Sonia Gandhi Memoir: राजीव गांधी के पीएम बनने के फैसले पर हुआ था गहरा आघात

By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Nov 07, 2026

नयी दिल्ली, सात नवंबर “मुझे ऐसा लगा, जैसे सीधे मेरे दिल में छुरा घोंप दिया गया हो,” कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अपने संस्मरण में यह बात उस पल का जिक्र करते हुए कही है जब राजीव गांधी ने उन्हें बताया था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या वाले दिन ही उनसे प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने को कहा गया था। सोनिया गांधी ने अपने पति की जान को खतरा की आशंका जताते हुए जब उनसे प्रधानमंत्री नहीं बनने का आग्रह किया, तो राजीव गांधी का जवाब था, ‘‘वे वैसे भी मुझे मार डालेंगे।’’ उनके संस्मरण ‘बिलॉन्गिंग: ए जर्नी ऑफ लव’ में इस तरह के कई और अहम पलों का जिक्र है। ‘हार्परकॉलिन्स इंडिया’ द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक 10 नवंबर को बाजार में उपलब्ध होगी।

ब्रिटेन में प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र द गार्डियन में छपे इस पुस्तक के अंश के अनुसार, सोनिया गांधी ने 31 अक्टूबर 1984 के उस दुखद दिन की घटनाओं का वर्णन किया है, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की अपने ही अंगरक्षकों ने उनके 1, सफदरजंग रोड आवास पर हत्या कर दी थी। कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष ने संस्मरण में लिखा, ‘‘मैं अपने कमरे में वापस आई, तभी मेरी सास घर के बगल वाली इमारत में स्थित अपने दफ्तर के लिए निकलीं। मैं नहाना शुरू करने ही वाली थी कि मुझे धमाकों की आवाज सुनाई दी, पटाखों जैसी, पर कुछ अलग तरह की।

मैं वहीं ठिठक गई।’’ उन्होंने उस क्षण को याद करते हुए कहा, ‘‘कोई मेरे बाथरूम के दरवाजे को जोर-जोर से पीट रहा है। यह बच्चों की आया, ओंगमू है, जो रो रही है। मेरा दिल जोर से धड़कने लगता है और मैं झटके से दरवाजा खोलती हूं।

वह बिना कुछ बोले, हाथों के इशारे से बगीचे की तरफ इशारा करती है।’’ सोनिया गांधी ने इस हत्याकांड के बारे में पुस्तक में लिखा है, ‘‘मैं अकबर रोड की तरफ जाने वाले रास्ते पर दौड़ पड़ी। मैंने देखा कि एक सफेद एम्बेसडर कार उसी रास्ते पर धीरे-धीरे आगे बढ़ रही है। मैं ठिठक गई।

मन में काफी डर, घबराहट और दहशत पैदा हो गई। मेरा दम घुटने लगा। मैं सांस नहीं ले पा रही थी।

ऐसा लगा कि मैं वहीं गिर पड़ूंगी।’’ संस्मरण के अनुसार, उनके मन में यह विचार आता है कि ‘‘नहीं, नहीं, मुझसे यह नहीं होगा। लेकिन मुझे कार तक जाना ही होगा।’’ उन्होंने लिखा, ‘‘मैंने देखा कि उन्हें उठाकर कार में ले जाया जा रहा है। मैं सब समझ जाती हूं और चीख पड़ी।’’ कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष ने उस पल के बारे में बताया, ‘‘मैं अभी कार में हूं, दुबकी हुई, उनका चेहरा मेरी तरफ है।

खून, उनकी साड़ी खून से सनी हुई है, उनकी छाती से खून निकल रहा है। उनकी बड़ी-बड़ी आंखें पूरी खुली हुई हैं; चेहरे पर हैरानी के भाव हैं। (उनके) शरीर में कोई हरकत नहीं हो रही है।

मैं उनसे बात करने की कोशिश करती हूं, मम्मी, मम्मी कहकर पुकारती हूं, लेकिन मुंह से कोई शब्द नहीं निकलता। मैं फिर कोशिश करती हूं। वह कोई जवाब नहीं दे रहीं।’’ सोनिया गांधी ने बताया कि इंदिरा गांधी के सहयोगी कार के आगे वाले हिस्से में थे और चिल्ला रहे थे; भारी और धीमी ट्रैफिक के कारण कार बहुत मुश्किल से आगे बढ़ पा रही थी।

उन्हें याद है कि कार में कोई सायरन नहीं था और रास्ते में एक के बाद एक, कई ट्रैफिक सिग्नल आए थे। सोनिया गांधी ने उस मार्मिक क्षण के बारे में लिखा, ‘‘फिर अस्पताल पहुंची। गेट नहीं खुल रहा है।

अफरा-तफरी मची है। हमें रोक दिया जाता है। कोई खिड़की से सवालिया नजरों से देखता है।

वे हमें अंदर जाने देते हैं। हम आपातकालीन विभाग पहुंचते हैं, जो लोगों से खचाखच भरा है। हमें फिर से रोक दिया जाता है, अंदर नहीं जाने दिया जाता।

हमें अपनी बारी का इंतजार करना पड़ता है। कोई व्यक्ति ड्राइवर को आवाज देता है और उसे आगे बढ़ने का इशारा करता है। वे हमें पहचान लेते हैं।

उन्हें (इंदिरा को) एक ट्रॉली पर लिटा दिया जाता है। हमें कहीं ले जाया जाता है, ऑपरेशन थिएटर? वे मुझसे साथ चलने को कहते हैं।

मुझे पास के ही एक कमरे में ले जाया जाता है। नहीं, नहीं, मैं उसके पास रहना चाहती हूं, मैं जिद करती हूं। मैं जानना चाहती हूं।

मुझे देखना है। वे कोई जवाब नहीं देते। वे अपनी आपातकालीन प्रक्रियाओं में पूरी तरह व्यस्त हैं।’’ कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष ने उस पल को याद किया, ‘‘मैं उलझन में हूं, जैसे खो गई हूं।

वहां मुझे कोई नहीं पहचान रहा। मैं कांप रही हूं। मुझे डर लग रहा है, मेरे दिमाग में बहुत कुछ चल रहा है।

राजीव कहां है? मैं याद करने की कोशिश करती हूं। पर याद नहीं आ रहा, बिल्कुल नहीं।

बच्चे... हां, वे स्कूल में हैं। उन्हें घर लाना होगा। हे भगवान, नहीं, नहीं!

वे सुरक्षित रहें, राजीव सुरक्षित रहें। मैं किसे बताऊं, किससे बात करूं?’’ सोनिया गांधी ने बताया कि कई घंटे बीत गए, और भी लोग आते गए और वहां भीड़ लग गई। उन्होंने डॉक्टर से कुछ पूछने के लिए इशारा किया लेकिन डॉक्टर ने सिर हिलाकर मना कर दिया।

पुस्तक के अंश के अनुसार, ‘‘मैं समझ गई। मैं फूट-फूट कर रोने लगी, खुद को रोक नहीं पाई। मैं सुन्न पड़ गई।

31 अक्टूबर 1984 को दोपहर 2 बजे इंदिरा गांधी को मृत घोषित कर दिया गया। मुझे घर ले जाया गया ताकि उनके पार्थिव शरीर के लिए कपड़े ला सकूं। रास्ते में, कुछ लोगों ने हमारी कार को रोकने की कोशिश की और खिड़कियों को जोर-जोर से पीटने लगे।

वे बहुत गुस्से में थे और चिल्ला कर कुछ बोल रहे थे जो मुझे समझ नहीं आया।’’ सोनिया गांधी ने यह भी याद किया कि घर पहुंचने पर, बच्चे - राहुल और प्रियंका - रोते हुए उनसे लिपट गए। पुस्तक के अनुसार, ‘‘जब काले रंग की वर्दी पहने कमांडो उन्हें अचानक स्कूल से उठा लाए, तो उन्हें किसी बड़ी अनहोनी का एहसास हो गया था। घर पहुंचने पर उन्होंने देखा कि घर के कुछ स्टाफ रो रहे थे।

वे एक के बाद एक सवाल पूछने लगे - मम्मा कहां हैं? , हमें घर क्यों ले आए? , पापा कहां हैं?

, क्या हुआ है? , दादी कहां हैं? , आप हमें सच नहीं बता रहे हैं!’’ सोनिया गांधी ने पुस्तक में लिखा है, मैं उनके पास बैठकर उन्हें गले लगाना चाहती थी, उन्हें बताना चाहती थी, लेकिन मैं ऐसा नहीं कर पाई।

राजीव अस्पताल आ रहे थे।’’ वह याद करती हैं कि राजीव पश्चिम बंगाल में एक राजनीतिक रैली में थे, तभी पुलिस गश्ती दल ने उनके काफिले को रोक लिया। उन्हें बताया गया कि दिल्ली से एक संदेश आया है कि उन्हें तुरंत वापस लौटना होगा, एक गंभीर हादसा हो गया है। पुस्तक के अनुसार, राजीव को हेलीपैड ले जाया गया, जहां से वह कलकत्ता और फिर दिल्ली के लिए रवाना हुए।

रास्ते में उन्होंने बीबीसी के बुलेटिन में सुना कि इंदिरा गांधी घायल हैं और उनकी हालत बहुत गंभीर है। सोनिया गांधी ने संस्मरण में लिखा, ‘‘किसी ने उनसे सीधे तौर पर यह नहीं कहा कि उनकी मां अब नहीं रहीं, लेकिन वह समझ गए थे।’’ राजीव गांधी अपराह्ल 3:30 बजे पहुंचे और वह सीधे अस्पताल गए। सोनिया गांधी ने लिखा है, मुझे याद है कि मेरी दिली इच्छा थी कि काश मुझे उनके साथ कम से कम एक पल अकेले रहने का मौका मिले।

हमने एक-दूसरे को गले लगाया, और जब उन्होंने मुझसे बात की, तो मुझे एहसास हुआ कि वह कुछ ऐसा कह रहे हैं जिसे मैं सुनना नहीं चाहती थी। मुझसे कहा गया है; वे चाहते हैं कि मैं (राजीव गांधी) प्रधानमंत्री पद की शपथ लूं’।’’ उन्होंने संस्मरण में लिखा है, ‘‘मुझे ऐसा महसूस हुआ, मानो किसी ने सीधे मेरे दिल में छुरा घोंप दिया हो। मेरा सीना जोरों से धड़कने लगा और मेरे भीतर आक्रोश उमड़ने लगा।

ऐसा लग रहा था मानो मैं अभी फट पड़ूंगी। मैंने इसे अंदर ही दबाने की कोशिश की।’’ उन्होंने लिखा, ‘‘क्या आपसे ऐसा करने के लिए कहा गया है? उनकी हिम्मत कैसे हुई ऐसा कहने की?

उनकी हिम्मत कैसे हुई? वे हैं कौन? आप ही क्यों, आखिर आप ही क्यों?

आपने उन्हें ऐसा कहने कैसे दिया? नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। ऐसा बिल्कुल नहीं होगा!’’ उन्होंने पुस्तक में लिखा, ‘‘मैं असहनीय पीड़ा और मानसिक वेदना से घिर गई थी।

मेरा पूरा शरीर पसीने से तर-बतर था। जी मिचलाने लगा था और ऐसा लग रहा था जैसे उल्टी हो जाएगी। मैं चीखना चाहती थी, मदद मांगना चाहती थी।

मैं बस यही कहना चाहती थी, ‘कोई तो मेरी मदद करे, कोई तो इसे यहीं खत्म करने में मेरी मदद करे’।” उन्होंने संस्मरण में बताया है कि वह फूट-फूटकर रो पड़ीं और उन्होंने हाथ जोड़कर राजीव गांधी से रोते हुए कहा था, ‘‘नहीं, नहीं, आप ऐसा सोच भी कैसे सकते हैं? आपको उन्हें रोकना होगा, आपको मना करना होगा, आपको ना कहना होगा, बच्चों की खातिर, अपने खातिर। आप हमारे साथ ऐसा नहीं कर सकते।

वे आपको मार डालेंगे; वे आपको भी मार डालेंगे! सोनिया गांधी ने लिखा है कि इस पर राजीव ने जवाब दिया, ‘‘वे वैसे भी मुझे मार डालेंगे।’’

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