By नीरज कुमार दुबे | Oct 30, 2026
सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) और उसकी अपीलीय संस्था नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) की स्वायत्तता को लेकर केंद्र सरकार के कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। गुरुवार को एक मामले की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय ने दोनों संस्थाओं को पूरी तरह हाईजैक कर लिया है। उन्होंने इसे संस्थागत स्वायत्तता के लिए गंभीर समस्या बताते हुए कहा कि मंत्रालय का इन संस्थाओं पर पूरी पकड़ बनाए रखने का प्रयास दुर्भाग्यपूर्ण है। अदालत की यह टिप्पणी केवल नियुक्तियों तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसके केंद्र में न्यायिक और तकनीकी सदस्यों की स्वतंत्रता, प्रशासनिक नियंत्रण तथा ट्रिब्यूनल की कार्यप्रणाली का व्यापक सवाल भी रहा। उल्लेखनीय है कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के पास ही कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय भी है।
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सुनवाई के दौरान अदालत ने संविदा के आधार पर कर्मचारियों की नियुक्ति की व्यवस्था पर भी असहमति जताई। मुख्य न्यायाधीश ने अपने अनुभव का उल्लेख करते हुए कहा कि ठेकेदार न्यायिक और तकनीकी सदस्यों की जरूरतों तथा संस्थागत मर्यादाओं की परवाह नहीं करते। उन्होंने मुंबई में एक मामले का जिक्र किया, जहां संविदा कर्मचारियों द्वारा मूल रिपोर्ट ले जाने के बाद एफआईआर दर्ज करानी पड़ी थी। CJI ने यह भी कहा कि कुछ संविदा कर्मचारी न्यायिक सदस्यों को परेशान कर रहे हैं। उन्होंने यहां तक टिप्पणी की कि पुराने संविदा कर्मचारियों के साथ-साथ निजी ठेका कंपनी की व्यवस्था भी समाप्त होनी चाहिए।
दरअसल, इस विवाद की जड़ NCLT में कर्मचारियों की नियुक्ति को निजी कंपनी के माध्यम से आउटसोर्स किए जाने के फैसले में है। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा ने अदालत को बताया कि मंत्रालय ने नई व्यवस्था के तहत एक निजी कंपनी को कर्मचारियों की नियुक्ति का ठेका दिया है। इसके लागू होने पर एक और दो नवंबर से पहले से कार्यरत संविदा कर्मचारियों को हटाया जा सकता है। उन्होंने बताया कि इनमें से कई कर्मचारी छह वर्षों से अधिक समय से अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
मीनाक्षी अरोड़ा ने दलील दी कि इन कर्मचारियों ने लंबे समय तक संस्थान में काम किया है और उन्हें अचानक हटाना मनमाना होगा। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का हवाला देते हुए कहा कि NCLT के भर्ती नियमों और संबंधित विज्ञापन में नियमितीकरण का प्रावधान होने के बावजूद कर्मचारियों को एक झटके में बाहर करना उचित नहीं है। उन्होंने यह भी बताया कि संविदा पर नियुक्त कर्मचारियों को नियमित कर्मचारियों की तरह मकान किराया भत्ता (HRA) और महंगाई भत्ता (DA) भी नहीं मिलता।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कर्मचारियों की लंबी सेवा के आधार पर उन्हें पद पर बनाए रखने की मांग को स्वीकार नहीं किया। मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि अदालत संविदा नियुक्तियों की मौजूदा व्यवस्था का समर्थन नहीं करती। उन्होंने कहा कि नियुक्तियों में निजी ठेकेदारों की भूमिका संस्थागत कामकाज और न्यायिक सदस्यों की स्वतंत्रता के लिए समस्या पैदा कर सकती है। इस तरह अदालत ने कर्मचारियों के सेवा संबंधी दावों और ट्रिब्यूनल की संस्थागत स्वायत्तता के सवाल को अलग-अलग देखने का संकेत दिया।
साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने इस समस्या के समाधान के लिए तत्काल और दीर्घकालिक, दोनों स्तरों पर व्यवस्था बनाने की जरूरत बताई। मुख्य न्यायाधीश ने सुझाव दिया कि फिलहाल सरकारी विभागों के अनुभवी अधिकारियों को प्रतिनियुक्ति (Deputation) पर NCLT और NCLAT में तैनात किया जाए, ताकि संस्थाओं का कामकाज प्रभावित न हो। इसके बाद चरणबद्ध तरीके से नियमित भर्तियां कराई जाएं। इन नियुक्तियों के लिए UPSC अथवा कर्मचारी चयन आयोग की सहायता लेने का सुझाव भी दिया गया।
देखा जाये तो अदालत की चिंता का एक बड़ा आधार ट्रिब्यूनल में कर्मचारियों और बुनियादी सुविधाओं की कमी भी है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, NCLT में स्वीकृत 320 नियमित प्रशासनिक पदों में से केवल 67 पद भरे हुए हैं, जबकि 253 पद खाली पड़े हैं। न्यायिक और तकनीकी सदस्यों के 16 पद भी रिक्त बताए गए हैं। अदालत ने NCLT और NCLAT के अध्यक्षों से संस्थानों की आधारभूत सुविधाओं, भवनों, कर्मचारियों और प्रशासनिक जरूरतों पर विस्तृत प्रस्ताव मांगे हैं। इसके लिए चार सप्ताह का समय दिया गया है।
साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने मामले में केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब भी मांगा है। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणियों से यह साफ हुआ कि अदालत के सामने सवाल केवल कुछ संविदा कर्मचारियों की नौकरी बचाने का नहीं है, बल्कि देश की महत्वपूर्ण अर्ध-न्यायिक संस्थाओं के प्रशासनिक नियंत्रण और स्वतंत्र कामकाज का है।
हम आपको बता दें कि NCLT और NCLAT कॉरपोरेट विवादों, दिवालियापन और कंपनियों से जुड़े महत्वपूर्ण मामलों का निपटारा करते हैं। ऐसे संस्थानों में नियुक्तियों से लेकर न्यायिक रिकॉर्ड के रखरखाव तक की जिम्मेदारी यदि स्पष्ट और जवाबदेह प्रशासनिक व्यवस्था के तहत नहीं होगी, तो इसका असर न्यायिक प्रक्रिया पर भी पड़ सकता है। यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट ने नियुक्तियों का अधिकार ट्रिब्यूनल के अध्यक्षों के हाथ में रखने और निजी ठेकेदारी की व्यवस्था से बाहर निकलने पर जोर दिया है।
बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी ने कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय की प्रशासनिक भूमिका को कठघरे में खड़ा कर दिया है। वैसे अदालत की मौखिक टिप्पणी अभी अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं है, लेकिन इससे यह स्पष्ट है कि NCLT और NCLAT की स्वायत्तता, नियुक्तियों की पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही का मुद्दा अब व्यापक न्यायिक जांच के दायरे में आ गया है।