Jan Gan Man: Supreme Court ने कहा- Uniform Civil Code लागू करने का समय आ गया, संसद फैसला करे

By नीरज कुमार दुबे | Mar 10, 2026

सर्वोच्च न्यायालय ने एक बार फिर समान नागरिक संहिता लागू करने के विचार का समर्थन करते हुए कहा है कि विवाह, तलाक और उत्तराधिकार जैसे मामलों में अलग अलग समुदायों के लिए लागू पर्सनल लॉ के कारण उत्पन्न जटिलताओं को दूर करने में एक समान नागरिक कानून सहायक हो सकता है। उच्चतम न्यायालय ने यह टिप्पणी मुस्लिम पर्सनल लॉ के कुछ प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई के दौरान की।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति आर. महादेवन भी शामिल थे, इस मामले की सुनवाई कर रही थी। याचिका में आरोप लगाया गया है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के कुछ प्रावधान महिलाओं के साथ भेदभाव करते हैं। सुनवाई के दौरान पीठ ने संकेत दिया कि निजी कानूनों में व्यापक न्यायिक हस्तक्षेप कई बार अनपेक्षित परिणाम पैदा कर सकता है। ऐसे मामलों में संसद द्वारा कानून बनाना अधिक उपयुक्त रास्ता हो सकता है। मुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत ने कहा कि इस तरह की समस्याओं का समाधान समान नागरिक संहिता हो सकता है, जिससे सभी नागरिकों के लिए नागरिक मामलों में एक समान कानूनी ढांचा तैयार किया जा सके।

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न्यायमूर्ति जयमाल्य बागची ने भी इस मुद्दे पर विस्तार से अपनी राय रखते हुए कहा कि न्यायपालिका ऐसे कानूनों को शून्य घोषित नहीं कर सकती, जब तक कि उसकी जगह कोई व्यापक वैकल्पिक व्यवस्था मौजूद न हो। उन्होंने कहा कि यदि पर्सनल लॉ को अचानक निरस्त कर दिया जाए तो कानूनी शून्यता की स्थिति पैदा हो सकती है। इसलिए बेहतर होगा कि इस विषय को विधायिका की समझदारी पर छोड़ा जाए, ताकि संसद समान नागरिक संहिता से जुड़ा व्यापक कानून बना सके।

न्यायमूर्ति बागची ने यह भी कहा कि पर्सनल लॉ से जुड़ी कुछ प्रथाओं को न्यायालय द्वारा सीधे अमान्य घोषित करना व्यवहारिक रूप से कठिन हो सकता है। उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि मुस्लिम पुरुष एकतरफा तलाक दे सकता है और यह विभिन्न प्रक्रियाओं के माध्यम से हो सकता है। ऐसे में क्या पर्सनल लॉ पर आधारित सभी बहुविवाह संबंधों को अचानक अमान्य घोषित किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के मूलभूत बदलाव लाने के लिए विधायी शक्ति का प्रयोग आवश्यक है।

हम आपको बता दें कि यह टिप्पणी उस समय आई जब न्यायालय यह विचार कर रहा था कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के कुछ पहलू महिलाओं के अधिकारों का उल्लंघन करते हैं या नहीं। न्यायालय के समक्ष दायर याचिका में मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरियत) अनुप्रयोग अधिनियम 1937 के प्रावधानों को चुनौती दी गई है। याचिका में तर्क दिया गया है कि यह कानून उत्तराधिकार जैसे मामलों में मुस्लिम महिलाओं के साथ भेदभाव करता है।

मुख्य न्यायाधीश ने सुनवाई के दौरान यह भी सवाल उठाया कि यदि 1937 के इस कानून को निरस्त कर दिया जाए तो उसकी जगह कौन-सा कानून लागू होगा। उन्होंने कहा कि यदि इस अधिनियम को हटाया गया तो उत्पन्न होने वाले कानूनी शून्य की स्थिति का समाधान क्या होगा।

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने दलील दी कि शरिया आधारित उत्तराधिकार नियमों के तहत महिलाओं को पुरुषों की तुलना में केवल आधा हिस्सा मिलता है। उन्होंने सुझाव दिया कि यदि 1937 के अधिनियम को असंवैधानिक घोषित किया जाता है तो भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम 1925 लागू किया जा सकता है, जिसमें पुरुष और महिला को समान अधिकार दिए गए हैं। प्रशांत भूषण ने यह भी तर्क दिया कि उत्तराधिकार से जुड़े अधिकार नागरिक अधिकार हैं और उन्हें संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षित धार्मिक प्रथा नहीं माना जा सकता। हालांकि न्यायमूर्ति बागची ने इस तर्क पर प्रश्न उठाते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद 372 के तहत पहले से प्रचलित कानून तब तक लागू रह सकते हैं जब तक कि उन्हें विधायिका द्वारा बदला न जाए।

सुनवाई के दौरान पीठ ने यह भी चेतावनी दी कि सुधार की अत्यधिक उत्सुकता में कहीं ऐसा न हो कि मुस्लिम महिलाओं को पहले से उपलब्ध अधिकार भी कम हो जाएं। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यदि 1937 का अधिनियम समाप्त हो जाता है तो उसके बाद की स्थिति को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े होंगे। पीठ ने याचिकाकर्ताओं को अपनी याचिका में संशोधन करने पर विचार करने का संकेत भी दिया, जिससे स्पष्ट हुआ कि इस जटिल मुद्दे का समाधान व्यापक विधायी पहल से ही संभव हो सकता है।

हम आपको बता दें कि समान नागरिक संहिता का विचार संविधान के अनुच्छेद 44 में उल्लिखित है, जिसमें राज्य को देश के सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक कानून सुनिश्चित करने का प्रयास करने का निर्देश दिया गया है। हालांकि यह राज्य नीति के निदेशक सिद्धांतों का हिस्सा है और इसे न्यायालय द्वारा लागू नहीं कराया जा सकता। देखा जाये तो भारत में समान नागरिक संहिता को लेकर दशकों से बहस जारी है। समर्थकों का मानना है कि इससे लैंगिक न्याय और महिलाओं को समान अधिकार मिलेंगे, जबकि आलोचकों का कहना है कि यदि इसे सावधानी से लागू नहीं किया गया तो यह धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यक अधिकारों को प्रभावित कर सकता है। भारत में फिलहाल गोवा और उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता लागू है।

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