By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Jul 31, 2026
उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि अगर पति व्यभिचार का आरोप लगाता है, तो अदालत को पत्नी को अंतरिम गुजरा भत्ता देने का फैसला सुनाने से पहले पहले उस आरोप पर निर्णय लेना होगा। न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ ने कहा कि अदालतों का यह मानना त्रुटिपूर्ण होगा कि ऐसे आरोप पर निर्णय केवल सुनवाई के अंतिम चरण में ही किया जा सकता है। पीठ ने कहा, ‘‘चूंकि, दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 125(4) में यह प्रावधान है कि अगर व्यभिचार का आरोप साबित हो जाता है, तो पत्नी न तो अंतरिम और न ही अंतिम गुजारा-भत्ता की हकदार होगी।
शादी के कुछ साल बाद ही उनके बीच परेशानियां शुरू हो गईं, जिसके कारण महिला ने कथित तौर पर पुरुष पर कई आरोप लगाए और पुलिस में शिकायतें भी दर्ज कराईं। आखिरकार, 13 मई 2020 को उसने अपने बच्चे और कीमती सामान के साथ ससुराल छोड़ दी। बाद में महिला ने उदयपुर के विशेष अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में अंतरिम गुजारा-भत्ता के लिए अर्जी दी।
इसके बाद व्यक्ति ने भी सीआरपीसी की धारा 125(4) के तहत अर्जी दाखिल की और दलील दी कि पत्नी के व्यभिचारपूर्ण आचरण के कारण वह किसी भी तरह के अंतरिम गुजारा-भत्ता की हकदार नहीं है। हालांकि, अदालत ने उसकी अर्जी खारिज कर दी। शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा कि यह साबित करने के लिए कि पत्नी विवाहेतर संबंध में रह रही थी, पति ने कई तस्वीरें और अन्य सबूत पेश किए हैं।
सीआरपीसी की धारा 125(4) के अनुसार, अगर कोई पत्नी व्यभिचार में शामिल है, तो वह धारा 125 के तहत अपने पति से गुजारा-भत्ता, अंतरिम गुजारा-भत्ता या कानूनी खर्च का दावा नहीं कर सकती। शीर्ष अदालत ने पत्नी की तस्वीरें और वीडियो हासिल करने के लिए पति द्वारा निजी जासूस का इस्तेमाल करने पर सवाल उठाए। पीठ ने कहा कि सबूत इकट्ठा करने के बदलते तरीकों से निपटने के लिए एक व्यवस्था होनी चाहिए।