By दिव्यांशी भदौरिया | Oct 27, 2026
आजकल धीरे-धीरे दौर बदलता जा रहा है। देश इक्कीसवीं सदी की तरफ बढ़ रहा है, लेकिन रुढ़िवादी विचारधारा से समाज का एक वर्ग अभी उबर नहीं पाया है। इन्हीं कारणों से सुरीर के एक मोहल्ला में सती के श्राप की बंदिश के चलते महिलाएं सुहाग और संतान सलामती के करवाचौथ और अहोई अष्टमी का त्योहार नहीं मनाती है। माना जाता है कि उनके त्योहार मनाने से सती मैया नाराज हो सकती है।
अपने सामने पति की मृत्यु से कुपित पत्नी मुहल्ले के ठाकुर लोगों को श्राप देते हुए सती हो गई थी। इसे सती का श्राप कहें कि पति की मृत्यु से बिलखती पत्नी के कोप का कहर। इस घटना के बाद मुहल्ले पर काल बन कर टूटे कहर ने जवान युवकों को ग्रास बनाना शुरु कर दिया। जितने भी विवाहिता असमय विधवा हो गई थीं। मुहल्ले में मानों आफत से आ गई थी।
उस दौरान बुजुर्गों ने इसे पति के साथ सती हुई पत्नी का कोप माना और उस मुहल्ले में सती का मंदिर बनाकर क्षमा मांगी गई। कहते है कि अस्वाभाविक मृत्यु का सिलसिला तो रुक गया लेकिन वह सुहाग और संतान सलामती के करवाचौथ और अहोई अष्टमी के त्योहार पर बंदिश लगा गई है।
तब से इस मुहल्ले के ठाकुरों के परिवार में कोई महिला न तो पति के दीर्घायु को करवाचौथ का व्रत रखती है और न ही संतान की सलामती के लिए अहोई अष्टमी का त्योहार नहीं मनाते है। इस परंपरा को सैकड़ों सालों से पीढ़ी दर पीढ़ी निर्वहन कर रहा है। इस परंपरा को तोड़ने में महिलाओं को सती मैया के नाराज होने का डर है।
देवी की तरह होती है सती की पूजा
आपको बताते चलें कि, सुरीर में सती की पूजा देवी मैया की तरह हो रही है। गांव में सभी जाति के लोग शादी-विवाह में घुड़चढ़ी के दौरान सती मंदिर पर मत्था टेकने आते हैं। वहां मौजूग मोहल्ले के लोग बताते हैं कि सता मैया में शक्ति है, इसका एहसास कई बार मुहल्ले के लोगों को हुआ है। जब कभी किसी ने बंदिश की परंपरा को तोड़ने का प्रयास किया है, तो उसका खामियाजा भुगतना पडेगा।
वहीं, इस घटना को लेकर नौहझील के गांव रामनगला के ब्राह्मण समाज के लोग आज भी सुरीर में खाना तो दूर पानी तक नहीं पीते हैं। वह इस घटना को सुरीर के इन लोगों को दोषी मानते हैं।