तपस्या से तौबा (व्यंग्य)

By अरुण अर्णव खरे | Sep 20, 2019

बटुक जी वैसे तो भक्ति-वक्ति, तप-वप से कोसों दूर रहते हैं, पर एक दिन पण्ढरी नाथ महाराज के प्रवचनों से प्रभावित हो कर पहुँच गए उनके पास तप और उसके फल के बारे में जानने। महाराज जी ने भी गदगद होते हुए उन्हें अपनी शरण में ले लिया और तपस्या पर तीन घण्टे के लगातार प्रवचन के बाद बोले- "परलोक सुधारने के लिए इस जीवन में तप करना बहुत जरूरी है। तप करने वाले को ही ईश्वर की अनुकम्पा मिलती है। उसे परम संतोष मिलता है--जीवन का सच्चा आनंद प्राप्त होता है।" 

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"जी"- बटुक जी पूर्ण भक्ति भाव से बोले- "आज्ञा करें महाराज"

"क्या आप पत्नी से एक माह दूर सकते हैं"- महाराज जी ने पूछा।

"गुरुदेव, एक माह क्या एक साल दूर रह लूँगा"- सुनकर मुरारी जी की बाँछें खिल गई। उनकी खुशी चेहरे से झलकने लगी।

"बच्चा, तुम्हारी खुशी देखकर लगता है कि पत्नी से तुम्हारी अनबन रहती है, उससे तुम्हें दिल से प्यार नहीं रहा, इस स्थिति में यह तपस्या अर्थहीन है बच्चा-- तुम्हें इसका कोई प्रतिफल नहीं मिलेगा"- महाराज जी बटुक जी की ओर देखते हुए बोले।

बटुक जी जो तब तक खुशी के उपग्रह पर सवार होकर पत्नी से रॉकेट की तरह डिटैच हो आनंद की कक्षा में स्थापित हो चुके थे धड़ाम से हताशा की सतह पर लैण्ड कर गए। डबडबाई आँखों से महाराज जी को देखते हुए डूबते स्वर में बोले- "महाराज जी तप के लिए कोई दूसरा विकल्प भी होगा"

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"बहुत विकल्प हैं बच्चा-- अच्छा फल पाने के लिए फिलहाल तुम अपने बच्चों से एक माह दूर रहकर दिखाओ।

"यह भी कर लूँगा महाराज, पर मुझे लगता है इस तप से भी मुझे लाभ नहीं होगा"- बटुक जी हाथ जोड़ते हुए बोले।

"क्यों"- महाराज जी ने चौंकते हुए पूछा।

"क्या बताऊँ महाराज, बिटिया व्हाट्सएप में खोई रहती है और साहबजादे पबजी में मस्त रहते हैं-- मेरी कोई जरूरत नहीं है उनको"- बटुक जी ने नीचे की ओर देखते हुए अति संकोच से कहा।

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महाराज जी कुछ देर तक आँख बन्द कर सोचते रहे। इस बीच बटुक जी के मोबाइल पर लगातार नोटिफिकेशन आने की घण्टी बजती रही। महाराज जी ने जब अपनी आँखें खोली तो उनके चेहरे पर अजीब तरह की चमक व्याप्त थी। लगा, अर्द्धनिद्रा की अवस्था में उन्हें ज्ञान का पिटारा हाथ लग गया है। बोले- "ठीक है बेटा-- तुम एक माह तक फेसबुक से दूर रहो, तुम्हें इस तपस्या से बहुत पुण्यलाभ प्राप्त होगा-- जिससे परलोक तक सुधर जाएगा" 

इतना सुनना था कि बटुक जी "इहलोक बिगाड़ कर परलोक नहीं सुधारना मुझे-- ऐसी तपस्या से तौबा-- तौबा--" बुदबुदाते हुए तेजी से आश्रम से बाहर निकल गए और महाराज जी लुटे-लुटे से कारवां गुजर जाने के बाद वाला गुबार देखते रह गए।

- अरुण अर्णव खरे

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