Why CJP protest has failed |कड़ी सुरक्षा या राजनीतिक एकता की कमी ने फेल किया CJP 2.0 | Teh Tak Part 3

मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ कॉकरोच जनता पार्टी का प्रदर्शन पुलिस की भारी घेराबंदी, नेताओं की हिरासत और छात्रों की बेरुखी के कारण विफल रहा। इस दौरान दिल्ली में मेट्रो और इंटरनेट बंद करने पर सुप्रीम कोर्ट ने अधिकारियों को अवमानना नोटिस जारी किया। वहीं प्रशासन ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए अपनी पाबंदियों का बचाव किया।
मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्षी दलों और कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का मौजूदा आंदोलन एक राष्ट्रीय राजनीतिक आंदोलन में बदलने की कोशिशों की ओर इशारा करता है। यह घटनाक्रम NEET पेपर लीक को लेकर CJP के नेतृत्व में छात्रों और युवाओं के महीने भर चले विरोध प्रदर्शनों के बाद सामने आया है, जिसके परिणामस्वरूप जुलाई में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा था। CJP नेताओं ने प्रधान के इस्तीफे को इस बात के सबूत के तौर पर पेश किया कि सड़कों पर लगातार दबाव बनाकर सरकार को जवाबदेही के लिए मजबूर किया जा सकता है। हालाँकि, आज़ादी के बाद से देश में हुए बड़े जन-आंदोलनों का इतिहास मिला-जुला रहा है। कुछ आंदोलनों ने सरकारों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया; कुछ अपने तय लक्ष्यों को तो हासिल नहीं कर पाए, लेकिन उन्होंने राजनीति की दिशा बदल दी और कुछ ऐसे भी रहे जो महीनों तक चलने के बावजूद सरकारों से अपनी मुख्य मांगें मनवाने में विफल रहे। सीजेपी के प्रोटेस्ट 1.0 के बाद 10 अक्तूबर को विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर आयोजित किया गया आंदोंलन 2.0 फ्लॉप शो साबित हुआ।
पुलिस की तैयारी
होम सेक्रेटरी के साथ मीटिंग के बाद दिल्ली पुलिस मेगा प्लान के साथ काम करती रही और 9 अक्टूबर को उसका 37 पॉइंट का एक ड्रैग्नेट चेक रिव्यू प्रस्तुत किया गया। सेंट्रल दिल्ली में 26,000 पुलिस जवान और अर्धसैनिक बल तैनात। जिला स्तर पर एक दर्जन से ज्यादा डिटेंशन सेंटर। दिल्ली आने जाने वाली 245 ट्रेन रद्द, 50 से ज्यादा मेट्रो स्टेशन बंद। दिल्ली के पीजी और हॉस्टल वालों से कहा गया कि लोगों और छात्रों को प्रदर्शन में ना जाने दें। 9 अक्टूबर को रात 10:00 बजे से जंतर-मंतर की 4 किमी की रेडियस में मोबाइल इंटरनेट भी बंद कर दिया गया। फिर आया डी डे 10 अक्टूबर और सुबह से खबरें आने लगी कि दिल्ली पुलिस अपने इस प्लान पर किस तरह से काम कर रही है। जो प्रदर्शनकारी रात में दिल्ली पहुंचे जिन्होंने बंगला साहिब गुरुद्वारे में शरण ली पुलिस ने तड़के वहां दबिश दी। सेंट्रल दिल्ली में कुछ और जगहों पर भी प्रदर्शनकारियों के ग्रुप नजर आए लेकिन पुलिस की संख्या हमेशा उनसे कई गुना ज्यादा रही। नतीजा बसें भरकर प्रदर्शनकारियों को सुबह 8:00 बजे से ही डिटेंशन सेंटर भेजा जाने लगा। पुलिस को 7000 प्रदर्शनकारियों के दिल्ली पहुंचने का इनपुट मिला था। बीती बार के मुकाबले इस बार पहरा बहुत ज्यादा कड़ा था। सुबह के वक्त सेंट्रल दिल्ली की तमाम सड़कें पूरी तरह से बैरिकेडिंग की वजह से खाली नजर आई। आखिरी बार यह नजारा कोविड लॉकडाउन के दौरान देखा था। जहां जो कोई दिखता पुलिस फौरन हिरासत में लेती। ध्रुव राठी ने 9 अक्टूबर की रात इंडिया गेट से दिल्ली में अपनी मौजूदगी का वीडियो डाला था। राठी को गुरुग्राम के सेक्टर 56 स्थित उनके घर से डिटेन किया गया। पुलिस सीजेपी की लीडरशिप की भी क्लोज मॉनिटरिंग कर रही थी। उनके लीगल अफेयर्स की हेड रत्ना सिंह को जंगपुरा स्थित उनके घर से बाहर निकलते ही कार में डिटेन कर लिया गया। 9 अक्टूबर को यह तीनों ही मुंबई में मौजूद थे। अलग-अलग मीडिया ग्रुप्स के कार्यक्रमों में हिस्सा ले रहे थे और लगातार वीडियो पोस्ट कर रहे थे कि आंदोलन तो होकर रहेगा। तब उनके हिरासत का अनुमान भी लगाया जा रहा था। दीपके दास और रांका मुंबई एयरपोर्ट से सुबह 10 अक्टूबर के रोज करीब 8:00 बजे फ्लाइट पर सवार होने के लिए पहुंचे और 10:30 बजे फ्लाइट दिल्ली के इंदिरा गांधी एयरपोर्ट पर लैंड हुई। लैंडिंग होते ही दिल्ली पुलिस के जवान फ्लाइट के अंदर पहुंचे। तीनों को हिरासत में लिया गया। अलग-अलग अज्ञात जगहों पर ले जाया गया। इन सबके बीच खबर आई कि अभिजीत दीपके की दादी का देहांत हो गया है। जिसके बाद दिल्ली पुलिस ने उन्हें मानवीय आधार पर पैत्री गांव जाने की मंजूरी दी। इस तरह की खबरें भी आई।
क्या सच में जेनजी ने बनाई दूरी?
देश में जेन-ज़ी के दम पर बदलाव का दावा करने वाले सीजेपी (CJP) के दूसरे बड़े शक्ति प्रदर्शन में ही युवाओं की दूरी साफ़ नज़र आई। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े को लेकर जंतर-मंतर पर बुलाई गई दूसरी मुहिम उस तरह परवान नहीं चढ़ सकी। इसकी एक वजह जहां पुलिस-प्रशासन का कड़ा पहरा रहा, वहीं युवाओं और छात्रों का इस आंदोलन से घटता जुड़ाव भी अहम कारण बना। हालांकि जेएनयू छात्र संघ (JNUSU) के कुछ चेहरे प्रदर्शन में ज़रूर पहुंचे, मगर अलग-अलग विश्वविद्यालयों और परिसरों से छात्रों की वह ऐतिहासिक भीड़ नदारद रही जिसकी उम्मीद की जा रही थी। साफ है कि सीजेपी के शुरुआती आंदोलन के मुकाबले इस बार न तो ज़मीनी स्तर पर छात्रों का वैसा उत्साह दिखा, और न ही विपक्षी दलों का वह एकजुट राजनीतिक समर्थन जुटाया जा सका।
सोशल मीडिया पर भी सुस्त पड़ा समर्थन
ज़मीनी स्तर के साथ-साथ सोशल मीडिया पर भी इस बार सीजेपी के पक्ष में छात्रों की वह मुखर मौजूदगी नहीं दिखी, जो पहले नज़र आई थी। हालांकि एनएसयूआई (NSUI) ने कार्यक्रम में भागीदारी दर्ज कराई, लेकिन डीयू, जेएनयू, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, डीटीयू, आईआईटी दिल्ली और आंबेडकर विश्वविद्यालय जैसे प्रमुख संस्थानों से छात्रों की भारी लामबंदी नहीं हो सकी। दरअसल, इससे पहले पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था की खामियों से जुड़े मसले सीधे छात्रों के भविष्य से जुड़े थे, जिसने उन्हें स्वतः ही एकजुट कर दिया था। इसके उलट, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग एक विशुद्ध राजनीतिक मुद्दा बन गई, जिसके चलते आम छात्र वर्ग इससे उस तरह भावनात्मक रूप से नहीं जुड़ पाया।
सुप्रीम कोर्ट ने जताई नाराजगी
10 अक्टूबर 2026 को कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन को रोकने के लिए दिल्ली में मोबाइल इंटरनेट, कई मेट्रो स्टेशनों के गेट और दर्जनों ट्रेनें बंद कर दी गई थीं, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त नाराजगी जताई थी। सुप्रीम कोर्ट ने 9 अक्टूबर को आदेश दिया था कि 10 अक्टूबर को बिना नियम के पाबंदियां ना लगाई जाए। खासकर मेट्रो ट्रेनों पर पूरी तरह से रोक ना हो। लेकिन 10 अक्टूबर को दिल्ली के कुछ इलाकों में मोबाइल इंटरनेट बंद कर दिया गया। साथ ही दिल्ली पुलिस ने मेट्रो के कई स्टेशनों के एंट्री और एग्जिट गेट बंद करने की मांग की। इसके बाद आरोप लगा कि अधिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन किया है। 11 अक्टूबर को कोर्ट ने इस मामले में दायर याचिकाओं पर ध्यान दिया। उसी दिन कोर्ट ने यह भी कहा कि इंटरनेट सेवाओं में कोई रुकावट ना हो। गृह सचिव, पुलिस कमिश्नर और डीएमआरसी की चेयरमैन को अवमानना का नोटिस जारी किया गया। अवमानना का मतलब यह होता है कि कोर्ट के आदेश का पालन ना करना या उसका उल्लंघन करना। गृह सचिव गोविंद मोहन ने अपने हलफनामे में कहा है कि दिल्ली के कुछ हिस्सों में मोबाइल इंटरनेट बंद करने का फैसला शांति और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए लिया गया था। उनका कहना है कि सीजेपी ने प्रदर्शन का ऐलान किया था। लेकिन उसके पास जरूरी अनुमति यानी कि इजाजत नहीं थी। पुलिस ने प्रदर्शन की इजाजत भी नहीं दी थी। ऐसे में प्रशासन को डर था कि प्रदर्शन के दौरान हिंसा हो सकती है और लोगों के बीच अफवाहएं फैल सकती हैं। गृह सचिव ने कहा कि इंटरनेट बंद करने का फैसला किसी आदेश को जानबूझकर ना मानने के लिए नहीं लिया गया था। उन्होंने कोर्ट से इस मामले में उन्हें अवमानना की कारवाई से राहत देने की भी मांग की है। होम सेक्रेटरी गोविंद मोहन और पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार दोनों ने कहा है कि उन्होंने कोर्ट के आदेश को जानबूझकर नहीं तोड़ा। यह लगातार बार-बार कहें। गृह सचिव ने इंटरनेट बंद करने को जरूरी बताया है। वहीं पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार ने सीजेपी के पुराने प्रदर्शनों और हिंसा का हवाला देते हुए पुलिस की कारवाई का बचाव किया है।
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