By अभिनय आकाश | Jan 08, 2026
भारत और अमेरिका के रिश्ते इस वक्त ऐसी ढलान पर हैं जहां तनाव हर बीतते दिन के साथ गहराता जा रहा है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भारत के खिलाफ तीखी बयानबाजी और टेरिफ बढ़ाने की धमकियां अब सिर्फ जुबानी नहीं रही। बात अब अमेरिकी संसद तक पहुंच गई। दरअसल अमेरिकी सीनेट में एक ऐसा कानून आने वाला है जो भारत के लिए काफी भारी पड़ सकता है। वो ऐसे कि अमेरिकी सीनेट में रूस पर प्रतिबंध अधिनियम 2025 लाने की तैयारी है। यह बिल अमेरिका के दो सेनेटर्स लिंसे ग्राहम और रिचर्ड लुमथन ने मिलकर तैयार किया है। जिसे व्हाइट हाउस की हरी झंडी मिल चुकी है। मकसद साफ है रूस की आर्थिक नसों को काटना। लेकिन इसकी चपेट में भारत भी आता दिखाई दे रहा है।
यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से भारत ने रूस से जमकर सस्ता कच्चा तेल खरीदा है। लेकिन अब अमेरिका इसे बर्दाश्त करने के मूड में नहीं। इस नए बिल के तहत एक बेहद खतरनाक प्रावधान जोड़ा गया है। अगर रूस शांति वार्ता के लिए नहीं झुकता तो रूस से तेल, गैस या यूरेनियम खरीदने वाले देशों पर अमेरिका 500% तक का टेरिफ लगा सकता है। और क्योंकि भारत पर अमेरिका ने पहले ही रूसी तेल को लेकर अतिरिक्त टेरिफ लगाए हैं।
लंबे समय से चली आ रही प्रतिद्वंद्विता और व्यापारिक तनाव के बावजूद, ट्रंप प्रशासन ने चीन के साथ व्यवहार में सावधानी बरती है। इसका एक प्रमुख कारण दुर्लभ खनिजों, इलेक्ट्रिक वाहनों में प्रयुक्त महत्वपूर्ण घटकों, सेमीकंडक्टर, रक्षा उपकरणों और नवीकरणीय ऊर्जा प्रौद्योगिकियों पर बीजिंग का प्रभुत्व है। भले ही चीन रूसी तेल का दुनिया का सबसे बड़ा खरीदार बना हुआ है, लेकिन उस पर अतिरिक्त शुल्क नहीं लगाए गए हैं। इसके बजाय, 12 अगस्त को राष्ट्रपति ट्रंप ने चीनी आयात पर नए शुल्क को स्थगित कर दिया, जिससे शुल्क 30 प्रतिशत पर बना रहा, जो भारतीय वस्तुओं पर लगाए गए शुल्क से काफी कम है। चीन ने अमेरिका को दुर्लभ पृथ्वी तत्वों और चुम्बकों के निर्यात पर लाइसेंस संबंधी प्रतिबंध लगा दिए, जिससे अमेरिकी उद्योगों, विशेष रूप से ऑटोमोबाइल निर्माताओं और प्रौद्योगिकी कंपनियों में चिंता फैल गई। ये क्षेत्र चीनी आपूर्ति पर बहुत अधिक निर्भर हैं, और थोड़ी सी भी रुकावट उत्पादन में मंदी और आपूर्ति श्रृंखला में गड़बड़ी का खतरा पैदा कर सकती है। घरेलू निर्माताओं के दबाव में आकर वाशिंगटन को टकराव बढ़ाने के बजाय बातचीत को प्राथमिकता देनी पड़ी है। दुर्लभ धातुओं को लेकर हुए गतिरोध ने चीन की जवाबी कार्रवाई करने की क्षमता को उजागर किया है, जिससे अमेरिकी औद्योगिक उत्पादन को सीधा नुकसान पहुंच सकता है। ऐसे में बीजिंग के खिलाफ कठोर टैरिफ रणनीति अपनाना एक जोखिम भरा विकल्प बन गया है।
भारत से नाराजगी की वजहइसके विपरीत, भारत के पास चीन जैसी रणनीतिक ताकत नहीं है। यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से नई दिल्ली रियायती दरों पर रूसी तेल का एक प्रमुख खरीदार बन गया है, लेकिन महत्वपूर्ण आपूर्ति श्रृंखलाओं पर चीन की तरह उसका कोई दबदबा नहीं है। ट्रंप ने भारत की व्यापार नीतियों पर बार-बार असंतोष जताया है और नई दिल्ली पर अमेरिकी वस्तुओं पर उच्च शुल्क और बाधाएं बनाए रखने का आरोप लगाया है। कुल 50% के ये शुल्क भारत द्वारा रूसी तेल की भारी मात्रा में खरीद के कारण लगाए गए हैं, जिसे अमेरिका यूक्रेन संघर्ष के बीच रूस की अर्थव्यवस्था को समर्थन देने वाला मानता है। इससे पहले, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दावा किया था कि रूस से तेल खरीदने पर भारत पर लगाए गए उच्च शुल्क को लेकर प्रधानमंत्री मोदी नाखुश हैं। हाउस ऑफ रिपब्लिकन पार्टी के सदस्यों की बैठक में ट्रम्प ने कहा कि हालांकि संबंध सौहार्दपूर्ण बने हुए हैं, लेकिन शुल्क के मुद्दे ने तनाव पैदा कर दिया है।