By उमेश चतुर्वेदी | Jun 04, 2026
साल 2026 में प्रशांत महासागर में सक्रिय 'अल नीनो' का साया भारत के कृषि क्षेत्र के लिए बड़ी चुनौती बनकर उभर रहा है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने अपने संशोधित पूर्वानुमान के अनुसार, इस वर्ष मानसून सामान्य से कम रहने की आशंका जताई है। नए पूर्वानुमान के अनुसार, इस साल औसत से करीब दस फ़ीसद कम बारिश होने की आशंका है। भारत में, जहाँ कृषि अभी- भी काफी हद तक मानसून पर निर्भर है, उसके लिए मानसूनी बारिश की कमी और भीषण सूखा एक तरह से विपत्ति का ही द्योतक है। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि सिंचाई का भी प्रबंधन किया जाए।
वर्षा की कमी के कारण भूजल का पुनर्भरण यानी रिचार्ज कम होता है, जिससे भूजल स्तर और नीचे चला जाता है। वैसे भी उत्तर भारत के कई हिस्सों में पहले से ही भूजल स्तर काफ़ी नीचे चला गया है। इसलिए सूखे की स्थिति विशेषकर उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत के लिए बहुत खतरनाक है। अल नीनो के चलते इस साल वर्षों पहले बने बांधों और जलाशयों में पानी का भंडारण सामान्य से कम होने की आशंका है। इस पानी का इस्तेमाल ज्यादातर रबी फसलों के लिए होता है। जब पानी कम होगा तो रबी फसलों की सिंचाई के लिए कम उपलब्ध होगा। अल नीनो के कारण देश के ज्यादातर हिस्सों के सूखे की चपेट में आना स्वाभाविक है। इसकी वजह से पैदावार पर बुरा असर पड़ना तय है। इससे फसलों की बुवाई में देरी हो सकती है और फसलों की बुआई के लिए अतिरिक्त सिंचाई की आवश्यकता पड़ेगी। इसके लिए भूजल की आवश्यकता होगी और उसे चूँकि ट्यूबवेल से निकाला जाएगा, लिहाजा बिजली की माँग बढ़ेगी।
इसके लिए सिंचाई के दृष्टिकोण में बदलाव की आवश्यकता है। इसके लिए जरूरी हो जाता है कि किसानों को कम पानी की जरूरत वाली फसलों, जैसे बाजरा, मूँग, अरहर, मक्का आदि को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इसे कृषि और किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस उपाय को अपनाने की बात भी की है। सरकार की ओर से इस संबंध में किसानों को तैयार भी किया जा रहा है। इसके तहत मिट्टी की नमी बनाए रखने के लिए पौधों की जड़ों के आसपास सूखी पत्तियों या प्लास्टिक की शीट की परत बिछाने का सुझाव दिया जा रहा है।
कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, देशी पौधों को आमतौर पर बढ़ने के लिए कम पानी की आवश्यकता होती है या वे अन्य प्रकार की घासों, पेड़ों और झाड़ियों की तुलना में उपलब्ध पानी का बेहतर उपयोग कर सकते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि किसान और बागवानी करने वाले लोग अपने बगीचों या यहां तक कि अपने व्यवसायों के सामने भी पत्थरों या अन्य प्रकार के भू-आवरण का उपयोग करके रचनात्मक तरीके से पानी को बचा सकते हैं । कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार शुष्क बागवानी के मूल सिद्धांत हैं कि पौधों की आवश्यकता के अनुसार ही पानी का उपयोग किया जाए और ऐसी बागवानी डिजाइन और पौधों का चयन किया जाए जो उपलब्ध वर्षा जल का उपयोग कर सकें।
इसके साथ ही ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई व्यवस्था को भी अपनाने के लिए किसानों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इससे पानी की खपत को कम किया जा सकता है। इसके साथ ही खेत के तालाबों और जल संचयन को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, जो सूखे की हालत में सिंचाई की सुविधा प्रदान कर सकते हैं।
किसानों को जरूरत के हिसाब से खेत के उन क्षेत्रों में सिंचाई किया जाना होगा, जिसे पानी की जरूरत ज़्यादा हो। रासायनिक खाद और कीटनाशकों के उपयोग वाली फसलों को पानी की ज़्यादा आवश्यकता होती है। ऐसी फसलों से बचना होगा और जैविक खाद एवं प्राकृतिक कीटनाशकों के इस्तेमाल किया जाना चाहिए होगा।
- उमेश चतुर्वेदी
वरिष्ठ पत्रकार