610 दल कोई सीट नहीं जीत पाये और 530 दलों को एक भी वोट नहीं मिला

By नीरज कुमार दुबे | Jun 07, 2019

भारत एक लोकतांत्रिक देश है और यहाँ हर किसी व्यक्ति को अपनी राजनीतिक पार्टी बनाने और चुनाव लड़ने का अधिकार प्राप्त है लेकिन चुनाव आयोग के पास दर्ज हजारों राजनीतिक पार्टियों में से कुछेक ही हैं जोकि जनता का विश्वास हासिल कर पाती हैं बाकी सब राजनीतिक पार्टियां तो मात्र कागजों पर या अपने कार्यालयों तक ही सीमित हैं। इस बार के लोकसभा चुनावों में इन सभी पार्टियों का क्या प्रदर्शन रहा आइए इस पर एक सरसरी नजर डालते हैं।

सूनामी ने मचाई तबाही

इस बार मोदी सूनामी में सात राष्ट्रीय राजनीतिक दलों में से छह पार्टियों को बुरी तरह हार मिली। यही नहीं राज्य स्तर पर मान्यता प्राप्त 64 राजनीतिक दलों में से अधिकतर वही दल अच्छा प्रदर्शन कर पाये जोकि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में शामिल थे। वाईएसआर कांग्रेस पार्टी, बीजू जनता दल, तेलंगाना राष्ट्र समिति, द्रमुक आदि ने अपने चमत्कारी प्रदर्शन से क्षेत्रीय दलों की लाज बचा ली। देखा जाये तो भारत में कुल 64 क्षेत्रीय दल ऐसे हैं जोकि मान्यता प्राप्त हैं लेकिन चुनाव परिणाम के आंकड़ों पर नजर डालें तो मात्र 13 राजनीतिक दल ऐसे थे जो सिर्फ एक सीट जीतकर लोकसभा में अपनी उपस्थिति दर्ज करा पाये। अब यदि ऐसे दलों की बात करें जोकि चुनाव आयोग के पास पंजीकृत तो हैं लेकिन उन्हें मान्यता नहीं है तो ऐसे दलों की कुल संख्या 2301 है। 2019 के लोकसभा चुनावों में इन सभी 2301 पंजीकृत दलों का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा। 2019 के लोकसभा चुनावों में 530 राजनीतिक दल तो ऐसे रहे जिनका वोट प्रतिशत शून्य रहा। सीटों के हिसाब से देखें तो इस बार जितने दल लोकसभा चुनाव के समर में उतरे थे उसमें से 610 क्षेत्रीय और पंजीकृत दल कोई भी सीट जीतने में विफल रहे।

लोकसभा पहुँचे 37 राजनीतिक दल

दलीय स्थिति के हिसाब से देखें तो सत्रहवीं लोकसभा में कुल 37 राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि चुन कर आये हैं जबकि पिछले लोकसभा चुनावों में 464 पार्टियों ने हिस्सा लिया था और उसमें से 38 दलों के प्रतिनिधि लोकसभा में चुन कर आये थे।

सबसे अमीर और सबसे गरीब उम्मीदवार का क्या हुआ ?

इस बार के चुनावी समर में हालांकि हजारों की संख्या में उम्मीदवार थे लेकिन सबसे अमीर और सबसे गरीब उम्मीदवार की बात की जाये तो बिहार की पाटलीपुत्र सीट से निर्दलीय उम्मीदवार रमेश कुमार शर्मा सबसे अमीर प्रत्याशी थे। उन्होंने अपनी संपत्ति 1107 करोड़ रुपए घोषित की थी और चुनावों में खूब पैसा भी खर्च किया लेकिन उन्हें मात्र 1558 वोट ही मिले और वह अपनी जमानत तक गँवा बैठे। अगर सबसे गरीब उम्मीदवार की बात करें तो मध्य प्रदेश की खरगोन सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ने वाले जॉनी करण सबसे गरीब उम्मीदवार थे। उनके एक बैंक खाते में शून्य राशि और एक बैंक खाते में एक हजार रुपए ही थे। ये हजार रुपए वाला बैंक खाता उन्हें चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार खुलवाना पड़ा था। चुनाव खत्म होने तक वह मात्र 12-13 हजार रुपए ही खर्च कर सके थे और यह राशि भी उन्होंने अपने जानकारों से उधार लेकर जुटाई थी।

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सबसे तेजी से बढ़ने वाली पार्टी है भाजपा

अगर भाजपा को मिली सफलता का विश्लेषण करें तो पाएंगे कि पार्टी ने पिछले लोकसभा चुनावों की तुलना में इस बार अपनी सीटों की संख्या में 21 अंकों की वृद्धि करते हुए 303 सीटों पर कमल खिलाया और वोट शेयर में भी 6 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की जोकि एक बहुत बड़ी कामयाबी है। 1952 के बाद से यदि भारतीय चुनावी इतिहास को देखें तो कोई भी राजनीतिक दल इस तेजी के साथ आगे नहीं बढ़ सका है जितना भाजपा बढ़ गयी है। दूसरी तरफ यदि कांग्रेस की बात करें तो वह पिछले चुनावों में 44 सीटें जीतने में सफल रही थी और इस बार उसकी सीटों का आंकड़ा 52 हो गया। लगातार दूसरी बार ऐसा हुआ है जब कांग्रेस लोकसभा में विपक्ष के नेता का दर्जा हासिल करने से चूक गयी।

सोशल मीडिया पर जमकर खर्च

इस बार के लोकसभा चुनावों में सोशल मीडिया का राजनीतिक दलों ने भरपूर उपयोग किया। सोशल मीडिया मंचों जैसे फेसबुक, गूगल, यूट्यूब आदि की भारतीय आम चुनावों में बल्ले बल्ले हो गयी। राजनीतिक दलों ने कुल 53 करोड़ की राशि के विज्ञापन सोशल मीडिया पर दिये। इनमें सबसे ज्यादा विज्ञापन भाजपा ने दिये। फेसबुक के मुताबिक उसे इस वर्ष फरवरी से लेकर मई तक कुल 1.21 लाख राजनीतिक विज्ञापन मिले जिनके लिए 26.5 करोड़ रुपये वसूले गये। इसी प्रकार राजनीतिक पार्टियों ने गूगल, यूट्यूब और उसके सहयोगी मंचों पर 14837 विज्ञापनों पर 27.36 करोड़ रुपये खर्च किये। जहाँ तक भाजपा का सवाल है उसने फेसबुक पर 2500 विज्ञापनों पर 4.23 करोड़ रुपए खर्च किये। गूगल के विभिन्न मंचों पर पार्टी ने विज्ञापन पर 17 करोड़ रुपए की राशि खर्च की।

जहाँ तक कांग्रेस का सवाल है उसने फेसबुक पर 3686 विज्ञापनों पर 1.46 करोड़ रुपए और गूगल के मंचों पर दिये गये 425 विज्ञापनों पर 2.71 करोड़ रुपए खर्च किये। फेसबुक पर विज्ञापनों के मामले में तृणमूल कांग्रेस तीसरे नंबर पर रही और पार्टी ने यहां 29.28 लाख रुपए खर्च किये। आम आदमी पार्टी ने 176 विज्ञापनों पर 13.62 लाख रुपए खर्च किये। आम आदमी पार्टी के बारे में इस तरह की भी खबरें रहीं कि वह एक कंपनी के माध्यम से भी विज्ञापनों पर खर्च कर रही थी। गौरतलब है कि इस साल की शुरुआत में सोशल मीडिया कंपनियों ने इस बात का ऐलान किया था कि पारदर्शिता बरतते हुए वह भारत के आम चुनावों के दौरान राजनीतिक दलों की ओर से उनके मंचों पर दिये गये विज्ञापनों पर किये जाने वाले खर्च का ब्यौरा सार्वजनिक करेंगी।

-नीरज कुमार दुबे

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