By नीरज कुमार दुबे | Feb 17, 2026
दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित हो रहे वैश्विक एआई सम्मेलन में दो दिन से चल रहे विचार मंथन से एक बात उभर कर आई है कि एआई के समक्ष खड़ी चुनौतियों के हल के लिए दुनिया भारत की ओर निहार रही है। देखना होगा कि सम्मेलन के अंत में दिल्ली डिक्लेरेशन से क्या निकल कर आता है। लेकिन यहां एक ओर बात की आवश्यकता महसूस हुई कि भारत को यदि इस क्षेत्र में नेतृत्व हासिल करना है तो बड़े निवेश और सरल तथा प्रभावी नीतियों की भी जरूरत है।
देखा जाए तो कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई अब केवल नई तकनीक का आकर्षण नहीं रही, बल्कि यह अर्थव्यवस्था, उद्योग, ऊर्जा, नीति और वैश्विक शक्ति संतुलन का केंद्र बन चुकी है। दुनिया के बड़े देश इसे रणनीतिक साधन की तरह देख रहे हैं। डाटा, कंप्यूटिंग शक्ति और उन्नत चिप आज के दौर का नया तेल बन चुके हैं। ऐसे समय में भारत के सामने मूल प्रश्न यह है कि वह एआई की दौड़ में केवल उपभोक्ता बन कर रहेगा या निर्माता और नेता की भूमिका निभाएगा।
भारत ने पहले भी तकनीकी मोड़ पर सही फैसले लेकर इतिहास बदला है। नब्बे के दशक में सूचना तकनीक और सॉफ्टवेयर सेवाओं पर जोर देने से लाखों रोजगार बने, भारतीय कंपनियां दुनिया भर में छा गईं और देश को नई पहचान मिली। आज एक वैसा ही मोड़ फिर सामने है, लेकिन इस बार दांव कहीं बड़ा है। एआई न केवल सेवाओं को, बल्कि कारखानों, आपूर्ति श्रृंखलाओं, दवा उद्योग, परिवहन और ऊर्जा व्यवस्था तक को बदल सकती है।
यह समझना जरूरी है कि एआई एक ही तरह की चीज नहीं है। उपभोक्ता एआई, जैसे चैट टूल या मनोरंजन आधारित अनुप्रयोग, तेजी से लोकप्रिय होते हैं, पर इन पर अक्सर कुछ ही बड़ी कंपनियों का दबदबा हो जाता है। इसके विपरीत औद्योगिक एआई हर क्षेत्र के लिए अलग समाधान मांगती है। हर उद्योग का अपना डाटा, अपनी समस्या और अपना कामकाज होता है। इसलिए क्षेत्र विशेष मॉडल बनते हैं। यही भारत की ताकत बन सकती है, क्योंकि यहां उद्योगों की विविधता और पैमाना दोनों मौजूद हैं।
उदाहरण के लिए दो पहिया वाहन उद्योग को लें। भारत दुनिया के सबसे बड़े दो पहिया बाजारों में है। यह क्षेत्र रोजगार, शहरीकरण और आय वृद्धि से जुड़ा है। अब इलेक्ट्रिक दो पहिया का चलन भी बढ़ रहा है। ऐसे में एआई आधारित मांग अनुमान, डिजाइन सुधार, गुणवत्ता जांच और आपूर्ति प्रबंधन से भारी लाभ हो सकता है। मशीन लर्निंग सिस्टम खराबी का पहले ही संकेत दे सकते हैं। इससे ठहराव घटता है, लागत कम होती है और उत्पादन तेज होता है।
दवा उद्योग में भी अवसर विशाल हैं। भारत जेनेरिक दवाओं का बड़ा उत्पादक है, पर गुणवत्ता बनाए रखना चुनौती रहता है। एआई आधारित विजन सिस्टम उत्पादन के दौरान सूक्ष्म दोष पकड़ सकते हैं। डाटा विश्लेषण से प्रक्रिया स्थिर रखी जा सकती है। रोबोटिक ऑटोमेशन दोहराव वाले काम सुरक्षित और सटीक तरीके से कर सकता है। इससे भारत की विश्वसनीयता बढ़ेगी और ऊंचे मूल्य वाले बाजार खुलेंगे।
लेकिन एआई की ताकत केवल सॉफ्टवेयर से नहीं आती, इसके लिए भारी कंप्यूटिंग शक्ति चाहिए, जो उन्नत चिप यानी जीपीयू से मिलती है। ये चिप बहुत महंगी होती हैं। एक उन्नत जीपीयू की कीमत लाखों रुपये तक जा सकती है। भारत ने हजारों जीपीयू लगाए हैं और डाटा केंद्र तेजी से बढ़ रहे हैं। पिछले वर्ष डाटा केंद्रों ने बिजली ग्रिड से भारी मात्रा में बिजली ली, जो किसी बड़े शहर की मांग के बराबर बैठती है। आने वाले वर्षों में यह मांग कई गुना बढ़ सकती है। यह भारत की बढ़ती डिजिटल क्षमता का संकेत है, पर साथ ही ऊर्जा चुनौती का भी।
अगर भारत को एआई में अग्रणी बनना है तो केवल कुछ हजार जीपीयू काफी नहीं होंगे। अमेरिका आज भी इस क्षेत्र में आगे है। उसके पास विशाल डाटा केंद्र क्षमता है और वह उन्नत जीपीयू की आपूर्ति पर नियंत्रण रखता है। इसी कारण वह तकनीकी बढ़त बनाए हुए है। चीन को रोकने की रणनीति में भी चिप आपूर्ति अहम रही है।
चीन ने भी इस दौड़ को बहुत पहले समझ लिया था। उसने चिप निर्माण में भारी निवेश किया। उसकी बड़ी तकनीकी कंपनियां अपने एआई चिप बना रही हैं। भले वे अभी सबसे उन्नत स्तर पर न हों, पर तेजी से आगे बढ़ रही हैं। अमेरिका में भी बड़ी तकनीकी कंपनियां खुद चिप डिजाइन में उतर चुकी हैं। ऐसे माहौल में यदि भारत केवल पुराने स्तर की चिप बनाता रह गया तो वह पीछे छूट सकता है।
तो क्या समाधान है? क्या हमें अपनी आकांक्षा घटा लेनी चाहिए? कुछ लोग कहते हैं कि भारत की प्रति व्यक्ति बिजली खपत अभी विकसित देशों से कम है। जैसे जैसे लोग समृद्ध होंगे, उन्हें घरों में अधिक बिजली चाहिए होगी। अगर एआई के कारण बिजली महंगी हुई तो जीवन स्तर प्रभावित हो सकता है। यह चिंता सही है, पर इसका मतलब यह नहीं कि हम पीछे हट जाएं।
दरअसल जरूरत बड़े सोच की है। भारत को एक साथ दो मोर्चों पर काम करना होगा। पहला, घरेलू चिप निर्माण और डिजाइन को बढ़ावा देना। इसके लिए नीति समर्थन, निवेश और कौशल विकास जरूरी है। दूसरा, ऊर्जा ढांचा मजबूत करना। नवीकरणीय ऊर्जा, परमाणु ऊर्जा, बेहतर ग्रिड और भंडारण तकनीक पर जोर देना होगा ताकि डाटा केंद्रों की मांग पूरी हो सके।
इसके साथ ही एआई का लाभ केवल बड़ी कंपनियों तक सीमित न रहे। मध्यम और छोटे उद्योगों तक भी पहुंचे। इसके लिए साझा प्लेटफॉर्म, क्लाउड ढांचा और क्षेत्र विशेष समाधान जरूरी हैं। सरकार, उद्योग और शिक्षण संस्थानों को मिल कर काम करना होगा। शोध संस्थान मॉडल विकसित करें, उद्योग वास्तविक समस्याएं और डाटा दें, और सरकार नियम, प्रोत्साहन तथा अवसंरचना दे।
भारत को ऐसे नेतृत्व की भी जरूरत है जो अलग अलग पक्षों को जोड़ सके और भरोसा बना सके। एआई को नौकरी छीनने वाली नहीं, बल्कि नई क्षमता देने वाली तकनीक के रूप में समझाना होगा। कौशल प्रशिक्षण, पुन: प्रशिक्षण और शिक्षा सुधार पर जोर देना होगा।
बहरहाल, अब सवाल यह है कि एआई की दिशा कौन तय करेगा? अगर भारत ने समय रहते साहसिक फैसले लिए, चिप निर्माण, ऊर्जा ढांचा और औद्योगिक एआई पर जोर दिया, तो वह केवल तकनीक का बाजार नहीं रहेगा, बल्कि दिशा देने वाला देश बन सकता है। आईटी क्रांति ने भारत को विश्व मंच पर जगह दी थी। एआई और उन्नत कंप्यूटिंग भारत को आर्थिक शक्ति और तकनीकी आत्मनिर्भरता के नए दौर में पहुंचा सकती है। अवसर हमारे सामने है। अब निर्णय और क्रियान्वयन हमारी जिम्मेदारी है।
- नीरज कुमार दुबे