By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Jul 31, 2026
उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को केंद्र सरकार से उस याचिका पर जवाब मांगा, जिसमें मुसलमानों में बहुविवाह की प्रथा को संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन मानते हुए असंवैधानिक घोषित करने का अनुरोध किया गया है। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची एवं वी. मोहना की पीठ ने महिला अधिकार कार्यकर्ता जकिया सोमन, नूरजहां सफिया नियाज और अन्य की याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया। पीठ ने इस याचिका को पहले से लंबित मामलों के साथ संलग्न कर दिया।
याचिका में पहली पत्नी और बच्चों के लिए महिला के ससुराल में रहने के तत्काल अधिकार और बहुविवाह वाले मामलों में गुजारा-भत्ता के लिए त्वरित व्यवस्था का भी अनुरोध किया गया है। इसमें कहा गया है, ‘‘यह रिट याचिका मुस्लिम महिलाओं के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए जनहित में संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर की गई है।’’ वकील श्रीया मैनी के मार्फत दायर याचिका में मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरिया) अधिनियम, 1937 की धारा 2 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है। यह कानून बहुविवाह की प्रथा को मान्यता देता है और उसे वैध बनाता है।
इससे एक ऐसी कानूनी स्थिति पैदा होती है, जिसमें मुस्लिम महिलाओं को भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 82 के तहत, पति के दूसरी शादी करने के विरुद्ध वह कानूनी संरक्षण नहीं मिल पाता, जो अन्य सभी नागरिकों को उपलब्ध है। याचिका में कहा गया है कि याचिकाकर्ताओं की दलील है कि बहुविवाह स्वाभाविक रूप से भेदभावपूर्ण है और यह संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का उल्लंघन करता है। याचिका के अनुसार, ‘‘जहां भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 82 के तहत अन्य सभी भारतीय नागरिकों के लिए, दूसरी शादी दंडनीय अपराध है, वहीं मुस्लिम पुरुषों को उसी कृत्य के लिए धार्मिक आधार पर छूट प्राप्त है, जिससे कानून के कार्यान्वयन में असमानता पैदा होती है।’’ याचिका में कहा गया है, ‘‘याचिकाकर्ताओं की दलील है कि अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता संवैधानिक नैतिकता के अधीन है जो पितृसत्तात्मक रीति-रिवाजों के बजाय लैंगिक न्याय को प्राथमिकता देती है।’’ याचिका में कहा गया है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) अधिनियम, 1937 की धारा 2 के तहत मान्यता प्राप्त बहुविवाह की प्रथा भारत में महिलाओं और बच्चों को गहरा तथा स्वाभाविक नुकसान पहुंचाती है, धर्मांतरण को बढ़ावा देती है और सामाजिक नैतिकता को प्रभावित करती है।
याचिका में कहा गया है कि याचिकाकर्ताओं की दलील है कि बहुविवाह इस्लाम की कोई अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं, बल्कि एक ऐसी अनुमति प्राप्त व्यवस्था है, जो ‘पूर्ण न्याय’ की शर्त पर आधारित है। उनका कहना था कि कुरान खुद ऐसे पूर्ण न्याय को मानवीय रूप से संभव नहीं मानता। याचिकाकर्ताओं ने यह भी रेखांकित किया कि ट्यूनीशिया और तुर्किये जैसे कई मुस्लिम-बहुल देशों ने पहले ही बहुविवाह की प्रथा समाप्त कर दी है।
उन्होंने बहुविवाह को वैधता देने वाले प्रावधान को असंवैधानिक घोषित करने तथा लैंगिक न्याय और गरिमा सुनिश्चित करने के लिए सभी नागरिकों पर दूसरी शादी से जुड़े कानूनों को समान रूप से लागू करने का निर्देश देने का अनुरोध किया है। याचिका में कहा गया है, ‘‘राज्य के नीति-निदेशक तत्वों, विशेष रूप से संविधान के अनुच्छेद 44 में, देश के सभी नागरिक कानूनों के बीच समानता और समन्वय स्थापित करने के लिए समान नागरिक संहिता (यूसीसी) का प्रावधान किया गया है। बहुविवाह की प्रथा इस उद्देश्य को स्पष्ट रूप से कमजोर करती है।