By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Jul 28, 2026
नयी दिल्ली, 28 जुलाई उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (एनसीएससी) के पास सेवा संबंधी मामलों में बाध्यकारी आदेश जारी करने का अधिनिर्णयन संबंधी अधिकार नहीं है। न्यायालय ने कहा कि संविधान के तहत आयोग की भूमिका न्यायिक नहीं, बल्कि परामर्शी और सलाहकारी है। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (एनसीएससी) संविधान के अनुच्छेद 338 के तहत गठित एक संवैधानिक निकाय है।
लेकिन कानून ने इसे केवल परामर्श और सलाह देने की भूमिका दी है, अधिनिर्णयन की नहीं। इनका काम अधिनिर्णयन संबंधी काम करना नहीं है।’’ उच्चतम न्यायालय इस प्रश्न पर विचार कर रहा था कि क्या राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (एनसीएससी) सेवा संबंधी मामलों में आदेश जारी कर सकता है और यदि कर सकता है, तो क्या ऐसे आदेश केवल सलाहकारी हैं या उनका पालन करना अनिवार्य है। उच्चतम न्यायालय ने मुंबई पोर्ट प्राधिकरण की अपील स्वीकार करते हुए बंबई उच्च न्यायालय के उस फैसले को रद्द कर दिया।
उच्च न्यायालय के उक्त फैसले में राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (एनसीएससी) के उस आदेश को बरकरार रखा गया था, जिसमें प्राधिकरण को एक अनुसूचित जाति कर्मचारी को पदोन्नति से संबंधित लाभ देने और 30 दिन के भीतर बकाया राशि का भुगतान करने का निर्देश दिया गया था। यह मामला मुंबई पोर्ट प्राधिकरण कर्मचारी माधवी के. चंदोरकर को पदोन्नति में आरक्षण से जुड़े पहले के न्यायिक फैसलों के आधार पर वरिष्ठता सूची में संशोधन किए जाने के बाद पदावनत किए जाने से जुड़ा था।