Yes Milord: पूर्व CJI चंद्रचूड़ का बाबरी पर बयान, क्यूरेटिव याचिका की तैयारी, फिर खुलेगा अयोध्या केस?

By अभिनय आकाश | Oct 04, 2025

महान कानूनी विद्वान और पूर्व अमेरिकी न्यायाधीश रिचर्ड एलन पॉसनर ने एक बार कहा था कि हमारे लिए बेहतर है कि हम न्यायाधीशों को मनुष्य के रूप में देखें, न कि एक प्रोमेथियस के रूप में जो दुनिया को बदलने पर आमादा है, या एक संत के रूप में जो मानवीय कमजोरियों, पूर्वाग्रहों और दुर्बलताओं से रहित है। भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ ने हाल ही में कहा कि बाबरी मस्जिद बनाकर उस जगह यानी मंदिर की पवित्रता नष्ट की गई। पूर्व सीजेआई चंद्रचूड़ के बयान के बाद विवादों का सिलसिला तेज हो चला। प्रोफेसद मदन जी मोहन गोपाल ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि पूर्व चीफ जस्टिस की ये टिप्पणी क्यूरेटिव पेटीशन का आधार बन सकती है। अगर ऐसा होता है तो अयोध्या विवाद का मामला एक बार फिर से कोर्ट में खुल सकता है। 

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पुनर्विचार याचिका की जाएगी दाखिल

प्रोफेसर डॉ मोहन जी गोपाल ने कहा कि अयोध्या राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद पर भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की हालिया टिप्पणी, फैसले को चुनौती देने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में क्यूरेटिव याचिका दायर करने के लिए पर्याप्त आधार प्रदान कर सकती है। प्रोफेसर गोपाल ने कहा कि न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ की यह टिप्पणी कि बाबरी मस्जिद का निर्माण एक मौलिक कार्य था, अत्यंत महत्वपूर्ण है। साल 2019 में सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की संवैधानिक बेंच ने राम मंदिर मामले में फैसला सुनाया था। उस बेंच में तत्कालीन मुख्य न्यायधीश रंजन गोगोई, जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस अशोख भूषण और जस्टिस अब्दुल नजीर शामिल थे। 

क्या होती है क्यूरेटिव पेटीशन

सुप्रीम कोर्ट अगर कोई फैसला सुना देता है तो पहले पहल रिव्यू पेटीशन डाली जा सकती है। यानी किसी पार्टी को किसी फैसले में किसी बात पर आपत्ति है तो वो कोर्ट से गुजारिश कर सकता है कि दोबारा से विचार किया जाए। रिव्यू पेटीशन फैसले के तीस दिन के भीतर फाइल करनी होती है। इसकी सुनवाई वही बेंच करती है, जिसने फैसला सुनाया था। सुप्रीम कोर्ट खुद भी अपने फैसले का रिव्यू कर सकता है। वहीं क्यूरेटिव पेटीशन एकदम आखिरी लीगल ऑप्शन की तरह है। इसका स्कोप रिव्यू पेटीशन के मुकाबले बहुत कम होता है। अगर ऐसा लगे कि फैसला देते समय नैचुरल जस्टिस के सिद्धांत को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया गया तो ये पेटीशन काम आ सकती है। सीजेआई सहित सुप्रीम कोर्ट के तीन सबसे वरिष्ठ जज इसकी सुनवाई करते हैं। भोपाल गैस त्रासदी याकूब मेनन, 2012 दिल्ली गैंग रेप जैसे चर्चित मामलों में इसका इस्तेमाल हुआ। 

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अयोध्या राम जन्मभूमि केस में SC ने अपने फैसले में क्या कहा था?

अपने 2019 के फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने अन्य चिंताओं पर आस्था को प्राथमिकता दी। न्यायालय ने यह टिप्पणी करते हुए भी कि आस्था व्यक्तिगत आस्थावानों तक सीमित है और वह लोगों की मान्यताओं के आधार पर भूमि विवाद का निपटारा नहीं कर सकता, अंततः विवादित भूमि को एक हिंदू मंदिर के निर्माण के लिए दे दिया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि मुस्लिम पक्ष यह साबित करने में असफल रहा है कि बाबरी मस्जिद वाले स्थान पर उनका कोई निर्बाध मालिकाना हक रहा है। 

अयोध्या मामले में क्या फिर से सुनवाई हो सकती है?

अयोध्या मामले के फैसले को दिए छह साल गुजर चुके हैं। सिर्फ और सिर्फ एक इंटरव्यू में दिए पूर्व जज के दिए बयान के आधार पर क्यूरेटिव पेटीशन पर फिर से सुनवाई किया जाना मुश्किल है। कानूनी जानकारों का मानना है कि क्यूरेटिव पेटीशन से पहले इसे कई सारी प्रक्रियाओं से होकर गुजरना पड़ता है। इसके अलावा जजमेंट से किसी भी पार्टी को ठेस पहुंची तो छह सालों का विलंब क्यों किया गया। फिर नैचुरल जस्टिस के सिद्धांत को दरकिनार करने का आधार एक ज्यूडिशियल रिमार्क कैसे बन पाएगा ये भी महत्वपूर्ण है। 

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