के घर कब आओगे...मंगल-चांद पर कदम, त्योहारों पर घर पहुंचना किसी इम्तिहान से नहीं कम!

By अभिनय आकाश | Nov 06, 2026

परदेस में पसीना बहाते हर इंसान के लिए साल के 365 दिन एक तरफ... और दीवाली-छठ के वो चार दिन एक तरफ। सीने में धड़कता हुआ बस एक ही सपना होता है, घर लौटना। दिल की ट्रेन पर घर जाने की तड़प हो और मां-बाप के फोन बज रहे हो कि बेटा घर कब आओगे। लेकिन इस मुल्क में एक आम परदेसी के लिए घर लौटने का रास्ता किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होता। रात के 9:15 की ट्रेन थी। गोदी में 8 महीने का मासूम बच्चा और साथ में पत्नी। घर से तो यही सोचकर निकले थे कि एक घंटा पहले नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुँच जाएंगे तो सुकून से बैठेंगे, लेकिन स्टेशन के बाहर का नज़ारा देखते ही जैसे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। स्टेशन के मुख्य गेट से लेकर बाहर सड़क तक फैलीं यात्रियों की अनगिनत, कभी न खत्म होने वाली कतारें। दिवाली और छठ का त्योहार सिर पर हो, तो परदेस में कमाने वाले हर बिहारी के दिल में बस एक ही धुन बजती है। घर पहुँचने की इसी बेताबी के बीच जब स्टेशन के बाहर इंसानों का समंदर देखा, तो दिल डूबने लगा। लगा कि महीनों की तपस्या, तत्काल टिकट की वो जद्दोजहद और माँ के हाथ के ठेकुए का स्वाद सब एक पल में बिखर जाएगा। ट्रेन छूटने का खौफ ऐसा था कि एक हाथ से बच्चे को सीने से कसकर भींचे हुए थे और दूसरे हाथ से बार-बार जेब में रखे बटुए को टटोल रहे थे। नज़रें घड़ी की सुइयों पर टिक कर रह गई थीं, जो बेरहमी से आगे भाग रही थीं। तभी उस आपाधापी और शोर के बीच लाल कुर्ते वाले एक कुली की आवाज़ कानों में पड़ी भईया, कितने बजे की गाड़ी है? 9:15 वाली? भूल जाइए, इस लाइन में खड़े रहे तो ट्रेन छूट जाएगी। 500 रुपये दीजिए, सीधे प्लेटफॉर्म पर उतार देंगे। हमारे पास कोई भारी अटैची या बोरिया-बिस्तर नहीं था जिसे उठाने के लिए कुली की दरकार होती। कंधे पर एक छोटा बैग था और सीने से लगा वो नन्हा सा बच्चा। लेकिन उस वक्त 500 रुपये सामान ढोने के नहीं, बल्कि उस बूढ़ी माँ की उम्मीदों को ज़िंदा रखने की कीमत थी जो दरवाज़े पर आँखें बिछाए बैठी थी। महीनों पहले कंफर्म कराए टिकट और साल भर के इंतज़ार के सामने वो 500 रुपये बहुत छोटे लगे। हमने हामी भर दी। वो कुली हमें भीड़ से काटकर, घुमावदार रास्तों और पिछले गेट से होते हुए सीधे प्लेटफॉर्म पर ले आया। ट्रेन सामने खड़ी देख आँखों में एक अजीब सी नमी तैर गई।

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त्यौहार सबके लिए खुशी नहीं होती और ट्रेन का सफर सबके लिए आरामदायक नहीं होता।  रेलवे स्टेशन पर उमड़ती भीड़, ट्रेन में चढ़ने की मारामारी और सीट पाने की कोशिश यात्रियों की मुश्किलें बढ़ा देती हैं। सोशल मीडिया पर ऐसे ही कई वीडियो तेजी से वायरल हो रहे हैं, जिनमें रेलवे स्टेशन पर दिखाई दे रही भीड़ को देखकर कोई भी हैरान हो जाएगा। हर साल की तरह इस साल भी दिवाली के मौके पर यूपी बिहार की तरफ जाने वाली ट्रेनों जनरल डिब्बे में लोगों के लिए सफर करना मुश्किल साबित हो रहा है।  जैसे जैसे दीवाली और छठ नजदीक आ रहा है, स्टेशन और ट्रेनों में भीड़ बढ़ती जा रही है। इंडियन रेलवे ने दिल्ली एनसीआर में आने वाले छह बड़े रेलवे स्टेशन पर प्लेटफॉर्म टिकट की बिक्री पर 14 नवंबर तक रोक लगा दी है,जिससे की भीड़ को कंट्रोल किया जा सके। वैसे तो भारत उन चुनिंदा विकसित देशों में से एक है जिसने चांद पर अपना यान पहुंचाया है। भारत ने चांद और मार्स पर पहुंचने का रास्ता तो खोज लिया है, लेकिन विडंबना देखिए भारत आज भी अपने रहवासियों को त्यौहार और तीज के मौके पर उन्हें घर पर सुरक्षित और आराम से पहुंचाने का रास्ता नहीं खोज पा रहा है। हाईटेक टेक्नोलॉजी के दौर में भारत ने अभी तक ऐसी कोई टेक्नोलॉजी विकसित नहीं की है, जिसके बदौलत देश के आम नागरिकों को एक कंफर्म टिकट मिल जाए या फिर एक डिग्निटी के साथ वो जनरल बागी में भी एक सीट पर बैठकर सफर कर सके। यह सवाल इसलिए उठता है क्योंकि हमारे देश में जब-जब कोई परदेसी दिवाली या छठ पर अपने घर जाने की सोचता है, तो उसे हर कदम पर लाचारी और शोषण का ही सामना करना पड़ता है। और यह कोई नई बात नहीं है। आपमें से भी शायद ही कोई ऐसा होगा जिसने कभी घर जाने के लिए टिकट देखा हो और लंबी वेटिंग लिस्ट देखकर दिल न बैठा हो, या फिर फ्लाइट और बसों के आसमान छूते किराए देखकर जेब ने जवाब न दे दिया हो।

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खासकर यूपी और बिहार की तरफ जाने वाले लोग तो बरसों से यही रोना रो रहे हैं कि भाई, ट्रेन में सीट मिलना तो दूर, खड़े होने की जगह नहीं मिलती और फ्लाइट का किराया ऐसा हो जाता है मानो विदेश का टिकट कटा रहे हों। जबकि सच यह है कि दिवाली और छठ की तारीखें पंचांग में साल भर पहले से छपी होती हैं। सबको पता होता है कि किस दिन त्योहार है। ट्रेनों के टिकट भी दो-चार महीने पहले खुल जाते हैं। तो फिर सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हमारे देश के रेलवे सिस्टम को यह अंदाजा नहीं होता कि इन रूटों पर कितने लाख लोग अपने घर लौटेंगे? अगर उन्हें पता होता है, तो फिर हर साल स्पेशल ट्रेनों के कागज़ी ऐलानों के बावजूद ट्रेनों में पैर रखने की जगह क्यों नहीं होती? खड़े होने की जगह की लड़ाई तो ट्रेन आने के बाद शुरू होती है, उससे पहले की असली जंग तो टिकट खिड़की पर लड़ी जाती है। आम इंसान सुबह 10 और 11 बजे तत्काल टिकट के लिए उंगलियां थामकर बैठता है, और दो मिनट के भीतर सारी सीटें गायब हो जाती हैं। दलाल और अवैध सॉफ्टवेयर वाले पूरे कोटे को मिनटों में हड़प जाते हैं। आखिर आम आदमी और इन दलालों के बीच यह जंग कब खत्म होगी? रेलवे का तंत्र इन अवैध सॉफ्टवेयरों और दलालों के सामने लाचार कब तक बना रहेगा? और कब तक एक सीधा-साधा नागरिक अपनी बेबसी पर आंसू बहाता रहेगा? अगर ट्रेन का टिकट न मिले, तो दूसरा रास्ता क्या बचता है? प्राइवेट बसें या फ्लाइट। लेकिन वहां तो खुली लूट मची होती है। सरकार ने आज तक फ्लाइट के डायनामिक फेयर और प्राइवेट बसों की मनमानी वसूली पर कोई लगाम क्यों नहीं लगाई? कोई कैप (अधिकतम सीमा) क्यों तय नहीं की जाती? त्योहार आते ही हर टिकट तीन गुना, चार गुना महंगा क्यों हो जाता है? क्या इस मनमाने मुनाफे और खुले शोषण को रोकने वाला कोई नहीं है? ज़रा उस इंसान के बारे में सोचिए जो बड़े शहरों में 15,000, 20,000 या 25,000 रुपये महीने की नौकरी करता है। क्या उसे साल भर की मेहनत के बाद सिर्फ एक बार अपने बूढ़े मां-बाप और बच्चों से मिलने के लिए अपनी पूरी एक महीने की कमाई सिर्फ आने-जाने के किराए में फूंक देनी चाहिए? देश इतनी तरक्की कर रहा है,  डिजिटल इंडिया और हाई-स्पीड नेटवर्क की बातें करते हैं... लेकिन हकीकत यह है कि जब अपने ही देश में एक आम नागरिक को अपने घर जाने के लिए गिड़गिड़ाना पड़े, अपनी जेब कटवानी पड़े और जानवरों की तरह ठुंसकर सफर करना पड़े, तो फिर तरक्की के सारे दावे खोखले लगने लगते हैं। आखिर यह सिलसिला कब थमेगा?

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महापर्व पर अपनों से मिलने की बेताबी और बेबस पटरियां

परदेस में साल भर पसीना बहाने वाले हर बिहारी और पूर्वांचली के लिए दीवाली-छठ सिर्फ त्योहार नहीं, घर लौटने का एक नाज़ुक अहसास है। यही वजह है कि त्योहारों का मौसम शुरू होते ही महानगरों के स्टेशनों पर सैलाब सा उमड़ पड़ता है। चार महीने पहले की बुकिंग हो या तत्काल की माथापच्ची, सीटें मिनटों में खत्म हो जाती हैं, लेकिन घर जाने की ज़िद कम नहीं होती। कन्फर्म सीट न मिलने पर भी लोग इस आस में स्टेशन पहुँच जाते हैं कि किसी तरह ट्रेन के पायदान पर भी जगह मिल जाए तो माँ के पास पहुँच जाएंगे। इसी मजबूरी के चलते आरक्षित बोगियों और जनरल कोचों का फर्क मिट जाता है और पूरी ट्रेन ठसाठस भीड़ का शिकार बन जाती है। तो सवाल यह उठता है कि यह समस्या हर साल ही क्यों पैदा होती है? छठ और दिवाली के मौकों पर स्पेशल ट्रेनों, किराए में रियायतों और तमाम बड़े-बड़े दावों की बातें होती हैं। हर बार यही दिलासा दिया जाता है कि अगली बार सब ठीक कर लेंगे, अगली बार बेहतर इंतज़ाम होंगे। अरे भाई, दिवाली का त्योहार तो घर लौटने का पर्व होना चाहिए, खुशियों और उल्लास का त्योहार होना चाहिए। फिर यह जद्दोजहद और जंग जैसी नौबत क्यों? एक ऐसी जंग, जिसमें जो जीतता है उसकी जेब खाली हो जाती है और जो हार जाता है वह मायूस चेहरा लेकर स्टेशन से लौटता है।

यह परेशानी हर एक साल सामने आती है

10 नवंबर के आसपास दिल्ली से पटना का हवाई किराया लगभग 20,000 रुपये तक पहुँच चुका है। भारत में एक अकुशल मजदूर  की महीने भर की कमाई करीब 10,000 रुपये होती है। तो क्या वह सिर्फ एक बार घर जाने के लिए अपनी पूरी एक महीने की मजदूरी फूंक दे? और हर कोई तो फ्लाइट का टिकट नहीं खरीद सकता। ऐसे में आम इंसान बसों की तरफ उम्मीद भरी नज़रों से देखता है। लेकिन जिन बसों का किराया 1,000 से 1,500 रुपये होता था, वो सीधे 4,000 से 5,000 रुपये तक पहुँच चुका है और यह किराया सिर्फ एक सवारी का है। अगर परिवार में तीन या चार लोग हों, तो आदमी वहीं बर्बाद हो जाए। इन सब हालात के बीच इंसान रेलवे की ओर रुख करता है। उसे लगता है कि ट्रेन तो सरकारी है, सस्ती है और आसानी से मिल जाएगी; लेकिन ट्रेन के टिकट का कहीं नामोनिशान नहीं मिलता। बुकिंग 60 दिन पहले खुलती है, फिर भी टिकट हाथ नहीं आता। यूपी और बिहार के रूटों पर तो कभी सीट मिलती ही नहीं। इंसान सोचता है कि चलो तत्काल में कोशिश कर लेते हैं, लेकिन वहां भी दाल नहीं गलती। फिर लाचार होकर उसी दलाल के पास जाना पड़ता है जिसके पास वह ऑटोमेटेड बॉट सॉफ्टवेयर होता है। वो चुटकियों में सारी सीटें झपट लेते हैं। इस मुद्दे पर हमने पहले भी चर्चा की है। खुद रेल मंत्री ने माना था कि IRCTC से 3 करोड़ से ज़्यादा फर्जी अकाउंट्स को हटाया गया। लेकिन उसके बाद भी दलालों का धंधा खत्म नहीं हुआ, बस उनके तौर-तरीके और पैंतरे बदल गए। सरकार कहती है कि वे रिकॉर्ड संख्या में स्पेशल ट्रेनें चला रहे हैं। लेकिन अगर इतनी ही स्पेशल ट्रेनें चल रही हैं, तो फिर स्टेशनों पर इंसानों का यह सैलाब क्यों है? हर साल का एक साफ डेटा पैटर्न तो सामने होता ही है कि कितने लाख लोगों ने टिकट बुक करने की कोशिश की और कितने वेटिंग में रह गए। तो क्या उपलब्ध सीटों से ज़्यादा यात्रियों की इस संख्या को ध्यान में रखकर पहले से ठोस योजना नहीं बनाई जा सकती थी? जब आम आदमी को तत्काल से भी राहत नहीं मिलती, तब रेलवे स्पेशल ट्रेनें चलाता है। यह बात भी ठीक है।

पिछले साल भी हमने क्या देखा?

सूरत, मुंबई, नई दिल्ली और आनंद विहार जैसे स्टेशनों पर बेकाबू भगदड़ मची। लोग पटरियों पर गिर रहे थे, बच्चे भीड़ में दब रहे थे और कई स्टेशनों से तो ऐसी तस्वीरें सामने आईं जिन्होंने इंसानियत को झकझोर कर रख दिया। क्या स्पेशल ट्रेनों का मतलब सिर्फ यह है कि आप एक आखिरी वक्त पर कागज़ पर ट्रेन का नंबर जारी कर दें, जो घंटों लेट चले और जिसमें बैठने की बुनियादी व्यवस्था तक न हो? जब सरकार के पास हर रूट का रियल-टाइम डेटा मौजूद है, जब IRCTC के सर्वर पर यह साफ दिखता है कि किस तारीख को दिल्ली-पटना, मुंबई-दरभंगा या सूरत-गोरखपुर रूट पर मांग 400% बढ़ जाती है, तो फिर यह 'क्राइसिस मैनेजमेंट' हर साल आखिरी हफ्ते में ही क्यों शुरू होता है? क्यों नहीं दो महीने पहले से रेगुलर ट्रेनों के फेरे बढ़ा दिए जाते? क्यों जनरल और स्लीपर कोचों की संख्या घटाकर केवल एसी कोचों को प्राथमिकता दी जा रही है, जबकि त्योहारों पर घर लौटने वाला सबसे बड़ा तबका वही मजदूर और मध्यम वर्ग है जिसकी जेब एसी के टिकट का बोझ नहीं उठा सकती? यह सिर्फ एक टिकट की मारामारी नहीं है, यह एक आम नागरिक की गरिमा का सवाल है। एक इंसान जो साल के 360 दिन परदेस में रहकर इस देश के विकास की रीढ़ बना हुआ है। सड़कें बना रहा है, फैक्ट्रियां चला रहा है, दफ्तरों में खट रहा है। क्या वह साल में सिर्फ एक बार अपने बूढ़े मां-बाप के चरण छूने और बच्चों के साथ दीया जलाने का हक भी खो चुका है?
 

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