हिंदू अस्मिता की बातें, विवेकानंद सा पहनावा, बंगाल के 'योगी' को CM बनाएगी BJP?

By अभिनय आकाश | May 06, 2026

राजनीति में सबसे बड़ा झटका क्या होता है? जब नाम हार जाता है और नैरेटिव टूट जाता है। पश्चिम बंगाल में इस बार यही हुआ है। वो बंगाल जहां ममता बनर्जी सत्ता की परिभाषा थी। जहां ममता से विरोध करना जोखिम भरा था। जहां ममता की इजाजत के बगैर पत्ता तक नहीं हिल रहा था। सत्ता सरकार का ऐसा रुतबा था कि हर गली, हर बूथ, हर फैसले पर कंट्रोल ममता का था। आज उस जमीन पर ममता बनर्जी के साथ खेला है। वो जमीन भगवा मय हो गई है। राम मंदिर, हिंदुत्व और कल्चरल नेशनलिज्म यानी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद। इन तीन विषयों को भाजपा ने देश के हर राज्य में धुरी की तरह इस्तेमाल किया है। सफलता भी मिली है। इसी धुरी के इर्द-गिर्द भाजपा बंगाल में भी घूमी जीती भी। लेकिन यह जीत 5 सालों की यात्रा में पहला कदम है और भाजपा तो इस सोच के साथ बंगाल में दाखिल हुई है कि अब टिकना है। तो ऐसे में भाजपा के सामने चुनौती यह है कि सूबे का मुखिया ऐसे किसी शख्स को बनाया जाए जो इस जीत को पक्का भी कर सके और दोहरा भी सके। कुछ-कुछ वैसा जैसे योगी आदित्यनाथ ने किया या हेमंता विश्वा शर्मा ने। संयासी का भगवा वस्त्र, हिंदू अस्मिता की बातें, मुस्लिम तुष्टीकरण के खिलाफ सीधी आवाज और राजनीति में कदम रखकर हिंदुओं की रक्षा का वादा। जब हम भारतीय राजनीति में भगवा और सत्ता के मिलन की बातें करते हैं तो सबसे पहला नाम उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का आता है। कारण सीधा सा है कि एक संयासी और मठ के प्रमुख से लेकर देश के सबसे बड़े सूबे के मुख्यमंत्री तक का सफर तय करके भारतीय राजनीति में हिंदुत्व की एक नई परिभाषा लिखी। 

भारत सेवाश्रम संघ का एक बड़ा नेटवर्क

बंगाल में भारत सेवाश्रम संघ का प्रमुख होने भर से आपके साथ लाखों लोग जुड़ जाते हैं। जिसका कारण इस संघ का दावा और बंगाल में गहरा प्रभाव है। 1917 में इसकी स्थापना स्वामी प्रणवानंद महाराज ने की थी। तब से यह सामाजिक सेवा के काम करता आ रहा है। जैसे इनके बहुत से कार्यकर्ता की भूमिका बाढ़ और कोविड-19 के वक्त में लोगों को राहत पहुंचाने में रही है। इसके अलावा इस संघ का मुख्य उद्देश्य हिंदू धर्म का प्रचार प्रसार है। यह संगठन अस्पताल, स्कूल और आदिवासी कल्याण केंद्र भी चलाता है। 1920 के दशक से ही इस संघ ने बंगाल के ग्रामीण इलाकों खासकर दलितों और पिछड़ी जातियों के बीच जाकर उन्हें हिंदू समाज की मुख्यधारा से जोड़ने का काम किया है। आज पूरे भारत में इसके आश्रमों और केंद्रों का एक बड़ा नेटवर्क है। यह कुंभ मेला और अमरनाथ यात्रा जैसे बड़े आयोजनों में भी लाखों तीर्थ यात्रियों की सेवा करते हैं। कहने का अर्थ यह है कि बंगाल में इस संघ को मानने वाले लाखों करोड़ों लोग हैं। जाहिर है संघ से जुड़े संतों की भी अच्छी फॉलोइंग होगी। यही कारण है कि भाजपा ने उत्पल महाराज को चुना और नतीजा जीत में तब्दील हुआ। अब सवाल वही कि जब बंगाल में भाजपा का हिंदुत्ववादी चेहरा काम तो कर गया लेकिन क्या इनके अंदर योगी आदित्यनाथ वाली क्वालिटी है? तो इस सवाल का जवाब उत्पल महाराज के बयानों और भाजपा की रणनीति में मिलता है। उत्पल महाराज का साफ मानना है कि राज्य में तुष्टीरण की राजनीति के कारण हिंदुओं को अपने धार्मिक त्यौहार जैसे रथ यात्रा और रामनवमी मनाने के लिए भी पुलिस से विशेष अनुमति लेनी पड़ती है। एक आध्यात्मिक संगठन में रहकर वे हिंदुओं की इन समस्याओं को पूरी तरह से हल नहीं कर पा रहे थे। इसलिए उन्होंने राजनीति का रास्ता चुना। जाहिर है उत्पल महाराज हिंदू अस्मिता और हिंदू एकीकरण की बात करते हैं जो सीधे तौर पर भाजपा की विचारधारा से मेल खाती है।

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संघ ने किया किनारा

उत्पल महाराज ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि उन्होंने संघ के अधिकारियों को चुनाव लड़ने के अपने निर्णय के बारे में सूचित कर दिया था, लेकिन जब वे सहमत नहीं हुए, तो उन्होंने अपनी उम्मीदवारी की घोषणा के एक दिन बाद, 17 मार्च को अपना इस्तीफा सौंप दिया, जिसे स्वीकार कर लिया गया। भारत सेवाश्रम संघ पूरी तरह से गैर-राजनीतिक, सामाजिक सेवा और धार्मिक संगठन है। संघ के महासचिव स्वामी विश्वत्मानंद ने पत्र में लिखा किसी भी परिस्थिति में संघ का कोई संन्यासी, ब्रह्मचारी या आश्रम निवासी किसी भी राजनीतिक गतिविधि में शामिल नहीं हो सकता। उन्होंने आगे कहा कि यदि कोई व्यक्ति किसी राजनीतिक दल के प्रभाव या प्रलोभन में आ जाता है, तो उसका धार्मिक जीवन पूरी तरह नष्ट हो जाता है। यह उसे त्याग के गौरव से विमुख कर देता है और सांसारिक सुखों की लत में डुबो देता है… जबकि हमें संसार के कल्याण के लिए काम करना चाहिए, सांसारिक ऐश्वर्य की ओर लौटने के लिए अपनी अंतरात्मा और वैराग्य का त्याग करना कभी भी उचित नहीं है।

बताया क्यों लिया संयासी बनने का फैसला

दक्षिण दिनाजपुर जिले के बलुरघाट में जन्मे उत्पल महाराज ने बताया कि वे 2000 में इस संगठन में शामिल हुए और चार साल बाद स्थानीय कॉलेज से इतिहास में स्नातक की डिग्री पूरी की। उन्होंने कहा कि मैं बचपन से ही संन्यासी जीवन से बहुत प्रभावित था, क्योंकि मैंने आश्रम के छात्रावास में रहकर पढ़ाई की। तभी मैंने संन्यासी बनने का फैसला किया था। 1917 में स्थापित यह संघ राजनीति से दूर रहता है और परोपकारी कार्यों तथा आपदा राहत कार्यों में संलग्न रहता है, साथ ही यह देश भर में हिंदू मिलन मंदिरों का एक नेटवर्क भी संचालित करता है। उत्पल महाराज का दावा है कि इनका उद्देश्य हिंदुओं को एकजुट करना है। हिंदुओं की सेवा करते हुए मैंने महसूस किया कि राजनीति के कारण यह समुदाय खतरे में है। एक विशेष समुदाय को खुश करने की कोशिशों के कारण हिंदू पीड़ित हैं। आजकल रथ यात्रा या राम नवमी के अवसर पर पूजा-अर्चना करने के लिए भी हिंदुओं को पुलिस की विशेष अनुमति लेनी पड़ती है। हिंदुओं की समस्याओं का समाधान किसी आध्यात्मिक संगठन के माध्यम से नहीं किया जा सकता। तृणमूल कांग्रेस के पूर्व नेता हुमायूं कबीर और वरिष्ठ टीएमसी नेता फिरहाद हकीम की टिप्पणियों का जिक्र करते हुए उत्पल महाराज ने कहा कि मंदिरों में प्रार्थना करने का समय समाप्त हो गया है। उन्होंने कहा कि भले ही संघ ने उन्हें निष्कासित कर दिया हो, लेकिन वे इसे हमेशा अपने दिल और दिमाग में रखेंगे और संगठन के संन्यासियों के साथ संपर्क में रहेंगे। उन्होंने कहा कि मैं कालियागंज में रहता हूँ और इस इलाके की हर गली से वाकिफ हूँ। मैं यहाँ के लोगों को जानता हूँ और उनकी भावनाओं को समझता हूँ। वे कह रहे हैं कि उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि मैं उम्मीदवार बनूँगा। एक भिक्षु होने के नाते मेरा अपने परिवार से कोई संपर्क नहीं है, लेकिन मैं एक भिक्षु के रूप में ही अपना जीवन व्यतीत करता रहूँगा।

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खैर योगी आदित्यनाथ की तरह वेशभूषा और विवेकानंद की तरह दिखने की कोशिश भाजपा कमान को कितना रिझाएगी यह तो वक्त बताएगा। लेकिन उत्पल बाबा के बयानों और उनके समर्थकों का बल भाजपा की विचारधारा से मेल खाने के बावजूद उन्हें अभी मुखिया बनने के लिए मेहनत करनी पड़ सकती है। क्योंकि भारत सेवा श्रम संघ द्वारा उन्हें बाहर निकाला जाना भी एक बड़ी चुनौती है क्योंकि संघ ने साफ कर दिया है कि वे किसी भी राजनीतिक दल का समर्थन नहीं करते। ऐसे में उत्पल महाराज को विधायक से ज्यादा अपनी पहचान बनाने के लिए सड़क पर उतरना ही होगा। 

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