Gyanesh Kumar मामले में Supreme Court में सुनवाई के दौरान क्या क्या हुआ, वकीलों ने क्या सवाल उठाये? अदालत ने क्या टिप्पणियां कीं?

By नीरज कुमार दुबे | Oct 05, 2026

मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कामकाज को लेकर उठे गंभीर सवालों पर उच्चतम न्यायालय ने तत्काल कोई अंतरिम रोक लगाने से साफ इंकार कर दिया है। हालांकि, न्यायालय ने निर्वाचन आयोग, केंद्र सरकार, मुख्य निर्वाचन आयुक्त और दोनों निर्वाचन आयुक्तों को नोटिस जारी करते हुए स्पष्ट कर दिया कि यदि जांच में यह पाया गया कि आयोग के किसी फैसले में कानून का पालन नहीं हुआ है, तो ऐसे फैसलों के क्रियान्वयन पर बाद में रोक लगाई जा सकती है।

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याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को तत्काल उनके पद से निलंबित करने की मांग की। वैकल्पिक रूप से उन्होंने आग्रह किया कि अगली सुनवाई तक निर्वाचन आयोग में केवल सर्वसम्मति से फैसले लेने का निर्देश दिया जाए। उनका तर्क था कि 1993 में चुनाव संबंधी कानून में किए गए बदलावों के बाद आयोग के कामकाज में जहां तक संभव हो, सर्वसम्मति का महत्व है।

विकास सिंह ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 18 का भी उल्लेख किया। इस प्रावधान के तहत मतभेद की स्थिति में बहुमत से फैसला लेने की व्यवस्था है। उनका कहना था कि कामकाज के बंटवारे और कार्य संचालन में सर्वसम्मति तथा आयोग के निर्णयों में बहुमत की व्यवस्था के बीच अंतर समझना जरूरी है। पीठ ने हालांकि सवाल उठाया कि 1993 की कानूनी स्थिति के बाद ऐसा क्या बदला है, जिसके आधार पर तत्काल हस्तक्षेप आवश्यक माना जाए।

सुनवाई के दौरान 2023 के कानून की धारा 16 के तहत मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों को दी गई सुरक्षा का मुद्दा भी उठा। याचिकाकर्ता ने इसे असाधारण संरक्षण बताते हुए कहा कि चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक संस्थान की विश्वसनीयता पर गंभीर असर पड़ रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि तत्काल हस्तक्षेप नहीं हुआ तो स्थिति बेहद गंभीर हो सकती है। इस पर न्यायालय ने संयम बरतने को कहा और स्पष्ट किया कि पहले तथ्य सामने आने जरूरी हैं।

पीठ ने समाचार रिपोर्टों को आधार बनाकर कार्रवाई करने से भी इंकार किया। न्यायालय ने कहा कि समाचार रिपोर्ट पूरी तरह सही, आंशिक रूप से सही या आंशिक रूप से गलत हो सकती है। इसलिए केवल समाचार रिपोर्ट के आधार पर आदेश जारी नहीं किया जा सकता। साथ ही न्यायालय ने निर्वाचन आयोग को चेताया कि उसके कामकाज पर लागू अनिवार्य कानूनी प्रावधानों का पालन करना जरूरी है। यदि कानून का उल्लंघन पाया गया तो न्यायालय अपने अधिकारों का इस्तेमाल करेगा।

हम आपको बता दें कि मामले का एक प्रमुख आधार एक समाचार जांच में लगाए गए वे आरोप हैं, जिनमें कहा गया है कि निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले वर्ष अक्टूबर से इस वर्ष अगस्त के बीच आयोग के कामकाज के कुछ पहलुओं पर आपत्ति दर्ज की थी। इसमें मतदाता सूची से जुड़े डिजिटल तंत्र में बदलाव, नए मतदाताओं से मांगी जा रही जानकारी और विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़े निर्णयों पर सवाल उठाए गए थे। निर्वाचन आयोग ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि संबंधित निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए थे और दोनों निर्वाचन आयुक्तों के पत्र नीतिगत फैसलों की बजाय एक अधिकारी से जुड़े प्रशासनिक विषयों से संबंधित थे।

इस बीच मतदाता पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म संख्या छह में कथित बदलाव का मामला भी उच्चतम न्यायालय पहुंचा। अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की याचिका में निर्वाचन आयोग के डिजिटल पोर्टल पर वंशावली और पिछले विशेष गहन पुनरीक्षण से संबंधित कथित नई शर्तों को चुनौती दी गई है। वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि इन बदलावों के व्यापक प्रभाव हो सकते हैं और दिल्ली तथा पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान बड़ी संख्या में मतदाता प्रभावित हुए हैं।

इस पर पीठ ने महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि उसके द्वारा किसी संशोधित प्रपत्र संख्या छह को मंजूरी नहीं दी गई है और अभिलेख सामने आने पर यह देखा जाएगा कि उसमें बदलाव किसने किया। न्यायालय ने त्रिपाठी की याचिका को राकेश कुमार सिंह की याचिका के साथ जोड़ने का निर्देश दिया।

इस तरह दोनों मामलों में अब एक साथ तीन बड़े सवाल न्यायालय के सामने हैं। निर्वाचन आयोग के भीतर फैसले लेने की संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया, 2023 के कानून की धारा 18 का वास्तविक अनुप्रयोग और मतदाता सूची तथा पंजीकरण की प्रक्रिया में कथित बदलाव। माना जा रहा है कि विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर पहले से जारी राजनीतिक और सार्वजनिक विवाद के बीच उच्चतम न्यायालय की अगली सुनवाई इन सवालों पर महत्वपूर्ण दिशा तय कर सकती है।

हम आपको यह भी बता दें कि इस पूरे विवाद के बीच उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की टिप्पणी इस बहस को एक व्यापक संवैधानिक संदर्भ भी देती है। उन्होंने कहा कि यदि कोई प्रक्रिया लाखों भारतीय नागरिकों को मताधिकार से वंचित कर उन्हें अपने ही देश में बिना मतदान अधिकार वाले नागरिकों की स्थिति में पहुंचाती है, तो ऐसी प्रक्रिया संविधान के मूल ढांचे के विरुद्ध होगी और किसी भी तर्क से उसे उचित नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने कहा है कि नागरिक के व्यक्तित्व से मतदान का अधिकार अलग करना ऐसा ही है, जैसे शरीर से उसकी आत्मा निकाल देना। उन्होंने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार को भारतीय लोकतंत्र की बुनियाद बताते हुए कहा कि संविधान निर्माताओं ने प्रत्येक नागरिक के मत को समान मूल्य देकर सामाजिक और आर्थिक असमानताओं के बावजूद राजनीतिक समानता सुनिश्चित की थी। बहरहाल, ऐसे में विशेष गहन पुनरीक्षण की पूरी प्रक्रिया पर उठ रहे सवाल अब केवल मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने का प्रशासनिक विवाद नहीं रह गए हैं, बल्कि वे सीधे उस संवैधानिक सिद्धांत से जुड़ गए हैं, जिसके केंद्र में हर भारतीय नागरिक का समान मताधिकार और लोकतंत्र में उसकी बराबर भागीदारी है।

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