विश्व में भारत के आध्यात्म को शीर्ष पर पहुँचाने वाला एक अद्भुत संन्यासी

By नरेश सोनी | Jan 12, 2019

उन्नीसवी सदी में विश्व के सामने भारत के आध्यात्मिक विचारों और सहिष्णुता को अपने वत्तृत्व कौशल से प्रस्तुत करने वाले अद्भुत सन्यासी स्वामी विवेकानंद ने, अपने जीवनकाल में भारत को एक नयी चेतना से ओतप्रोत किया। उन्होंने, आध्यात्म, भारत की प्राचीन संस्कृति, हिन्दू धर्म द्वारा दूसरे धर्मों को प्रश्रय देकर उन्हें गले लगाने के साथ-साथ, सर्वधर्म समभाव और भारत की स्वाधीनता में अपना अतुलनीय योगदान किया। स्वामीजी ने भारत की युवा शक्ति को आह्वान किया, हे वीर-हृदय युवक वृन्द उठो जागो, और आगे बढ़ो देशभक्त बनो।

 

शिकागो में 11 सितम्बर 1893 से विश्व धर्मसभा प्रारंभ हुई थी, जो 24 सितम्बर 1893 तक चली थी। उस धर्म सभा में स्वामी विवेकानंद ने लगभग प्रतिदिन अपना व्याख्यान दिया था, उन्होंने मुख्य निबन्ध (व्याख्यान) ‘‘हिन्दूधर्म’’ इस महासभा में नौवे दिन 19 सितम्बर 1893 को पढ़ा था। हिन्दू धर्म की आभ्यन्तरिक शक्ति, वेदों की नित्यता, सृष्टि अनादि तथा अनन्त है, आत्मा, ऋषि, जन्मान्तरवाद, आनुवांशिकता तथा पुनर्जन्मवाद आदि विषयों पर विस्तृत व्याख्यान दिया। 

 

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अपनी भाव राशि की चमत्कारिक अभिव्यक्ति एवं आकृति के प्रभाव के कारण धर्म महासभा में वे अत्यन्त जनप्रिय थे। विवेकानन्द जब मंच के एक कोने से अन्य कोने तक चलकर जाते तालियों की गड़गड़ाहट से उनका अभिवादन होता। ‘‘सभा की कार्यसूची में विवेकानन्द का वक्तव्य सबसे अंत में रखा जाता इसका उद्देश्य था, श्रोताओं को अंत तक पकड़ कर रखना।

 

शिकागो में जो धर्म सभा हुई थी, वह विश्व धर्म परिषद् थी। उस समय पाश्चात्य देशों में अन्तर राष्ट्रीय प्रदर्शनी होती थी, उसमें औषधिशास्त्र, न्यायशास्त्र, शिल्प शास्त्र, अन्यान्य क्षेत्रों के तात्विक विषयों पर शोध सम्बन्धी आपसी विचार विनिमय होता था। शिकागो निवासियों के मन में यह विचार आया कि, संसार के प्रमुख धर्मों का सम्मेलन ही अन्य सब परिषदों में उच्चतम एवं श्रेष्ठ होगा।

 

दक्षिण भारत के शिष्यों ने स्वामी विवेकानन्द से अनुरोध है किया कि वे इस अवसर पर अमेरिका जाकर हिन्दू-धर्म के प्रतिनिधि के रूप में अपना भाषण दें। वे शिष्यों के अनुरोध पर शिकागो पहुँचे। हार्वड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर राइट ने स्वामीजी की प्रतिभा से प्रभावित होकर, उन्हें धर्मपरिषद् में एक प्रतिनिधि के रूप में उन्हें स्थान तथा सम्मान प्राप्त कराया।

 

इस धर्मसभा को विश्व सर्वधर्म सभा भी कहा गया था, संयुक्त राज्य अमेरिका में अपने धर्म सम्प्रदाय के सबसे बड़े धर्मगुरु, जो कि इस परिषद का उद्घाटन करने वाले थे, कार्डिनल गिबन्स एक ऊँची कुर्सी पर बैठे थे।

 

ब्राह्म, बौद्ध, इस्लाम, पारसी, जैन, ईसाई आदि धर्मों के धर्मगुरु इस सभा में आये थे। उनके अलावा भारतीय धर्मगुरु बैठे थे, किन्तु हिन्दूधर्म के वास्तव में एक मात्र प्रतिनिधि स्वामी विवेकानन्द ही थे।

 

कोलम्बस हाल में उपस्थित चार हजार श्रोताओं के समक्ष जब स्वामीजी ने हिन्दूधर्म की महानता उसकी प्राचीनता पर जब अपना व्याख्यान दिया तो श्रोता मुग्ध हो गये। विश्व के लोगों को हिन्दू-दर्शन का तत्त्व तब स्पर्श हुआ।


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स्वामीजी ने कहा ‘‘मुझको ऐसे धर्मावलम्बी होने का गौरव है, जिसने संसार को ‘सहिष्णुता’ तथा सब धर्मों को मान्यता प्रदान करने की शिक्षा दी है। हम लोग सब धर्मों के प्रति केवल सहिष्णुता में ही विश्वास नहीं करते बल्कि सब धर्मों को सच्चा मानकर ग्रहण करते है।’’

 

सम्मेलन के विदाई दिवस 27 सितम्बर 1893 को स्वामीजी ने कहा धर्म के सम्बन्ध में कहा कि, ‘‘ईसाई को हिन्दू या बौद्ध नहीं हो जाना चाहिए और न हिन्दू अथवा बौद्ध को ईसाई ही। पर हाँ प्रत्येक को चाहिए कि वे एक दूसरे के प्रति समभाव रखे।’’ इस सर्वधर्म परिषद ने जगत के समक्ष यदि कुछ प्रदर्शित किया है तो वह यह है- उसने यह सिद्ध कर दिखाया है कि, शुद्धता, पवित्रता, और दयाशीलता किसी सम्प्रदाय विशेष की सम्पत्ति नहीं है एवं प्रत्येक धर्म ने श्रेष्ठ व अतिशय उन्नत चरित्र स्त्री-पुरूष को जन्म दिया है।

 

स्वामी विवेकानन्द का जन्म 12 जनवरी 1963 को हुआ था। उनके गुरु श्री रामकृष्ण थे। स्वामी विवेकानंद ने रामकृष्ण मठ एवं रामकृष्ण मिशन की स्थापना वेलूरमठ पं. बंगाल में की थी। प्राच्य के इस संन्यासी ने विश्व में अनेक देशों की यात्रा कर, भारतीय आध्यात्म को शीर्ष पर पहुँचाया।

 

- नरेश सोनी, उज्जैन 

(लेखक राज्यस्तरीय स्वतंत्र अधिमान्य पत्रकार है।)

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