By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Aug 05, 2026
(फाइल फोटो के साथ) नयी दिल्ली, पांच अगस्त उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को कहा कि न्यायिक अधिकारियों की सेवानिवृत्ति की उम्र बढ़ाने का विरोध करने के लिए राज्य सरकारें वित्तीय बोझ का हवाला नहीं दे सकतीं। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने राज्य सरकारों को न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की उम्र बढ़ाने के मुद्दे पर पुनर्विचार करने और दो सप्ताह के अंदर निर्णय लेने का निर्देश दिया। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की खंडपीठ ने कहा कि वित्तीय बोझ की चिंताएं ‘गलतफहमी पर आधारित’ हैं।
शीर्ष अदालत ने पहले राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से कहा था कि वे न्यायिक अधिकारियों की सेवानिवृत्ति की उम्र 60 से बढ़ाकर 61 साल करने पर विचार करें। यह खंडपीठ एक ऐसी याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें देशभर में ज़िला न्यायपालिका के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की उम्र 60 से बढ़ाकर 62 साल करने का अनुरोध किया गया था। खंडपीठ ने आदेश दिया, ‘‘सभी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया जाता है कि वे इस मामले पर अपने संबंधित अधिकार क्षेत्र वाले उच्च न्यायालय से सलाह-मशविरा करके कोई निर्णय लें।
अगर वे सहमत होते हैं, तो ऐसे राज्यों में न्यायिक अधिकारियों को 61 साल की उम्र तक सेवा में बने रहने की अनुमति दी जाएगी। सेवा में बने रहने की यह अनुमति इन कार्यवाही के अंतिम नतीजों पर निर्भर करेगी।’’ उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की उम्र 65 साल है, जबकि उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश 62 साल की उम्र में सेवा से अवकाश ग्रहण करते हैं। यह मामला उच्चतम न्यायालय के 2002 के उस फ़ैसले के बाद उठा है, जिसमें उसने न्यायमूर्ति के. जगन्नाथ शेट्टी आयोग की सिफारिश मानने से इनकार कर दिया था।
आयोग ने ज़िला न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की उम्र बढ़ाकर 62 साल करने का प्रस्ताव दिया था। तब से, तेलंगाना और मध्यप्रदेश समेत कुछ राज्यों ने सेवानिवृत्ति की उम्र बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए हैं।