ति मूलतः इस बात की घोषणा है कि राम मंदिर अब केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि एक विशाल संस्थागत व्यवस्था है। खासकर यह परिवर्तन भाजपा और संघ परिवार के लिए भी महत्वपूर्ण है। जिस राम मंदिर ने राजनीतिक आंदोलन को ऊर्जा दी, वही मंदिर अब शासन और प्रशासन की क्षमता की परीक्षा का केंद्र बनने जा रहा है।
दूसरा, ‘संत-आधारित प्रबंधन’ से ‘प्रोफेशनल मैनेजमेंट’ की ओर अग्रसर है: राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की मूल प्रकृति धार्मिक-सामाजिक है। लेकिन मंदिर के बढ़ते आकार और महत्व के साथ केवल पारंपरिक न्यास व्यवस्था पर्याप्त नहीं रह सकती। शायद CEO का पद बनाना इसी बदलाव का संकेत है। और CEO के लिए पूर्व एयर मार्शल का चयन और भी स्पष्ट संदेश देता है कि- संस्था को अब कॉरपोरेट-जैसी प्रशासनिक दक्षता, सैन्य-जैसी अनुशासनात्मक क्षमता और आधुनिक प्रबंधन की आवश्यकता महसूस हो रही है। मिश्र के चयन की प्रक्रिया भी असाधारण थी—5,585 आवेदन, 1,580 योग्य/उपयुक्त उम्मीदवार, 108 ऑनलाइन इंटरैक्शन, 16 आमने-सामने के उम्मीदवार और अंततः तीन नामों का पैनल। चयन समिति ने नेतृत्व, प्रबंधन अनुभव, ईमानदारी और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय महत्व की संस्था को संचालित करने की दृष्टि जैसे पहलुओं का मूल्यांकन किया। अर्थात संदेश साफ है कि अब राम मंदिर के प्रशासन में ‘कौन है?’ से ज्यादा महत्वपूर्ण ‘क्या कर सकता है?’ होने जा रहा है।
तीसरा, ऑपरेशन सिंदूर से अयोध्या तक ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ से ‘राष्ट्रीय संस्कृति’ का सेतु है यह निर्णय: जितेंद्र मिश्र की नियुक्ति का सबसे प्रतीकात्मक पक्ष यही है कि जिस अधिकारी ने पश्चिमी वायु कमान का नेतृत्व किया और ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सैन्य अभियानों की कमान से जुड़े रहे, वही अब राम मंदिर के प्रशासन का नेतृत्व करेंगे। उन्हें सर्वोत्तम युद्ध सेवा पदक से भी सम्मानित किया गया है। इसका अर्थ निकालने में सावधानी जरूरी है। यह कहना जल्दबाजी होगी कि सरकार या ट्रस्ट ने जानबूझकर ‘राष्ट्रीय सुरक्षा मॉडल’ को मंदिर प्रशासन में उतारने का निर्णय लिया है। लेकिन प्रतीकात्मक अर्थ को नकारना भी मुश्किल है। सीमा की रक्षा करने वाले सैन्य कमांडर से लेकर देश की सांस्कृतिक अस्मिता के सबसे बड़े प्रतीक के प्रबंधन तक की यात्रा— अपने आप में एक शक्तिशाली राजनीतिक प्रतीक है। यह संदेश भी पढ़ा जा सकता है कि अयोध्या को अब केवल धार्मिक नगर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय महत्व के सांस्कृतिक-सुरक्षा परिसर के रूप में विकसित करने की तैयारी है।
चौथा, चढ़ावा विवाद के बाद ‘विश्वास’ की पुनर्स्थापना होगी: इस नियुक्ति के समय को सबसे अधिक गंभीरता से देखना होगा। राम मंदिर के चढ़ावे से जुड़े कथित वित्तीय अनियमितता मामले में गिरफ्तारियां हुईं और ट्रस्ट के प्रशासन पर सवाल उठे। हालिया ट्रस्ट बैठक में चढ़ावे की गिनती में मानवीय हस्तक्षेप घटाने के लिए तकनीक आधारित प्रणाली पर भी विचार किया गया। IIT और बैंकों से प्रस्ताव लिए जाने की खबर है। ऐसे समय में एक अत्यंत वरिष्ठ, गैर-राजनीतिक और अनुशासनप्रिय सैन्य अधिकारी को CEO बनाना एक महत्वपूर्ण संदेश देता है कि अब मंदिर प्रशासन में विश्वास केवल धार्मिक प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि संस्थागत पारदर्शिता से भी अर्जित करना होगा। लेकिन यहां राजनीतिक ईमानदारी जरूरी है। मिश्र की नियुक्ति को सीधे चढ़ावा विवाद का परिणाम कहना उपलब्ध तथ्यों से सिद्ध नहीं है। CEO चयन की प्रक्रिया जुलाई में शुरू हो चुकी थी और लगभग दो महीने चली। फिर भी दोनों घटनाओं का समय एक साथ आने से यह स्पष्ट है कि ट्रस्ट अपने प्रशासनिक ढांचे को अधिक मजबूत और जवाबदेह बनाने की दिशा में बढ़ रहा है।
पांचवां, क्या RSS-BJP-VHP की पारंपरिक भूमिका बदल रही है?: यही वह सवाल है जिस पर सबसे ज्यादा राजनीतिक बहस होगी। राम मंदिर आंदोलन की राजनीतिक-सामाजिक धुरी में भाजपा के साथ RSS और विश्व हिंदू परिषद की भूमिका ऐतिहासिक रही है। अब जब मंदिर का संचालन एक पूर्व एयर मार्शल को सौंपा जा रहा है, तो क्या इसका अर्थ है कि पुराने राजनीतिक-सामाजिक नेटवर्क पर भरोसा कम हो रहा है? कांग्रेस नेता भूपेश बघेल ने इसी दिशा में राजनीतिक आरोप लगाया है कि भाजपा-RSS से जुड़े लोगों पर भरोसा कम होने के कारण सेना के अधिकारी को जिम्मेदारी दी गई। लेकिन इस आरोप को तथ्य नहीं, राजनीतिक व्याख्या के रूप में देखना चाहिए। दूसरी व्याख्या ज्यादा व्यावहारिक हो सकती है। वह यह कि RSS और VHP आंदोलन चला सकते हैं, वैचारिक-सामाजिक आधार दे सकते हैं, लेकिन प्रतिदिन लाखों श्रद्धालुओं, हजारों कर्मचारियों, वित्तीय प्रणालियों, तकनीकी ढांचे और सुरक्षा-समन्वय को चलाने के लिए अलग तरह की विशेषज्ञता चाहिए। इसलिए संभव है कि यह RSS/BJP से दूरी नहीं, बल्कि कार्य-विभाजन का नया चरण हो।
छठा, मोदी मॉडल के बाद अब ‘अयोध्या मॉडल’ की परीक्षा का वक्त: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनीतिक विमर्श में राम मंदिर केवल धार्मिक मुद्दा नहीं रहा; वह सांस्कृतिक पुनर्जागरण, विरासत और विकास की राजनीति से भी जुड़ा रहा है। अब अयोध्या को विश्वस्तरीय धार्मिक-सांस्कृतिक शहर बनाने की चुनौती सामने है। यही वह जगह है जहां ‘अयोध्या मॉडल’ की परीक्षा होगी। क्या अयोध्या विश्वस्तरीय तीर्थ व्यवस्था बना पाएगी? वह करोड़ों श्रद्धालुओं को सुरक्षित दर्शन करा पाएगी? वह दान और वित्तीय व्यवस्था में पारदर्शिता स्थापित करेगी? वह स्थानीय नागरिकों के हितों की रक्षा करेगी? वह धार्मिक पर्यटन से रोजगार पैदा करेगी? वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की सांस्कृतिक छवि मजबूत करेगी? अगर इन सवालों का उत्तर सकारात्मक मिलता है तो राम मंदिर भाजपा के लिए केवल राजनीतिक प्रतीक नहीं रहेगा। वह प्रशासनिक सफलता का मॉडल भी बन सकता है।
सातवां, 2027 की उत्तर प्रदेश राजनीति में अयोध्या का नया अर्थ कैसे समझाया जाएगा: यह सबसे बड़ा संदेश है, क्योंकि उत्तर प्रदेश में 2027 का विधानसभा चुनाव सामने है। ऐसे समय में अयोध्या का राजनीतिक महत्व कम नहीं हुआ है, बल्कि उसकी प्रकृति बदल गई है। 2017 और 2022 की राजनीति में राम मंदिर मुख्यतः निर्माण और आस्था के सवाल से जुड़ा था। हालांकि, अब सवाल बदल गया है—वह यह कि राम मंदिर बनने के बाद अयोध्या कैसी बनी? यही प्रश्न 2027 के राजनीतिक विमर्श में महत्वपूर्ण हो सकता है। अगर अयोध्या में विश्वस्तरीय सुविधाएं, रोजगार, पर्यटन, बेहतर परिवहन और सुरक्षित तीर्थ व्यवस्था दिखाई देती है तो भाजपा इसे अपने विकास और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के संयुक्त मॉडल के रूप में प्रस्तुत कर सकती है। लेकिन यदि स्थानीय विस्थापन, महंगाई, यातायात, भीड़, पर्यावरण, प्रशासनिक भ्रष्टाचार या वित्तीय विवाद जैसे मुद्दे उभरते हैं तो विपक्ष को नया राजनीतिक हथियार मिल सकता है। इसलिए CEO की नियुक्ति का अप्रत्यक्ष चुनावी अर्थ भी है। अब राम मंदिर केवल भाजपा की वैचारिक पूंजी नहीं, बल्कि उसका प्रशासनिक प्रदर्शन भी राजनीतिक पूंजी बन सकता है।
आठवां, ट्रस्ट का सामूहिक पुनर्गठन: गत 2 सितंबर की बैठक में केवल CEO नियुक्त नहीं किया गया, बल्कि तीन नए ट्रस्टियों—महेश भगचंदका, मदन मोहन पांडेय और निर्मला यादव—की नियुक्ति भी हुई। सबकी प्रमुख जिम्मेदारियों में फेरबदल हुआ और वित्तीय मामलों तथा दान प्रबंधन को लेकर भी महत्वपूर्ण फैसले किए गए। इसलिए इसे किसी एक पद की नियुक्ति कहना उचित नहीं होगा। यह राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के दूसरे चरण के पुनर्गठन जैसा दिखाई देता है। पहला चरण था—मंदिर निर्माण, और दूसरा चरण है—मंदिर संचालन। और तीसरा चरण संभवतः होगा—अयोध्या को वैश्विक धार्मिक-सांस्कृतिक केंद्र बनाना। और जितेंद्र मिश्र इसी दूसरे चरण के प्रमुख प्रशासक बनने जा रहे हैं।
नौवां, मोदी, RSS और योगी के लिए इन नियुक्तियों के अलग-अलग अर्थ: देखा जाए तो इन महत्वपूर्ण नियुक्तियों के मोदी, RSS और योगी—तीनों के लिए अलग-अलग अर्थ हैं, जिसके दृष्टिगत इस नियुक्ति को तीन राजनीतिक स्तरों पर पढ़ा जा सकता है। जहां मोदी के लिए यह प्रशासनिक दक्षता और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को जोड़ने का अवसर है। वहीं, RSS के लिए यह आंदोलन की वैचारिक सफलता के बाद संस्था को टिकाऊ और पेशेवर बनाने की चुनौती है। वहीं, उत्तर प्रदेश सरकार के लिए यह अयोध्या को केवल धार्मिक नगर नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े पर्यटन और सांस्कृतिक-आर्थिक केंद्रों में बदलने की परीक्षा है। और यहीं पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
दसवां, ट्रस्ट स्वतंत्र धार्मिक न्यास है, उसका CEO सीधे राज्य सरकार का अधिकारी नहीं है: अब भले ही ट्रस्ट स्वतंत्र धार्मिक न्यास है और उसका CEO सीधे राज्य सरकार का अधिकारी नहीं है। इसलिए दोनों के बीच अधिकार-क्षेत्र अलग हैं। लेकिन अयोध्या की सड़क, परिवहन, पुलिस, कानून-व्यवस्था, नगर विकास, पर्यटन और नागरिक सुविधाएं राज्य सरकार से जुड़ी हैं। इसलिए CEO और उत्तर प्रदेश प्रशासन के बीच समन्वय अयोध्या मॉडल की सफलता की निर्णायक शर्त होगा।
ग्यारहवां, राम मंदिर आंदोलन व मंदिर निर्माण मुहिम की असली परीक्षा अब हुई शुरू : कहना न होगा कि जिस राम मंदिर आंदोलन ने भारतीय राजनीति को बदल दिया और मंदिर निर्माण ने आंदोलन को ऐतिहासिक उपलब्धि में बदला, उसकी असली परीक्षा अब शुरू हुई है। क्योंकि प्रशासन इस उपलब्धि को संस्थागत स्थायित्व में बदलने की कोशिश कर रहा है। एयर मार्शल जितेंद्र मिश्र की नियुक्ति इसी परिवर्तन का सबसे बड़ा संकेत है। लेकिन उनकी सैन्य वर्दी की चमक से ज्यादा महत्वपूर्ण होगा उनका प्रशासनिक परिणाम। वह यह कि वे कितनी पारदर्शिता ला पाते हैं? दान व्यवस्था कितनी विश्वसनीय बनती है?श्रद्धालुओं को कितनी बेहतर सुविधाएं मिलती हैं? स्थानीय लोगों को अयोध्या के विकास में कितना हिस्सा मिलता है? ट्रस्ट कितना स्वायत्त और जवाबदेह रहता है?
अंततोगत्वा, महत्वपूर्ण संदेश यह कि क्या राम मंदिर की भव्यता के साथ उसकी प्रशासनिक विश्वसनीयता भी उतनी ही भव्य बन पाएगी? यही वह प्रश्न है जो आने वाले वर्षों में राम मंदिर की राजनीतिक विरासत तय करेगा। क्योंकि अब राम मंदिर का सवाल केवल यह नहीं है कि “रामलला का मंदिर कितना भव्य है?” बल्कि मौलिक सवाल यह है कि “रामलला के मंदिर की व्यवस्था कितनी आदर्श है?” और शायद यही कारण है कि एक पूर्व एयर मार्शल को मंदिर का पहला CEO बनाया गया है। राम मंदिर आंदोलन ने सत्ता को बदलने का काम किया था; अब राम मंदिर का प्रशासन यह तय करेगा कि वह भारतीय संस्थागत संस्कृति को कितना बदल पाता है। यहीं से अयोध्या की राजनीति का अगला अध्याय शुरू होता है।
- कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक