मतदाता सूची विवाद पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, न्यायिक अधिकारियों पर सवाल उठाने से किया मना

By Ankit Jaiswal | Mar 10, 2026

पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची संशोधन को लेकर चल रहे विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कड़ा रुख अपनाया। सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य सरकार, चुनाव आयोग और याचिकाकर्ताओं को स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी कि अदालत द्वारा नियुक्त न्यायिक अधिकारियों की निष्ठा या फैसलों पर सवाल उठाना स्वीकार नहीं किया जाएगा।

मौजूद जानकारी के अनुसार मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के मामलों में अपील सुनने के लिए तैनात न्यायिक अधिकारी पहले से ही अतिरिक्त समय देकर काम कर रहे हैं। ऐसे में उनकी निष्पक्षता पर संदेह जताना उचित नहीं है।

अदालत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि न्यायिक अधिकारियों पर उंगली उठाने की कोशिश न की जाए। पीठ ने यह भी कहा कि वे लगातार देर रात तक बैठकर पश्चिम बंगाल के उन मतदाताओं की अपील सुन रहे हैं जिनके नाम मतदाता सूची से हटाए गए।

बता दें कि पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन को लेकर काफी समय से विवाद चल रहा है। इस प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में लोगों के नाम सूची से हटाए जाने का दावा किया गया है, जिसके बाद कई मतदाताओं ने अदालत का दरवाजा खटखटाया।

गौरतलब है कि पहले सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर पश्चिम बंगाल और पड़ोसी राज्यों ओडिशा तथा झारखंड से न्यायिक अधिकारियों को तैनात किया गया था, ताकि मतदाता सूची से हटाए गए नामों से जुड़ी आपत्तियों और दावों पर फैसला किया जा सके।

सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि चुनाव आयोग और राज्य सरकार इन न्यायिक अधिकारियों को पर्याप्त सहयोग और जरूरी व्यवस्थाएं उपलब्ध कराएं, ताकि वे अपीलों की सुनवाई प्रभावी तरीके से कर सकें।

मौजूद जानकारी के अनुसार अदालत के सामने एक नई अर्जी भी दाखिल की गई थी, जिसमें न्यायिक अधिकारियों के फैसलों पर सवाल उठाए गए थे। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए साफ कहा कि अदालत द्वारा नियुक्त अधिकारियों के फैसलों का सम्मान किया जाना चाहिए।

सुनवाई के दौरान अदालत ने दोनों पक्षों के रवैये पर भी चिंता जताई। पीठ ने कहा कि अदालत को दोनों पक्षों की नीयत पर संदेह होने लगा है और यह स्पष्ट किया जाए कि न्यायिक अधिकारियों पर सवाल उठाने वाली अर्जी किसने दाखिल की है।

बता दें कि याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी और तृणमूल कांग्रेस के सांसद तथा अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने अदालत को बताया कि उन्हें ऐसी किसी नई याचिका की जानकारी नहीं है।

इसी बीच सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम निर्देश देते हुए कहा कि जिन मामलों में न्यायिक अधिकारियों के फैसलों से लोग असंतुष्ट हैं, उनके लिए एक स्वतंत्र अपीलीय व्यवस्था बनाई जाए।

अदालत ने निर्देश दिया कि अपील सुनने के लिए विशेष अपीलीय न्यायाधिकरण गठित किए जाएं। इन न्यायाधिकरणों में उच्च न्यायालयों के पूर्व मुख्य न्यायाधीश और पूर्व न्यायाधीश शामिल किए जा सकते हैं।

मौजूद जानकारी के अनुसार अदालत ने कहा कि कोलकाता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश इस बात पर निर्णय लें कि अपीलीय पीठ में कितने सदस्य होंगे। साथ ही वे ऐसे पूर्व मुख्य न्यायाधीशों और न्यायाधीशों के नाम सुझा सकते हैं जो इन न्यायाधिकरणों में सेवा देने के लिए तैयार हों।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायिक अधिकारियों के फैसलों के खिलाफ किसी प्रशासनिक या कार्यकारी मंच पर अपील नहीं की जा सकेगी। अपील केवल इन विशेष न्यायाधिकरणों के सामने ही सुनी जाएगी।

गौरतलब है कि मतदाता सूची संशोधन से जुड़े मामलों में बड़ी संख्या में आपत्तियां दर्ज कराई गई हैं। बताया जा रहा है कि ऐसे मामलों की संख्या दस लाख से भी अधिक हो सकती।

इसी को देखते हुए अदालत ने यह भी कहा कि जिन लोगों की आपत्तियों का निपटारा हो चुका है और जिनकी सूची जारी की जानी है, उससे जुड़े विवाद के मामले में दोनों पक्ष कोलकाता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से संपर्क कर सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि इन न्यायाधिकरणों में सेवा देने वाले पूर्व न्यायाधीशों को दिए जाने वाले मानदेय का निर्धारण कोलकाता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश करेंगे और इस संबंध में चुनाव आयोग से परामर्श लिया जा सकता है। इन सभी खर्चों का वहन चुनाव आयोग करेगा।

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