By संतोष उत्सुक | Aug 08, 2026
ऐसा माना जाता है कि सब एक दूसरे से सीखते हैं। बच्चे अपने अभिभावकों ,अध्यापकों और वरिष्ठों से सीखते हैं। यह भी माना जाता है कि उम्र में छोटों से भी सीखा जा सकता है। विशाल देश, कम जनसंख्या वाले देश से भी प्रेरित हो सकते हैं। हमने भी इतनी बड़ी दुनिया से कुछ न कुछ सीखा है। कोई इस बात को माने या माने लेकिन दुनिया ने हमसे भी बहुत कुछ सीखा है। यह भी सब जानते हैं लेकिन कुछ लोग नहीं मानते कि संसार में हमने ही सब कुछ सबसे पहले बताया और बनाया।
उन अन्तरिक्ष यात्रियों से प्रेरणा लेकर अपने गड्ढों की नामकरण योजना शुरू की जा सकती है। जिसे भावनात्मक कोण दिया जा सकता है। कुछ समय बाद राजनीतिक दृष्टिकोण भी दे सकते हैं। थोड़ी कोशिश की जाए तो गड्ढों को धार्मिक रंग में भी डुबो सकते हैं। इच्छुक नागरिक पसंदीदाह गड्ढे को अपना बनाकर प्रिय नाम दे सकते हैं। इस तरह नागरिकों की भावनाएं ज्यादा फलफूल कर संतुष्ट हो सकती हैं। वैसे तो गड्ढे स्पीड ब्रेकर की तरह काम करते हैं लेकिन समाज सेवी संस्थाएं, आधा दर्जन गड्ढे भरवाकर, सड़क किनारे अपनी संस्था का आकर्षक विज्ञापन पट्ट लगा सकते हैं। सफल वैवाहिक जीवन बिताने वाले हर साल एक बड़ा गड्ढा भरवाकर जश्न मना सकते हैं।
खड्डे जैसे दिखने वाले गड्ढों में, वास्तव में नालायक लेकिन खुद को लायक मानने वाले नेता से वृक्षारोपण समारोह का उद्घाटन करवाकर क्षेत्र में हरियाली बढ़ाई जा सकती है। रील बनाने वालों को नया विषय मिल सकता है। गड्ढे के नामकरण से प्रेरित खबर लिखने वाले बेहतर लिखने की प्रेरणा ले सकते हैं। संभव है वह दिन आए जब अमुक खास गड्ढे का नामकरण, अपनी पसंद का करवाने वालों में होड़ मच जाए। विचार, इनकार, इकरार और तकरार हो। कुछ गड्ढों की किस्मत अच्छी होती है जिनका ज़िक्र मुख्यमंत्री तक पहुंचता है और उनकी गोद भराई की रस्म शुरू हो जाती है। समझदार स्थानीय प्रशासन संदर्भित सामाजिक सेवाओं के बदले, गड्ढे के स्थान, आकार और प्रकार के आधार पर मनमाने पैसे वसूल कर सकती है। इससे गरीब नगरपालिकाओं को नियमित आमदनी हो सकती है जिनसे वह दूसरे काम भी करवा सकती है। अब आप ही बताइए, गड्ढों का नामकरण सामाजिक योजना बढ़िया रहेगी न।
- संतोष उत्सुक