Hormuz बंद, Bab el-Mandeb पर Houthis का कब्जा, Saudi Arabia पर दे दनादन हमले, दुनिया की बढ़ी टेंशन

By नीरज कुमार दुबे | Sep 14, 2026

पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष की आग अब खाड़ी से निकलकर यमन और सऊदी अरब तक पहुंच चुकी है और दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति के दो सबसे संवेदनशील समुद्री मार्गों पर संकट गहराता जा रहा है। ताजा खबर यह है कि होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर ईरान और खाड़ी देशों के बीच प्रस्तावित बातचीत टल गई है वहीं ईरान समर्थित हूती लड़ाकों ने सऊदी अरब पर एक और बड़ा हमला कर दिया है। इस घटनाक्रम ने साफ कर दिया है कि तेहरान ने युद्ध को केवल सैन्य संघर्ष नहीं रहने दिया, बल्कि इसे ऊर्जा, समुद्री व्यापार और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था पर दबाव बनाने के हथियार में बदल दिया है।

इसे भी पढ़ें: BRICS में भारत की शानदार कूटनीतिक सफलता ने 'Brand Modi' को और मजबूत कर दिया है

इसका असर समुद्री यातायात पर साफ दिखाई देने लगा है। सप्ताहांत में होर्मुज से गुजरने वाले मालवाहक जहाजों की संख्या घटकर प्रतिदिन एक अंक तक पहुंच गई, जबकि दस दिनों का औसत करीब 14 जहाज प्रतिदिन था। हम आपको बता दें कि युद्ध शुरू होने से पहले इस जलडमरूमध्य से रोजाना लगभग 125 बड़े वाणिज्यिक जहाज गुजरते थे। दुनिया के कुल दैनिक कच्चे तेल और द्रवीकृत प्राकृतिक गैस की करीब पांचवीं हिस्सेदारी इसी मार्ग से होकर गुजरती है।

यानी होर्मुज पर ईरान का दबाव केवल अरब देशों के लिए खतरा नहीं है, बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था की कमजोर नस पर सीधा प्रहार है। तेल आपूर्ति में मामूली व्यवधान भी कीमतों को ऊपर धकेल सकता है और लंबे समय तक संकट रहने पर महंगाई, परिवहन लागत तथा औद्योगिक उत्पादन पर व्यापक असर पड़ सकता है।

ईरान के इस दबाव के बीच हूती लड़ाकों ने सऊदी अरब के खमीस मुशैत स्थित सैन्य अड्डे को निशाना बनाया। हूतियों ने दर्जनों मिसाइलों और ड्रोन से हमला करने का दावा किया और इसे यमन पर सऊदी हवाई हमलों का जवाब बताया। सऊदी अरब ने अपने दक्षिणी इलाकों में आपात चेतावनियां भी जारी कीं। इससे स्पष्ट है कि युद्ध अब यमन के भीतर ही नहीं, बल्कि सीधे सऊदी क्षेत्र की सुरक्षा को चुनौती देने लगा है।

सबसे गंभीर घटनाक्रम इससे भी बड़ा है। हूतियों ने लाल सागर के मुहाने पर स्थित रणनीतिक पेरिम द्वीप पर कब्जा कर लिया है। यह द्वीप बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य के भीतर स्थित है, जो यूरोप, एशिया और मध्य पूर्व के बीच समुद्री व्यापार की प्रमुख धुरी है। इस क्षेत्र पर पकड़ का अर्थ है कि ईरान समर्थित हूती अब केवल यमन में सैन्य शक्ति नहीं रह गए, बल्कि वैश्विक समुद्री व्यापार को प्रभावित करने की क्षमता रखने वाली ताकत बन गए हैं।

यहीं से इस पूरे संकट का सबसे खतरनाक सामरिक पहलू सामने आता है। एक तरफ ईरान होर्मुज को दबाकर खाड़ी से निकलने वाले तेल पर नियंत्रण का दबाव बना रहा है, दूसरी तरफ उसके सहयोगी हूती बाब-अल-मंदेब के जरिए लाल सागर के समुद्री मार्ग को निशाना बना रहे हैं। यानी ऊर्जा आपूर्ति के दोनों प्रमुख रास्तों पर एक साथ दबाव बनाया जा रहा है। यह महज संयोग नहीं माना जा सकता। क्षेत्रीय विश्लेषकों के अनुसार, इससे ईरान और हूतियों को तेल की कीमतें बढ़ाने, महंगाई को हवा देने और खाड़ी देशों को आर्थिक संकट में धकेलने की अतिरिक्त क्षमता मिलती है।

उधर, सऊदी अरब की स्थिति इसलिए और कठिन हो गई है क्योंकि उसने होर्मुज के संकट से बचने के लिए अपने कच्चे तेल का बड़ा हिस्सा लाल सागर के बंदरगाहों की ओर मोड़ दिया था। लेकिन शुक्रवार को उस पूर्व-पश्चिम तेल पाइपलाइन पर हमला हुआ, जिसे होर्मुज के विकल्प के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा था। इसके बंद होने से सऊदी तेल निर्यात के वैकल्पिक रास्ते पर भी खतरा पैदा हो गया है। बाजार विशेषज्ञों का अनुमान है कि पाइपलाइन कुछ ही दिनों में बहाल नहीं हुई तो वैश्विक तेल आपूर्ति का करीब चार प्रतिशत प्रभावित हो सकता है।

इसका सीधा असर तेल बाजार पर पड़ा। आज बाजार खुलते ही कच्चे तेल की कीमतों में तीन प्रतिशत से अधिक की उछाल दर्ज की गई। अमेरिका में डीजल की औसत खुदरा कीमत भी नए सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गई। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हालांकि दावा किया है कि युद्ध इस वर्ष समाप्त हो सकता है और इसके बाद ईंधन की कीमतें तेजी से नीचे आएंगी। लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी संकेत दिया कि अमेरिका ईरान में लंबे समय तक मौजूद रहकर वहां के तेल संसाधनों पर नियंत्रण बनाए रखने के विकल्प पर विचार कर सकता है।

यही अमेरिकी नीति की सबसे बड़ी उलझन है। वाशिंगटन सऊदी अरब जैसे सहयोगियों को हूतियों से बचाना चाहता है, लेकिन यमन में सीधे उतरकर युद्ध का एक नया मोर्चा खोलने से भी बच रहा है। सऊदी नेतृत्व की ओर से हस्तक्षेप की मांग के बावजूद अमेरिका ने अब तक हूतियों के खिलाफ सीधी सैन्य कार्रवाई से दूरी बनाए रखी है। इसका एक कारण यह भी है कि पहले के सैन्य अभियान के बाद अमेरिका युद्ध को दोबारा फैलाने के जोखिम से बचना चाहता है।

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा रणनीतिक निष्कर्ष यही है कि ईरान ने युद्ध का भूगोल और युद्ध की कीमत दोनों बदल दी हैं। होर्मुज पर दबाव और बाब-अल-मंदेब में हूतियों की बढ़ती पकड़ मिलकर खाड़ी देशों के सामने बेहद कठिन विकल्प खड़ा कर रही है। या तो वे बढ़ती आर्थिक और सुरक्षा लागत झेलें या फिर तेहरान से बातचीत का रास्ता अपनाएं। ओमान में प्रस्तावित बैठक का टलना बताता है कि अभी क्षेत्रीय सहमति बनना आसान नहीं है।

इस संकट की मानवीय कीमत भी भयावह है। हूतियों के पश्चिमी यमन में तेजी से बढ़ते कब्जे के कारण हजारों लोग अपने घर छोड़कर विस्थापित शिविरों की ओर भाग रहे हैं। सितंबर की शुरुआत से ही 82 हजार से अधिक लोगों के विस्थापित होने का अनुमान है।

उधर, परमाणु मोर्चे पर भी तनाव कम नहीं हुआ है। अंतरराष्ट्रीय परमाणु निरीक्षण व्यवस्था के साथ ईरान के संबंध लगातार बिगड़ रहे हैं और उसके परमाणु प्रमुख के अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के सम्मेलन में शामिल होने को लेकर भी विवाद खड़ा हो गया है।

बहरहाल, पश्चिम एशिया अब एक ऐसे खतरनाक मोड़ पर खड़ा है जहां युद्ध की असली ताकत मिसाइलों से कहीं आगे बढ़ चुकी है। होर्मुज पर ईरान का शिकंजा, बाब-अल-मंदेब पर हूतियों की पकड़, सऊदी तेल ढांचे पर हमले और अमेरिका की अनिश्चित रणनीति, ये सभी मिलकर वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था को दबाव में ला रहे हैं। अगर यही सिलसिला जारी रहा तो यह युद्ध केवल पश्चिम एशिया का युद्ध नहीं रहेगा; इसका अगला मोर्चा वैश्विक तेल बाजार, समुद्री व्यापार और दुनिया की महंगाई हो सकता है।

प्रमुख खबरें

Gold Price में तीसरे हफ्ते गिरावट जारी, ग्लोबल स्तर पर 4300 Dollar प्रति औंस के नीचे फिसला

AI तकनीक पर US और China में टकराव, Anthropic प्रमुख के बयान से विवाद गहराया

विशाल चतुर्वेदी बनाएंगे फिल्म ‘Rambola’, तुलसीदास के जीवन पर आधारित होगी कहानी

World Wrestling Championship Trials में Nishu जीतीं, Antim Panghal से होगा फाइनल मुकाबला