Condoms पर टैक्स लगाना काम नहीं आया, China Birth Rate सबसे निचले स्तर पर, बूढ़ा होता ड्रैगन India के लिए मौका, Pak के लिए खतरे की घंटी

By नीरज कुमार दुबे | Jan 21, 2026

दुनिया को चौंकाने वाली खबरें अक्सर युद्ध या अर्थव्यवस्था से आती हैं, लेकिन इस समय चीन के लिए सबसे बड़ी चुनौती किसी सीमा पर नहीं बल्कि उसके घरों के भीतर जन्म ले रही है। चीन की जनसंख्या लगातार घट रही है और यह गिरावट अब अस्थायी नहीं बल्कि स्थायी रुझान बन चुकी है। हालात यह हैं कि सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद चीन में बच्चे पैदा करने की इच्छा तेजी से खत्म होती जा रही है और जन्म दर ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंच गई है।


सरकारी आंकड़ों के अनुसार चीन की कुल आबादी लगातार चौथे वर्ष घटी है। बीते वर्ष देश में जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या पिछले कई दशकों में सबसे कम रही। जन्म दर इतनी नीचे आ चुकी है कि वह आबादी को स्थिर रखने के लिए जरूरी स्तर से काफी कम है। इसके उलट बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ रही है जिससे चीन एक युवा देश से तेजी से बूढ़े देश में बदलता जा रहा है।


चीन ने इस संकट से निपटने के लिए नीतिगत स्तर पर कई बड़े फैसले किए। पहले एक बच्चा नीति को खत्म किया गया फिर दो बच्चों और बाद में तीन बच्चों की अनुमति दी गई। इसके साथ ही सरकार ने बच्चों के पालन पोषण के लिए सब्सिडी, टैक्स छूट और सामाजिक सुविधाओं की घोषणा भी की। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि युवा दंपती इन प्रलोभनों से प्रभावित नहीं हो रहे। महंगे घर, शिक्षा की ऊंची लागत, नौकरी की असुरक्षा और काम का बढ़ता दबाव युवाओं को शादी और बच्चे से दूर कर रहा है। शहरों में रहने वाले युवाओं के लिए एक बच्चे को पालना ही आर्थिक बोझ बन गया है, ऐसे में दूसरा या तीसरा बच्चा उनके लिए कल्पना से बाहर है।


इसी पृष्ठभूमि में चीन सरकार ने कंडोम और गर्भनिरोधक उत्पादों पर टैक्स लगाने का फैसला किया। इसका उद्देश्य अप्रत्यक्ष रूप से जन्म दर बढ़ाना बताया गया। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम वास्तविक समस्या को छूता भी नहीं है। बच्चे न होने की वजह कंडोम नहीं बल्कि सामाजिक और आर्थिक दबाव हैं। यह फैसला दरअसल चीन की सरकार की हताशा को दिखाता है कि वह जन्म दर बढ़ाने के लिए प्रतीकात्मक उपायों तक सिमटती जा रही है। जब तक जीवन की गुणवत्ता और भविष्य की सुरक्षा का भरोसा नहीं मिलेगा तब तक युवा परिवार बच्चे पैदा करने का जोखिम नहीं उठाएंगे।


देखा जाये तो घटती जनसंख्या का सबसे बड़ा असर चीन की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। कामकाजी उम्र की आबादी कम होने से श्रम शक्ति घटेगी और उत्पादन लागत बढ़ेगी। इससे चीन की तेज विकास दर पर ब्रेक लग सकता है। साथ ही बुजुर्गों की बढ़ती संख्या पेंशन और स्वास्थ्य सेवाओं पर भारी दबाव डालेगी। साथ ही, चीन जिसे दुनिया की फैक्ट्री कहा जाता था अब उसे मशीनों और स्वचालन पर ज्यादा निर्भर होना पड़ेगा। यह बदलाव महंगा भी होगा और समय लेने वाला भी।


वहीं, चीन की जनसंख्या गिरावट का असर केवल उसकी सीमाओं तक सीमित नहीं रहेगा। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं प्रभावित होंगी, सस्ते श्रम पर आधारित उद्योगों का स्वरूप बदलेगा और दुनिया की आर्थिक संरचना में बदलाव आएगा। कई देश जो चीन पर निर्भर हैं उन्हें नए विकल्प तलाशने होंगे। इसके साथ ही वैश्विक मांग में कमी आने से अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अस्थिरता बढ़ सकती है। चीन का घरेलू बाजार कमजोर होने का मतलब है कि दुनिया की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा इंजन धीमा पड़ रहा है।


देखा जाये तो जनसंख्या किसी भी देश की सामरिक शक्ति की रीढ़ होती है। युवाओं की कमी का असर चीन की सैन्य भर्ती और दीर्घकालिक रणनीति पर भी पड़ेगा। इसके चलते भविष्य में चीन को संख्या आधारित सैन्य शक्ति की बजाय तकनीक आधारित सेना पर ज्यादा निर्भर होना पड़ेगा। यह बदलाव चीन की वैश्विक महत्वाकांक्षाओं को भी प्रभावित कर सकता है। एक बूढ़ी होती आबादी के साथ लंबे समय तक आक्रामक रणनीति बनाए रखना आसान नहीं होता।


इसमें कोई दो राय नहीं कि चीन की घटती जनसंख्या एक गहरा सामाजिक और आर्थिक संकट है। कंडोम पर टैक्स जैसे उपाय समस्या का समाधान नहीं बल्कि उसकी गंभीरता को उजागर करते हैं। जब तक युवाओं को सुरक्षित भविष्य, सस्ती शिक्षा, सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं और संतुलित जीवन नहीं मिलेगा तब तक जन्म दर बढ़ने की उम्मीद करना भ्रम ही रहेगा। यह संकट चीन के साथ-साथ पूरी दुनिया की दिशा और शक्ति संतुलन को भी बदलने की क्षमता रखता है। साफ है कि ड्रैगन अब बाहर नहीं बल्कि भीतर से जूझ रहा है।


बहरहाल, चीन की घटती जनसंख्या और तेजी से बूढ़ी होती आबादी का असर दक्षिण एशिया की सामरिक राजनीति पर भी साफ दिखाई देगा और यह बदलाव भारत के लिए अवसर जबकि पाकिस्तान के लिए चुनौती बन सकता है। दरअसल, चीन की युवा आबादी कम होने से उसकी आर्थिक और सैन्य क्षमता धीरे-धीरे दबाव में आएगी, जिससे भारत को दीर्घकाल में रणनीतिक संतुलन साधने का मौका मिलेगा। भारत की युवा और कार्यशील जनसंख्या उसे उत्पादन, तकनीक, रक्षा और वैश्विक निवेश के क्षेत्र में स्वाभाविक बढ़त दिला सकती है, वहीं चीन का ध्यान आंतरिक सामाजिक और आर्थिक समस्याओं पर ज्यादा केंद्रित रहेगा। इसके उलट पाकिस्तान की स्थिति ज्यादा कठिन होगी क्योंकि उसकी रणनीतिक ताकत का बड़ा आधार चीन का आर्थिक और सैन्य सहयोग रहा है। यदि चीन खुद जनसंख्या संकट, आर्थिक मंदी और बुजुर्ग आबादी के बोझ से जूझेगा तो पाकिस्तान को मिलने वाला समर्थन सीमित हो सकता है। ऐसे में दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन धीरे-धीरे भारत के पक्ष में झुक सकता है जबकि पाकिस्तान को अपनी कमजोर अर्थव्यवस्था और अस्थिर समाज के साथ अकेले संघर्ष करना पड़ सकता है।


-नीरज कुमार दुबे

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