RSS के सबसे बड़े दुश्मन का कैसे हुआ End? आजाद भारत के इतिहास से एक रंग के मिटने की कहानी

By अभिनय आकाश | May 08, 2026

5 अप्रैल 1957 की वह सुबह भारतीय राजनीति के लिए एक ऐसा मोड़ थी, जिसने दुनिया के दो सबसे शक्तिशाली देशों अमेरिका और सोवियत संघ को एक साथ चौंका दिया था। एक ब्राह्मण जमींदार परिवार का दुबला-पतला शख्स, इलम कुलम मनक्कलम शंकरन नंबूदरीपाद केरल के मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रहा था। यह कोई साधारण शपथ नहीं थी। यह दुनिया की पहली ऐसी चुनी हुई कम्युनिस्ट सरकार थी जिसने बंदूक के दम पर नहीं, बल्कि लोकतंत्र के रास्ते सत्ता हासिल की थी। ईएमएस सरकार ने गद्दी संभालते ही जमींदारी प्रथा की जड़ों पर प्रहार किया और शिक्षा व्यवस्था को निजी चंगुल से छुड़ाने की कोशिश की। लेकिन क्रांति का यह रास्ता इतना आसान भी कहा रहने वाला था। जमीन सुधार और एजुकेशन बिल ने चर्च से लेकर नायर सर्विस सोसाइटी और कांग्रेस तक, सभी को एक पिच पर लाकर खड़ा कर दिया। सड़कों पर खून बहा, पुलिस की गोलियां चलीं और देखते ही देखते शांत केरल 'विमुक्ति समरम' (मुक्ति संघर्ष) की आग में जल उठा। जब हालात का जायजा लेने खुद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू त्रिवेंद्रम पहुंचे, तो उन्होंने ईएमएस से एक तीखा सवाल पूछ डाला। पंडित नेहरू ने पूछा कि इतने कम वक्त में आपने इतने दुश्मन कैसे बना लिए? नेहरू हिचकिचा रहे थे, लेकिन तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष इंदिरा गांधी का इरादा साफ था। नतीजा यह हुआ कि 31 जुलाई 1959 को आर्टिकल 356 का वह पहला बड़ा प्रहार हुआ, जिसने महज 28 महीने पुरानी एक चुनी हुई सरकार का गला घोंट दिया। यह कहानी सिर्फ एक सरकार के गिरने की नहीं, बल्कि भारतीय संविधान के पहले बड़े दुरुपयोग और वैचारिक युद्ध की भी है। लेकिन केरल से सरकार की बर्खास्तगी के बाद कम्युनिस्ट मूवमेंट की कहानी खत्म नहीं हुई। लेकिन इस घटना के 69 साल बाद अब ये सवाल पूछा जाने लगा है कि क्या लाल झंडा अब केवल हमारे देश के इतिहास से किताबों और पुरानी तस्वीरों में सिमट कर रह जाएगा? दरअसल, केरल के 2026 के चुनावी नतीजों ने पूरे देश को चौंका दिया है और इस सवाल को पहले से कहीं ज्यादा धार देती है कि क्या लाल सलाम का पैकअप हो चुका है?  यह गिरावट उनके पतन की तरफ एक बड़ी कड़ी है क्योंकि कहानी अब सिर्फ केरल की नहीं है। इसके धागे बंगाल और त्रिपुरा तक जाते हैं। जहां पर कभी इनका राज अटूट माना जा रहा था। 34 सालों तक यह बंगाल में रहे। लेकिन आज वहां नेस्तोनाबूद हो चुके हैं। एक आखिरी लड़ाई केरल की बची थी। वहां भी कहानी खत्म हो गई है। सोशल मीडिया पर लाल सलाम केवल एक हैशटग बनकर रह गया है। जबकि कभी यह इंकलाब की आवाज हुआ करता था।

2026 के नतीजों के साथ भारत में पहली बार 1967 के बाद कोई भी राज्य कम्युनिस्ट शासन से पूरी तरह मुक्त हो गया। एक भी राज्य में देश में अब लाल सलाम नहीं है। तीन राज्य जहां यह मजबूत थे, बंगाल, त्रिपुरा, केरल वहां भी शून्य पर पहुंच गए।  इसीलिए यह सिर्फ हार नहीं बल्कि आज पूरी विचारधारा के अस्तित्व की लड़ाई है। यह सवाल है कि क्या भारत में लाल सलाम की विचारधारा को देश ने खारिज कर दिया? क्योंकि फर्क अब सिर्फ सीटों का नहीं है। फर्क पकड़ का है। वही पकड़ जो कभी इनकी सबसे बड़ी ताकत थी। एक दौर था जब मजदूर से लेकर किसान और आम आदमी की आवाज बनने का दावा इनकी पहचान हुआ करता था। लेकिन आज इनकी जमीन खिसक गई है। सवाल कि क्या वक्त के साथ ये अपने आप को बदल नहीं पाए या फिर जमीन से जुड़ी राजनीति अब जमीन में ही खो चुकी है। बंगाल में गिरावट है। त्रिपुरा में सफाया है। केरल में झटका लगा है। इसीलिए सवाल है कि यह संयोग है या संकेत? क्या यह अंत की शुरुआत है या कोई वापसी की गुंजाइश बाकी है? आज का एमआरआई इसी पर करेंगे कि कैसे एक समय की सबसे बड़ी ताकत आज इस मोड़ पर आकर खड़ी हो गई है। केरल के पतन बंगाल के सबक, भ्रष्टाचार के दाग, आर्थिक नाकामी और कैडर के गहरे संकट की बात करेंगे जिसने लाल झंडे को आज इतिहास के चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है।  यह कहानी सिर्फ केरल की नहीं है। यह भारत में सत्ता के नक्शे से एक रंग के मिटने की कहानी है। लाल रंग उस रंग की जो आजाद भारत में हुए पहले आम चुनाव में मुख्य विपक्षी पार्टी का रंग था।

बंगाल में वाम का उदय

आज से करीब 100 साल पहले 1925 में देश में दो वैचारिक संगठन बने। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया यानी कि सीपीआई। यह तथ्य भी हमें ताज्जुब से भर देता है कि आरएसएस की विचारधारा पर चलने वाली पार्टी बीजेपी आज देश के 17 राज्यों में सरकार में है। साथ ही लगातार तीन लोकसभा चुनाव जीतकर केंद्र में भी सरकार में है। वहीं कम्युनिस्ट दलों की केवल एक राज्य केरल में सरकार बची है। आखिर ऐसा क्यों हुआ? यह जानने के लिए हमें इतिहास के कुछ पुराने पन्ने पलटने होंगे। प्रदेश में कभी 34 सालों तक इनका राज था।  यहीं से इसकी शुरुआत करेंगे क्योंकि एक वक्त था जब बंगाल में ज्योति बसु का राज पत्थर की लकीर बनाता था। 34 साल का वह शासन था। सरकार की चाबी हमेशा इनके पास थी। कैडर का अनुशासन ऐसा था कि विपक्ष के लिए वहां पैर रखना मुश्किल था। 1964 में सीपीआई दो हिस्सों में टूट गई। बंगाल साल 1977 इमरजेंसी हट चुकी थी। केंद्र में जनता पार्टी की मोरारजी देसाई सरकार बनी। बंगाल में भी असेंबली चुनाव हुए। सीपीआईएम की अगुवाई में लेफ्ट फ्रंट बना। 14 जून 1977 के चुनाव में 294 में से 200 सीट से ज्यादा सीटें लेफ्ट फ्रंट को मिली। कांग्रेस को सिर्फ 20। 21 जून 1977 को 63 साल के एक कम्युनिस्ट नेता ने मुख्यमंत्री की शपथ ली। नाम ज्योति बसु। बसु एक रईस घराने से आते थे। खुद बसु ने लंदन में बैरिस्ट्री पढ़ी थी। लेकिन इंडिया लौटकर रेल मजदूरों के बीच काम करने लगे। 23 साल 1977 से 2000 तक अकेले बसु ने पांच विधानसभा चुनाव जीते। उनके बाद बुद्धदेव भट्टाचार्य ने दो जीते। कुल मिलाकर लेफ्ट फ्रंट ने बंगाल में सात लगातार चुनाव जीते। 34 साल लगातार सत्ता। यह दुनिया की सबसे लंबे वक्त तक चलने वाली चुनाव से बनी कम्युनिस्ट सरकार थी। बसु की सरकार ने ऑपरेशन बर्गा चलाया। बटाईदार किसानों के नाम सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज किए गए ताकि जमींदार उन्हें मनमानी से ना निकाल सकें। बंगाल पहला राज्य था जहां पंचायतों के सीधे चुनाव हुए जून 1978 में। इस मॉडल ने गरीब किसानों, दलितों, खेत मजदूरों के बीच कांग्रेस का जो वोट था वो लेफ्ट फ्रंट की तरफ मोड़ दिया। लेकिन सीपीआईएम कैडर इतना ताकतवर हो गया कि जिले में कोई भी काम बिना पार्टी की मंजूरी के नहीं होता था। नौकरी, ट्रांसफर, राशन सब कुछ। लोग तंग आ गए और फिर आया सिंघूर और नंदीग्राम। 2006 में बुद्धदेव भट्टाचार्य की सरकार ने टाटा मोटर्स के लिए सिंघूर में और एक केमिकल हब के लिए नंदीग्राम में किसानों की जमीन लेने की कोशिश की। नंदीग्राम में मार्च 2007 में पुलिस फायरिंग में 14 लोग मारे गए। इसी आंदोलन से एक नेता राष्ट्रीय स्तर पर उभरी ममता बनर्जी। 2011 के विधानसभा चुनाव में ममता की तृणमूल कांग्रेस ने 184 सीटें जीती। लेफ्ट फ्रंट 62 पर सिमट गया। 34 साल पुराना लाल किला ढह गया। 

25 साल तक त्रिपुरा पर किया राज

बंगाल से वाम की विदाई के बाद भी एक राज्य अब भी बचा था त्रिपुरा। त्रिपुरा में सीपीआईएम ने पहली बार 1978 में सरकार बनाई थी। फिर 1993 से 2018 तक लगातार 25 साल। सीपीआईएम के नेतृत्व वाले लेफ्ट फ्रंट का राज रहा। मानिक सरकार 1998 से 2018 तक मुख्यमंत्री रहे। 20 साल मुख्यमंत्री रहने के बावजूद उनके नाम पर अपना घर नहीं था। 3 मार्च 2018 नतीजे आए। बीजेपी को 36 सीटें, सीपीआईएम को 16, विप्ल कुमार देव मुख्यमंत्री बने। इसके दो दिन बाद 5 मार्च को त्रिपुरा के बेलोनिया में लेनिन की एक बड़ी मूर्ति बुलडोजर से गिरा दी गई। यह एक प्रतीक था एक युग के अंत का। 2018 के बाद सीपीआईएम के पास सिर्फ केरल बचा था। 

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केरल में भी सत्ता हर 5 साल में बदलती रही है। 1980 के बाद से लगभग हर बार एक बार एलडीएफ, एक बार यूडीएफ। 2016 में पिनरई विजयन ने इस पैटर्न को तोड़ा। 2021 में दोबारा जीते। ये पहली बार था कि केरल में किसी मुख्यमंत्री ने लगातार दो बार वापसी की हो। लेकिन तीसरी बार वापसी मुश्किल थी। 2026 के चुनाव के पहले से ही एलडीएफ पर कई आरोप थे। गोल्ड स्मगलिंग केस, एसएफआई से जुड़े विवाद, बेरोजगारी और कांग्रेस नीत यूडीएफ अब बेहतर तरीके से एकजुट है। राहुल गांधी खुद वायनाड से सांसद थे और शायद इसलिए आज जो रुझान आ रहे हैं, वह कह रहे हैं कि केरल भी फिसल गया। इसी के साथ पूरे देश में लेफ्ट की एक सरकार भी नहीं बची है। लेफ्ट का पतन सिर्फ चुनावी हार नहीं है। यह एक विचारधारा का पीछे हटना है। एक जमाना था जब बंगाल का हर बच्चा होते ही जानता था कि लाल झंडा क्या है। जेएनयू से लेकर जाधवपुर तक कैंपस लाल थे। 2026 आते-आते बंगाल त्रिपुरा में इनकी स्थिति और कमजोर हो गई। हालांकि जमीन सुधार जैसे कामों में इनका ऐतिहासिक योगदान रहा है और इसने लाखों गरीबों को छत पहचान दी है। लेकिन सिंघूर और नंदीग्राम जैसे मामलों के बाद सब बदल गया। वहां विकास और किसान हितों के बीच संतुलन बिठाने में ये पार्टी असफल रही और फिर जनता ने महसूस किया कि जो पार्टी उनकी लड़ रही थी उनके खिलाफ खड़ी हो गई। आज इन राज्यों में इनका पक्का वोटर दूसरी पार्टियों की तरफ चला गया क्योंकि इन्हें वहां सुरक्षा और विकास की नई उम्मीदें नजर आ रही। 

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भ्रष्टाचार के आरोपों ने केरल सरकार की जड़े हिला दी

त्रिपुरा में भी भाजपा की जीत ने साबित किया कि केवल पुराने कार्यकर्ताओं के दम पर आप सालों तक राज नहीं कर सकते। अगर आपके पास युवा कार्यकर्ता नहीं है, नया विज़न नहीं है तो फिर धीरे-धीरे आपसे लोग मुंह मोड़ लेंगे और यही इनके साथ हुआ। लेकिन अब केरल में जो हार हुई वह सिर्फ चुनाव की हार नहीं है। यह उस भरोसे की हार है जो दशकों से बना हुआ था और वही भरोसा आज इनके अस्तित्व पर सवाल खड़ा कर रहा है। केरल के 2026 के चुनाव के नतीजों ने सभी को हिला दिया। पिनराई विजयन की छवि पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों ने सरकार की जड़े हिला दी। केरल की सबसे बड़ी समस्या आज उसकी आर्थिक हालत में छिपी है क्योंकि राज्य का कर्ज जो है वह 4 लाख करोड़ के पार जा चुका है। सरकार अपनी कमाई का करीब 20% हिस्सा केवल पुराने कर्ज का ब्याज चुकाने में खर्च कर रही है। केरल में पढ़ाई और सेहत की सुविधाएं तो अच्छी रही लेकिन वहां नौजवानों के लिए नई नौकरियां पैदा नहीं हो पाई और युवा आज भी खाड़ी देशों में नौकरी करने को मजबूर है क्योंकि उसके अपने राज्य में नए काम और नए निवेश के मौके नहीं। केरल मुफ्त सुविधाएं देने और कल्याणकारी योजनाओं का मॉडल अब वहां की अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ने लगा और इसी के चलते घाटा काबू से बाहर। महिलाओं और युवाओं में जो नाराजगी दिखी उसकी बड़ी वजह सबरीमाला का विवाद और वहां की उच्च शिक्षा में प्राइवेट सेक्टरी कमी दिखाई पड़ी। रही सही कसर भ्रष्टाचार ने पूरी कर दी। 

पिनरई विजयन पर आरएसएस कार्यकर्ता की हत्या का आरोप क्यों लगा था? 

साल 1970 का था। केरल में विधानसभा चुनाव हुए। पिनरई विजयन को भी कन्नूर की कुतुपरम सीट से सीपीएम ने टिकट दिया। विजयन पहली बार महज 26 साल की उम्र में विधायक बने। इन्हीं दिनों विजयन का नाम पहली बार एक पॉलिटिकल मर्डर से जुड़ा। इसी समय आरएसएस के एक कार्यकर्ता की हत्या में विजयन का नाम आया। साल 1967 में कम्युनिस्ट पार्टियों के दोबारा सत्ता में आने के बाद केरल की राजनीति बदलने लगी। आए दिन वहां सीपीएम और आरएसएस के कार्यकर्ताओं के बीच हिंसा की खबरें आने लगी। इसी हिंसा में वर्टिकल रामकृष्णन नाम से आरएसएस कार्यकर्ता की हत्या हो गई। रामकृष्णन पर कुल्हाड़ी से वार किया गया था। इसी हत्या में सीपीएम के कई नेताओं का नाम आया। इन नेताओं में पिनरई विजयन का नाम भी शामिल था। हालांकि अदालत में विजयन पर आरोप तय नहीं हो पाया और विजयन बरी हो गए।  

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लेफ्ट के कैडर में 50 साल से ऊपर लोगों का दबदबा

लेफ्ट की सबसे बड़ी ताकत उसका अनुशासित कैडर यानी कार्यकर्ता रहे। लेकिन आज वही कार्यकर्ता कमजोरी है। पार्टी के भीतर आंतरिक लोकतंत्र लगभग खत्म है। परिवारवाद की झलक दिख रही है। जिसने समर्पित कार्यकर्ताओं के मनोबल को तोड़ा। जमीन पर काम करने वाला कार्यकर्ता अब युवा नहीं रहा। वो बूढ़ा हो गया और आज के इंटरनेट और सोशल मीडिया वाली पीढ़ी से कोई जुड़ाव नहीं। आंकड़े कहते हैं कि लेफ्ट के कैडर में 50 साल से ऊपर लोगों का दबदबा बढ़ा है। जबकि 18 से 25 सालों की युवाओं का मोह भंग हुआ। आज भी 1970 के दशक के घिसे फूटे नारे दोहराए जा रहे हैं।

 

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