By अभिनय आकाश | Oct 22, 2026
लोकतंत्र में प्रतिरोध का मतलब है अपने हक की लड़ाई के लिए आवाज उठाना। गलत के खिलाफ बोलना और देश चलाने का जिम्मा लेने वालों से जवाबदेही तलब करना। भारत का इतिहास ऐसे ही सफल जन आंदोलनों से लिखा गया है। आजादी की लड़ाई से लेकर 70 के दशक के जेपी मूवमेंट और फिर निर्भया आंदोलन तक हर बड़े बदलाव की नींव सड़क पर ही रखी गई है। जब देश का नौजवान सड़क पर उतरता है तो उसके सीने में सिस्टम के खिलाफ एक जायज आग होती है। सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया कॉकरोच शब्द देते हैं। एक आदमी कॉकरोच के नाम से मीम पेज बनाता है। फॉर्म भरवाता है। इंडिया आता है। 4 500 700 लोग नजर आते हैं। आठ दिन बाद सोनम वांगचुक जैसा चेहरा आता है। एक मीम पेज Instagram पेज सडनली एक बड़ा आंदोलन बन जाता है। देश दुनिया में सबकी निगाहें जाती हैं। भीड़ बढ़ने जा लगती है। हालत यह होती है कि जनता सड़क से संसद जाने को तैयार हो जाती है। नीट परीक्षा में धांधली और पेपर लीक के सताए लाखों स्टूडेंट्स ने जब दिल्ली के जंतर-मंतर पर डेरा डाला तो भारत के मुख्य न्यायाधीश के व्यंग से उपजी कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी ने इस आंदोलन का नेतृत्व संभालने का जिम्मा लिया था। लोग समर्थन भी कर रहे थे और 20 जुलाई को जब चलो संसद का नारा सीजेपी लीडरशिप ने दिया तो देश भर से छात्र दिल्ली पहुंचे। तब तक भी आंदोलन में एक गजब की मासूमियत थी। बच्चे फूल बांट रहे थे।
इस प्रोटेस्ट को और ज्यादा मजबूती तब मिली जब सोनम वांगचुक इस प्रोटेस्ट में शामिल हुए और उन्होंने भूख हड़ताल शुरू कर दी। एक तरह से कहें तो उस दिन के बाद सोनम वांगचुक इस प्रोटेस्ट की रीड बन गए थे। क्योंकि सोनम वांगचुक के जुड़ने के बाद वो लोग भी इस प्रोटेस्ट में आए जो दरअसल पर्यावरण को बचाने की देख रखते हैं। एक गंभीरता उन्होंने गंभीरता उन्होंने दे दी इस प्रोटेस्ट को। मगर लंबे वक्त के बाद अब लगभग 26 दिन के अनशन के बाद भूख हड़ताल के बाद। अब उन्होंने मतलब जूस पिया वो भी जेपी नड्डा के हाथ से।
पिछली बार विरोध प्रदर्शन कैसे खत्म हुआ?
सड़कों से उठकर इंटरनेट के सर्वर को हिला देने वाला एक नया युवा विद्रोह भारत की सबसे पुरानी और संवेदनशील व्यवस्था को चुनौती दे रहा है? सोशल मीडिया का 'रील' वाला ज़माना अब सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं रहा, यह देश का नया डिजिटल आंदोलन केंद्र बन चुका है। जिस तरह 'कॉकरोच जनता पार्टी' ने इंस्टाग्राम के ज़रिए ज़मीनी आक्रोश खड़ा किया और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को कुर्सी छोड़ने पर मजबूर कर दिया, उसने विरोध के एक नए दौर की शुरुआत कर दी है।
जुलाई 2026 में सड़कों पर हो रहे विरोध प्रदर्शन का अंत अचानक हुआ। यह पुलिस के साथ टकराव और उसके बाद एक बड़ी राजनीतिक रियायत मिलने के कारण खत्म हुआ। जब हज़ारों लोग कड़ी सुरक्षा वाले संसद क्षेत्र की ओर बढ़े, तो दिल्ली पुलिस ने कई परतों वाली भारी बैरिकेडिंग लगा दी। आमना-सामना हाथापाई में बदल गया, जिसके बाद पुलिस को भीड़ को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस और लाठीचार्ज का इस्तेमाल करना पड़ा। कई प्रदर्शनकारी और पुलिस अधिकारी घायल हो गए, और कई छात्र नेताओं को कुछ समय के लिए हिरासत में ले लिया गया। सुरक्षा के लिए मार्च रोकना: झड़पों के तुरंत बाद, दिपके और CJP के प्रवक्ता समूह ने सड़कों पर होने वाले सभी मार्च को रोकने की घोषणा की। दिपके ने कहा कि आंदोलन शांतिपूर्ण और संवैधानिक विरोध के लिए प्रतिबद्ध रहेगा और छात्रों के गंभीर रूप से घायल होने या उन्हें हिंसक दंगाई करार दिए जाने का जोखिम नहीं उठा सकता। आंदोलन को सीमित धरने में बदल दिया गया।
संसद मार्च के दौरान हुई झड़प के पांच दिन बाद, जनता के लगातार ध्यान और विपक्ष द्वारा संसद में किए जा रहे हंगामे के बीच, केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपना इस्तीफा दे दिया। शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के साथ जो उनकी मुख्य मांग थी, CJP नेतृत्व ने एक बड़ी प्रतीकात्मक जीत की घोषणा की। कड़ी सुरक्षा निगरानी में जंतर-मंतर पर लगे टेंट धीरे-धीरे हटा दिए गए, और आंदोलन सड़कों पर सक्रिय टकराव से हटकर एक डिजिटल निगरानी और नीति वकालत नेटवर्क में बदल गया।