Afghanistan में Taliban पाबंदी से 22 लाख लड़कियां शिक्षा से दूर, 20,000 महिला शिक्षकों की कमी का खतरा

By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Aug 16, 2026

(गजाल हबीबयार, ओटावा विश्वविद्यालय) ओटावा, 15 अगस्त (द कन्वरसेशन) तालिबान ने अगस्त 2021 में अफगानिस्तान की सत्ता में वापस लौटने के कुछ ही हफ्तों के भीतर लड़कियों के कक्षा छह से आगे की पढ़ाई करने पर रोक लगा दी थी। यह प्रतिबंध अब तक नहीं हटाया गया है। अफगानिस्तान दुनिया का एकमात्र देश है, जहां लड़कियों और महिलाओं को औपचारिक रूप से माध्यमिक और उच्च शिक्षा प्राप्त करने से रोका गया है।

इन पाबंदियों की वजह से देश को पहले ही हर साल अनुमानित 8.4 करोड़ अमेरिकी डॉलर का आर्थिक नुकसान हो रहा है। सितंबर, 2025 से तालिबान बलों ने संयुक्त राष्ट्र के कर्मचारियों समेत अफगान महिलाओं को संयुक्त राष्ट्र के कार्यालयों में प्रवेश करने से भी रोक दिया है। जनवरी 2026 में महिला सरकारी कर्मचारियों को 2021 से घर पर रहने के लिए मिल रहा कम किया गया वेतन भी बंद कर दिया गया।

मैंने ऐसा कुछ पहले भी एक बार होते हुए देखा था। तब मैं 1996 में छोटी लड़की थी, जब तालिबान ने काबुल पर कब्जा कर लिया था। इस दूसरी पाबंदी (2021 से लगाई गई) के बारे में जो बात मुझे सबसे ज्यादा परेशान करती है, वह यह नहीं है कि ऐसा दोबारा हुआ।

बल्कि यह है कि इस बार दुनिया की विफलता जागरूकता की कमी के कारण नहीं है। हर कोई जानता है कि अफगान लड़कियों के साथ क्या हो रहा है। विफलता यह है कि इस सच्चाई को जानने के बावजूद तालिबान को इसकी कोई वास्तविक कीमत नहीं चुकानी पड़ी है।

तालिबान के सत्ता में आने के कुछ ही दिनों के भीतर, अफगान महिलाएं काबुल की सड़कों पर “रोटी, काम, आजादी” के नारे लगाते हुए उतर आई थीं। तब से वे जोखिम उठाते हुए लगातार यही मांग करती आ रही हैं। अफगान महिलाओं के समूहों ने लगातार विरोध प्रदर्शन किए हैं और प्रदर्शनकारियों ने कहा है कि इसके जवाब में उन्हें गिरफ्तारियों और यातनाओं का सामना करना पड़ा है।

फरवरी 2026 में भी काबुल की लड़कियों ने सड़कों पर उतरकर शिक्षा के अधिकार की मांग की थी। लेकिन जहां विरोध प्रदर्शन करना बहुत खतरनाक हो गया है, वहां अफगान महिलाओं ने इसके बजाय एक शांत तरीका अपनाया है: उन्होंने घरों से संचालित भूमिगत स्कूलों का अनौपचारिक नेटवर्क बनाया है, जहां उन लड़कियों को पढ़ाया जाता है, जिनके पास अन्यथा कक्षा में पढ़ने का कोई अवसर नहीं होता। तालिबान के साथ अंतरराष्ट्रीय संपर्क का मुख्य माध्यम संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व में चल रही दोहा प्रक्रिया है।

वर्ष 2023 से तालिबान के प्रतिनिधियों के साथ कई दौर की वार्ताएं हो चुकी हैं, जिनका उद्देश्य अंततः अफगानिस्तान को अंतरराष्ट्रीय समुदाय में फिर से शामिल करना है—जिसमें सामान्य राजनयिक संबंध, तालिबान सरकार को औपचारिक मान्यता और देश की अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं तथा व्यापार में सामान्य रूप से फिर से भागीदारी शामिल है। तालिबान के आग्रह पर महिलाओं और अफगान नागरिक समाज के समूहों को मुख्य वार्ताओं से बाहर रखा गया है। इसके बजाय, वे अलग से और मुख्य वार्ताओं से इतर मुलाकात करते हैं।

वर्ष 1996 में मेरी उम्र कम थी और मेरी अंतिम परीक्षाएं होने में कुछ ही सप्ताह बाकी थे, तभी तालिबान ने काबुल पर कब्जा कर लिया। उस रात बिजली नहीं थी, इसलिए हम रेडियो के आसपास इकट्ठा हुए और सुना कि हमें अगली कक्षा में प्रोन्नत कर दिया गया है, लेकिन लड़कियों के लिए स्कूल अगली सूचना तक बंद किए जा रहे हैं। शुरुआत में, मैं समझ नहीं पाई कि इसका क्या मतलब था।

एक छोटी छात्रा होने के नाते, अंतिम परीक्षाएं रद्द होने की खबर से मैं खुश थी, इसलिए मैं यह बात अपनी दादी को बताने के लिए दौड़ पड़ी। लेकिन अंधेरे गलियारे में कुछ दूर जाने के बाद मुझे असलियत समझ में आई: अगले साल स्कूल नहीं होगा। मैं वहीं बैठ गई और रोने लगी।

मेरे माता-पिता मेरी बहन और मुझे पाकिस्तान ले गए ताकि हम अपनी पढ़ाई जारी रख सकें। ऐसा फैसला कई अफगान परिवारों के लिए आर्थिक रूप से संभव नहीं था। हमारे लिए भी यह आसान नहीं था।

विदेश में रहने वाले हमारे रिश्तेदारों ने हमारी पढ़ाई का खर्च उठाकर हमारा समर्थन किया। मेरी कुछ सहेलियां स्कूल की पढ़ाई पूरी नहीं कर पाईं और, जहां तक मुझे पता है, इसके बजाय उनकी शादी कर दी गई। आगे चलकर मैं अफगान सरकार में खान एवं पेट्रोलियम मंत्रालय की निदेशक, फिर उपमंत्री और उसके बाद कार्यवाहक मंत्री के पद पर सेवा देने वाली पहली महिला बनी।

मेरी पीढ़ी के लिए वे परिस्थितियां बदल गई थीं। लेकिन इस पीढ़ी के लिए भी वे बदलेंगी, इसकी कोई गारंटी नहीं है—सिर्फ जागरूकता से यह बदलाव नहीं आएगा। अफगान महिलाएं पिछले पांच साल से लगातार विरोध और संघर्ष करके यह दिखा रही हैं कि वे लड़कियों की शिक्षा पर लगे प्रतिबंध को हमेशा के लिए स्वीकार नहीं करेंगी।

ऐसे में यह सवाल उठता है कि बाकी दुनिया ने तालिबान के इस प्रतिबंध के खिलाफ इतना कम प्रयास करके ही संतोष क्यों कर लिया है।

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