भरोसे के आंसू (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Sep 01, 2025

महिला सशक्तिकरण पर जितने मर्ज़ी लेख लिख लो, किताबें छाप लो, उनमें से कुछ पृष्ठ पढ़ भी लो, गोष्ठियां आयोजित कर लो, ज्यादा बढ़िया कवरेज के लिए किसी महानुभाव को मुख्य अतिथि बना लो, उनके भाषण पर तालियां बजा लो, बरसों आंदोलन चला लो लेकिन मर्दानगी शब्द सुनते, कहते, पढ़ते, लिखते कुछ अलग सी भावना दिमाग में उगने लगती है जिसमें जान हो, ताकत सी लगे और ठहराव आता दिखे। 

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यह विदेशी भी कैसे कैसे अध्ययन करते हैं। हमारे जैसे विश्वगुरुओं से ही कुछ विषय और ज्ञान लेकर अध्ययन करते तो कुछ और ही नतीजे होते। हमारे सर्वेक्षण और निरीक्षण करने के तरीके सबसे अलग हैं। हमारे यहां तो टीकाकरण और नसबंदी भी कमाल की जाती है। हम सीधे मूल उद्देश्य पर ही सर्वेक्षण और प्रयोग करते हैं। हमारे निरीक्षक तो वास्तविक सड़कों पर घूमकर रेत, बजरी और तारकोल का कण कण का अध्ययन करते हैं। सितम्बर के महीने में हिंदी प्रयोग बारे निरीक्षण होता है तो बहुत ज़्यादा सख्त ईमानदारी प्रयोग की जाती है।  

विदेशियों ने आंसुओं का जो विश्लेषण किया उससे पता चला कि घडियाली आंसू उन लोगों के ज्यादा भरोसेमंद लगते हैं जिनसे रोने की उम्मीद कम की जाती है। देखा जाए इस सन्दर्भ में विश्लेषण की ज़रूरत न थी। जो व्यक्ति कभी कभार रोएगा वो तो जी भर कर खूब रोएगा ही और उनके क्या हमारे समाज में भी मर्दों को आंसू बहाने का मौका कम ही मिलता है। वे तो अपनी प्रेमिकाओं, पत्नियों या सहकर्मियों के आंसू निकलवाने के लिए ज़्यादा जाने जाते हैं।  

विश्लेषण के मुताबिक भावनात्मक आंसुओं को अक्सर ईमानदार और सच्चा माना जाता है। दूसरों को भ्रमित करने के लिए, आंसुओं का भी इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे आंसुओं को मगरमच्छ के आंसू कहा जाता है। नकली रोने वाले लोग ज्यादा दिखावा करते हैं। आंखें सिकोड़ना, दुखी होने का दिखावा जैसे हाव भाव ज्यादा प्रयोग करते हैं।

ऐसे अध्ययन के बारे जानकर लगता है संसार में कितना समय फालतू बातों में बर्बाद किया जाता है। हमें तो इस बारे सदियों से सब कुछ पता है। अफ़सोस की बात यह है कि यह अध्ययन, प्रतिभागियों को पुरुष और महिलाओं के आंसू बहाते चेहरों की डिजिटल रूप से सम्पादित तस्वीरें दिखाकर, सवाल पूछकर किया गया और जवाब देने वालों का अध्ययन देखो जिन्होंने मर्दाना आंसुओं को ज्यादा प्रभावशाली बता दिया।  

हमारे यहां पुरुष और महिलाओं का अंतर बिलकुल स्पष्ट होने के बावजूद उन्हें बराबर माना जाता है। उन्हें समान अधिकार प्राप्त हैं। थोडा बहुत ऊपर नीचे, दाएं और बाएं तो हर समाज में चलता है। दुनिया मानती है, आंसू बह जाने से हर शरीर विश्राम करता है। आंसुओं में दूसरों को द्रवित करने की शक्ति भी मानी जाती है। आंसू मर्दाना हों तो क्या भरोसा ज़्यादा बहता है।    

- संतोष उत्सुक

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