By डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा | Sep 07, 2021
अफगानिस्तान के अधिकांश हिस्सों पर भले ही तालिबानी लड़ाकों ने कब्जा जमा लिया हो और सत्ता पर काबिज भी हो जाए पर सरकार चलाना तो दूर की बात सरकार बनाना ही अभी टेढ़ी खीर साबित हो रही है। हालांकि अमेरिका ने तय समय सीमा यानी कि 31 अगस्त को काबुल से अपने सैनिकों व सेना को हटा लिया है पर तालिबानियों के सामने सरकार बनाने और उसे चलाने की चुनौतियां बेशुमार हैं और रहेंगी। इसका प्रमुख कारण अत्यधिक महत्वाकांक्षा के चलते सत्ता संघर्ष तो है ही अन्य भी बहुत से कारण है जो तालिबानियों के सामने नित नई समस्याएं पैदा करेंगे। अमेरिका के जाने के कई दिनों बाद भी सरकार गठन को लेकर सहमति नहीं बन पा रही है। बल्कि समाचार तो यह आ रहे हैं कि सत्ता संघर्ष आपसी गुटों के नेताओं के बीच गोलीबारी तक पहुंच गया है।
अफगानिस्तान के जो ताजा समाचार मिल रहे हैं वे सत्ता संघर्ष की ओर साफ इशारे कर रहे हैं। सत्ता के शीर्ष पर काबिज होने के लिए तालिबान के सहसंस्थापक और 20 साल पहले रहे अब्दुल गनी बरादर और हक्कानी ग्रुप के बीच गोलीबारी के समाचार हैं। यह साफ है कि पाकिस्तान ने अपने प्रतिनिधि ले. जनरल फैज हमीद को अफगानिस्तान भेजा है। लगता है अभी समझौता होने में समय लगेगा जबकि पहले यह माना जा रहा था कि अमेरिका के अफगानिस्तान से पलायन के साथ ही तालिबानी सरकार बन जाएगी। पर यदि अभी समझौता हो भी जाए तो इसे सत्ता संघर्ष का अंत नहीं माना जा सकता है। उधर अफगानिस्तान के ताजा हालातों पर नजर रखने वालों की माने तो ईरान की तर्ज पर सरकार बनाने की अधिक संभावनाएं मानी जा रही हैं। ऐसा माना जा रहा है कि तालिबानी प्रमुख हेबतुल्लाह अखुंदजादा सर्वोच्च नेता होंगे। हालांकि माना यह जा रहा है कि सभी शीर्ष नेताओं का जमावड़ा काबुल में हो गया है। ईरान में सर्वोच्च नेता ही सर्वेसर्वा होता है। इसके बाद राष्ट्रपति और गार्जिअन काउंसिल और विशेषज्ञों की समिति व संसद भी होगी। न्यायपालिका प्रमुख की भी प्रमुख भूमिका होती है। देर सबेर यह सब तो हो जाना है पर जिसके भी सर पर ताज होगा वह कांटों भरा ही होगा। सत्ता संघर्ष, अंदरूनी खींचतान और आतंकवादी गतिविधियों के साथ ही पंजशीर और भुखमरी की समस्या सबसे अधिक गंभीर है।
जानकारों की मानें तो अफगानिस्तान में भुखमरी के हालात अधिक दूर नहीं हैं। खाद्य सामग्री कुछ ही दिनों की बची है तो आने वाले दिनों में लूट खसोट आम हो जाएगी। सूत्रों का मानना है कि चार करोड़ की आबादी के लिए एक माह का राशन ही उपलब्ध है। हालांकि पाकिस्तान, चीन, रूस कितनी ही नजदीकियां दिखाएं पर सबके अपने हित टकरा रहे हैं। इनमें से कोई भी नहीं चाहेगा कि अफगानिस्तान के हालात सामान्य रहे। चीन अपने वन बेल्ट के एजेंडा को पूरा करना चाहता है तो रूस अफगानिस्तान में अपना दखल बनाए रखना चाहता है। पाकिस्तान तालिबानी लड़ाकों के सहयोग से कश्मीर में अराजकता फैलाने के प्रयास में है। इसके साथ ही आईएसआई अपने हितों के अनुसार सरकार बनवाना चाहती है। अब तालिबानी इन सबके मकसद को समझने की भूल कर रहे हैं तो दूसरी और अभी उनका मकसद सत्ता हथियाना ही है। अफगानिस्तान से पलायन का दौर जारी है तो महिलाओं को लेकर कट्टरता के कारण भी देरसबेर समस्या तो बनी ही रहेगी। ऐसे में अफगानिस्तान में शांति का माहौल बनना अभी टेढ़ी खीर ही होगी। इस सबके बावजूद मजे की बात यह है कि तालिबानियों के लिए यदि कोई सहारा बन सकता है तो वह हिन्दुस्तान ही होगा। इसका कारण साफ है। मानवीयता के चलते हिन्दुस्तान सहायता के लिए हमेशा तत्पर रहता है। पाकिस्तान के खुद के खाने के लाले पड़े हुए हैं तो चीन पूरी तरह से व्यावसाहिक हितों को लेकर चलने वाला देश है। उसका सहायता आदि में विश्वास नहीं होता। वह पूरी तरह से गणना के आधार पर चलने वाला देश है। वह तो वन बेल्ट वन रोड़ के आधार पर अपना हस्तक्षेप बढ़ाना चाहता है। पाकिस्तान भी भूल कर रहा है। भले ही आज वह तालिबानियों के सहयोग से कश्मीर में हालात तनावपूर्ण करने के सपने देख रहा हो पर उसे हासिल कुछ होने वाला नहीं है। ऐसे में साफ हो जाता है कि अफगानिस्तान में हालात अच्छे होना दूर की कौड़ी ही होगा।
- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा