सुभाष चंद्रा की समाधान योजना पर NCLT के फैसले को बैंकों ने NCLAT में दी चुनौती

By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Aug 31, 2026

एस्सेल समूह के चेयरमैन सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत दिवाला समाधान प्रक्रिया से असहमत बैंकों ने सोमवार को राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) में याचिका दायर की। याचिका में राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण के उस आदेश को चुनौती दी गयी है, जिसमें करीब 22,006.57 करोड़ रुपये के बैंकों दावों के मुकाबले चंद्रा को 6.5 करोड़ रुपये के भुगतान की योजना को मंजूरी दी गई है। एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सोमवार सुबह कार्यवाहक चेयरपर्सन न्यायमूर्ति योगेश खन्ना की अध्यक्षता वाली अपीलीय न्यायाधिकरण की पीठ के समक्ष मामले का उल्लेख किया और तत्काल सुनवाई का अनुरोध किया।

इससे पहले सोमवार को एनसीएलटी की विशेष पीठ ने औपचारिक आदेश पारित कर दिया। इसमें तीसरे सदस्य नीलेश शर्मा के फैसले को शामिल किया गया, जिन्होंने न्यायिक सदस्य अशोक कुमार भारद्वाज और तकनीकी सदस्य रीना सिन्हा पुरी के बीच मतभेद वाले फैसले के बाद चंद्रा की भुगतान योजना के पक्ष में फैसला दिया था। एनसीएलटी का अंतिम आदेश अभी न्यायाधिकरण के पोर्टल पर नहीं डाला गया है।

शर्मा ने पिछले मंगलवार को तीसरे सदस्य के रूप में फैसला देते हुए आईबीसी की धारा 114 के तहत योजना को मंजूरी दी थी। उन्होंने वित्तीय संस्थानों की उस आपत्ति को खारिज कर दिया था कि प्रस्तावित वसूली इतनी कम है कि योजना को मंजूरी नहीं दी जानी चाहिए। शर्मा ने एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस के नेतृत्व वाले असहमत वित्तीय संस्थानों के दावों को भी खारिज कर दिया।

बैंकों ने योजना को ‘अव्यावहारिक और गैरकानूनी’ बताते हुए आपत्ति जताई थी। वित्तीय संस्थानों ने दलील में कहा था कि करीब 22,006.57 करोड़ रुपये के स्वीकृत दावों के मुकाबले भुगतान योजना में वित्तीय संस्थानों को केवल 6.25 करोड़ रुपये और प्रक्रिया की लागत के लिए 25 लाख रुपये देने का प्रस्ताव है। एनसीएलटी के आदेश में एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस की दलील दर्ज करते हुए कहा गया कि उसके 1,322.39 करोड़ रुपये के स्वीकृत दावे के मुकाबले प्रस्तावित भुगतान केवल 38,09,294 रुपये, यानी उसके बकाया का करीब 0.028 प्रतिशत है।

फैसले पर असहमति जताने वाले वित्तीय संस्थानों ने यह भी आरोप लगाया कि एस्सेल समूह के चेयरमैन चंद्रा के परिवार से जुड़ी पांच इकाइयों के पास कुल मतदान अधिकार का 61.78 प्रतिशत हिस्सा है। उन्होंने चंद्रा की व्यक्तिगत दिवाला समाधान योजना को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। योजना में केवल 6.5 करोड़ रुपये के भुगतान का प्रस्ताव है।

वित्तीय संस्थानों का तर्क था कि ये पांचों संस्थाएं चंद्रा के सहयोगी या संबंधित पक्ष हैं और उन्हें पुनर्भुगतान योजना पर मतदान से रोकना चाहिए था। उनके मतों से कर्जदाताओं की समिति (सीओसी) में योजना को कुल 80.814 प्रतिशत मंजूरी मिली थी। ये पांच इकाइयां वीणा इन्वेस्टमेंट्स प्राइवेट लि., डायरेक्ट मीडिया डिस्ट्रिब्यूशन वेंचर्स प्राइवेट लि., वर्ल्ड क्रेस्ट एडवाइजर्स एलएलपी, लेमोनेड कैपिटल एडवाइजर्स एलएलपी और कॉर्पकॉल कैपिटल एडवाइजर्स एलएलपी हैं।

एचडीएफसी बैंक और आईडीबीआई ट्रस्टीशिप सर्विसेज के नेतृत्व वाले असहमत कर्जदाताओं ने एडेलवाइस और फ्रैंकलिन टेम्पलटन फंड के माध्यम से दलील दी कि ये पांचों इकाइयां आईबीसी में दी गई ‘सहयोगी’ (एसोसिएट) की परिके दायरे में आती हैं और उनके मतों को नहीं गिना जाना चाहिए था। केनरा बैंक ने फॉरेंसिक ऑडिट की भी मांग की थी, लेकिन उसकी अल्पमत हिस्सेदारी के कारण यह अनुमति नहीं दी जा सकी। हालांकि, शर्मा ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि किसी इकाई को ‘एसोसिएट’ तभी माना जा सकता है जब कर्जदार के पास उसकी शेयर पूंजी का 51 प्रतिशत या उससे अधिक हिस्सा हो या वह सीधे उसके निदेशक मंडल को नियंत्रित करता हो।

उन्होंने कहा, ‘‘चंद्रा के पास इन पांचों इकाइयों में प्रत्यक्ष रूप से कोई शेयर नहीं था, इसलिए यह शर्त पूरी नहीं होती...।’’ अपने आदेश में शर्मा ने कहा कि समाधान पेशेवर के मूल्यांकन के अनुसार, चंद्रा की व्यक्तिगत संपत्ति का मूल्य योजना के तहत पेश की गई राशि से काफी कम थी। योजना को खारिज करने की स्थिति में ऋणदाताओं को अधिक वसूली की संभावना नहीं थी।

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