अमेरिका के लिए ईरान से अहम ये छोटा देश, शांतिवार्ता छोड़ जहां प्रचार करने पहुंचे वेंस, इस चुनाव पर रूस-EU दोनों की नजर

By अभिनय आकाश | Apr 09, 2026

अमेरिका के उपराष्ट्रपति जे डी वांस हंगरी पहुंचे हैं, जहां जल्द ही बड़ा चुनाव होने वाला है। वे वहां के प्रधानमंत्री विक्टर ऑर्बान का समर्थन करने गए हैं। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनकी टीम चाहते हैं कि ऑर्बान चुनाव क्योंकि वे उनकी सोच, राष्ट्रवाद, सख्त इमीग्रेशन  और पारंपरिक मूल्यों के करीब है। विक्टर ऑर्बान, ने 2010 से सत्ता में है और मजबूत नेता माने जाते है। पीटर माज्यार, जो पहले ऑर्बान के करीबी थे, पर अब उनके खिलाफ खड़े हैं। मैग्यार के मुद्दे पर जनका का समर्थन जुटा रहे हैं। हंगरी का चुनाव न केवल उस देश के लिए, बल्कि पूरे यूरोप और वैश्विक राजनीति के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बान की नीतियों के कारण हंगरी का यूरोपीय संघ (EU) के साथ अक्सर टकराव रहता है। उन पर लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने का आरोप है, जिसकी वजह से EU ने हंगरी की अरबों डॉलर की फंडिंग रोक दी है। यदि चुनाव के बाद वहां सत्ता परिवर्तन होता है, तो हंगरी और यूरोप के संबंधों में नई गर्माहट आ सकती है और रुकी हुई आर्थिक मदद मिलने का रास्ता साफ हो सकता है, जिससे पूरे यूरोप की एकता मजबूत होगी।

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नाटो और ईयू दोनों का सदस्य है हंगरी

रूस-यूक्रेन युद्ध के नजरिए से भी यह चुनाव काफी अहमियत रखता है। हंगरी, जो कि नाटो और ईयू दोनों का सदस्य है, ओर्बान के नेतृत्व में रूस के प्रति थोड़ा नरम रुख अपनाता रहा है। उन्होंने कई बार यूक्रेन को दी जाने वाली सैन्य मदद और रूस पर लगाए जाने वाले प्रतिबंधों में अड़ंगा डाला है। ऐसे में चुनाव का परिणाम यह तय करेगा कि भविष्य में यूक्रेन को मिलने वाली यूरोपीय मदद कितनी आसान होगी। अगर नई सरकार आती है, तो हंगरी का झुकाव पूरी तरह पश्चिम की ओर हो सकता है, जो रूस के लिए एक कूटनीतिक झटका होगा।

ट्रंप क्यों चाहते है ऑर्वान जीतें?

टूप और उनकी टीम मानती है कि ऑर्बान ने एक ऐसा मॉडल बनाया है जिसमें मजबूत नेता, कम इमिग्रेशन और 'नेशनलिस्ट' सोच होती है। वे चाहते हैं कि यूरोप मे ऐसे ही और नेता आएँ। इसलिए अमेरिका (ट्रंप के प्रभाव वाला पक्ष) ऑर्बान को जिताना चाहता है।

ऑर्वाच की जीत में रूस

रूस भी चाहता है कि ऑर्बान सत्ता में रहे, क्योंकि वे रूस के खिलाफ कड़े कदम (जैसे पाबंदिया) रोकते रहे है। यूक्रेन को मिलने वाली मदद में अड़चन डालते है। रूस के लिए ऑर्बान यूरोप के अंदर एक मजबूत साथी है। वैश्विक स्तर पर हंगरी की राजनीति अब अमेरिका और रूस जैसी बड़ी शक्तियों के बीच शक्ति संतुलन का केंद्र बन गई है। एक तरफ जहां रूस और चीन हंगरी के जरिए यूरोप में अपना प्रभाव बनाए रखना चाहते हैं, वहीं अमेरिका और उसके सहयोगी चाहते हैं कि हंगरी पूरी तरह से लोकतांत्रिक मूल्यों और पश्चिमी गठबंधन का साथ दे। सरल शब्दों में कहें तो, इस चुनाव का नतीजा केवल हंगरी की किस्मत नहीं बदलेगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि यूरोप की सुरक्षा और कूटनीति में रूस का हस्तक्षेप कितना कम या ज्यादा होगा।

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यूक्रेन और यूरोप क्या चाहते है?

यूक्रेन चाहता है कि ऑर्बान हारे, क्योकि वे उसके खिलाफ बोलते रहे है। यूरोपियन यूनियन (EU) भी उनसे परेशान है, क्योंकि ऑर्बान कई फैसलों में रुकावट डालते है। अगर माज्यार जीतते है, तो ईयू और यूक्रेन को राहत मिलेगी।

चुनाव में तनाव क्यों है?

जासूसी और लीक के आरोप लग रहे है गैस पाइपलाइन के पास विस्फोट जैसी घटनाएं हुई है सरकार और विपक्ष एक-दूसरे पर साजिश के आरोप लगा रहे है। ऑर्बान ने 16 साल में सिस्टम को अपने हिसाब से मजबूत किया है और वे कभी नहीं हारे। अगर वे हारते है और सत्ता छोड़ने से मना करते है, तो बड़ा राजनीतिक संकट हो सकता है। इसलिए यह चुनाव अमेरिका, रूस, यूक्रेन के लिए भी अहम है।

बहरहाल, चुनाव का नतीजा यह तय करेगा कि हंगरी अपनी लोकतांत्रिक संस्थाओं को सुधारकर EU के साथ तालमेल बिठाएगा या अपनी अलग राह पर चलते हुए गठबंधन में दरार पैदा करेगा। यदि नई सरकार आती है, तो रूस पर प्रतिबंध लगाने और यूक्रेन को सैन्य सहायता देने के यूरोपीय फैसलों में आने वाली बाधाएं खत्म हो सकती हैं। विक्टर ओर्बान के सत्ता में बने रहने से रूस को यूरोप के भीतर एक भरोसेमंद सहयोगी मिलता रहेगा, जबकि सत्ता परिवर्तन मास्को के कूटनीतिक प्रभाव को कमजोर कर देगा। हंगरी का चुनाव यह निर्धारित करेगा कि पश्चिमी सैन्य गठबंधन (NATO) में एकता बनी रहेगी या हंगरी के "रूस-हितैषी" रुख के कारण अमेरिका को अपनी सुरक्षा रणनीति बदलनी पड़ेगी। सत्ता में बदलाव से हंगरी को EU से मिलने वाली अरबों यूरो की रुकी हुई फंडिंग मिल सकती है, जिससे न केवल हंगरी की अर्थव्यवस्था संभलेगी बल्कि पूरे यूरोप की आर्थिक एकजुटता भी बढ़ेगी।

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