International Borders of India | चीन अरुणाचल को अपना क्यों बताता है? |Teh Tak Part 2

By अभिनय आकाश | Jun 22, 2026

पाकिस्तान के बारे में बात होती है तो हमें एलओसी के बारे में पता है। लेकिन चीन के एलएएसी के केस में कन्फ्यूजन क्यों खड़ी हो जाती है। चीन का तो बॉर्डर तक भारत से नहीं लगता था। फिर इतिहास में ऐसी क्या चीजें हुई जिसकी वजह से चीन हमारी सिर पर आकर बैठ गया। अरुणाचल प्रदेश की बर्फीली चोटियों से लेकर भूटान के डोकलाम तक, भारत और चीन के बीच की यह सीमा सिर्फ नक्शे पर खींची गई एक रेखा नहीं है। यही वह इलाका है जहां एशिया की दो महाशक्तियां आमने-सामने खड़ी हैं। तवांग पर चीन का दावा हो, डोकलाम में सैनिकों की तनातनी हो या सीमा के पास बन रहे चीनी गांव। हर घटना एक बड़े भू-राजनीतिक खेल की ओर इशारा करती है। सवाल है, आखिर चीन की नजर इस क्षेत्र पर इतनी गड़ी क्यों है और भारत इसके जवाब में क्या कर रहा है?

क्या है मैकमोहन रेखा

1914 में जब भारत में ब्रिटिश शासन था और तिब्बत सरकार के साथ शिमला समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे। ब्रिटिश सरकार के एक प्रशासक सर हेनरी मैकमोहन तिब्बत सरकार के प्रतिनिधि के साथ समझौता करने वाले व्यक्ति थे। जिनके नाम पर तिब्बत और भारत की सीमा को मैकमोहन लाइन का नाम दिया गया। लेकिन चूंकि चीन तिब्बत को स्वायत्त नहीं मानता है, इसलिए उसने तिब्बत सरकार द्वारा हस्ताक्षर किए उस समझौते को भी कभी नहीं माना। वहीं दूसरी ओर भारत में मैकमोहन लाइन को दर्शाता हुआ मानचित्र आधिकारिक रूप से 1938 में प्रकाशित हो गया था और तब ही से ये मान्य है।

गड़बड़ कहां हुई

इस सम्मेलन में मानत्रित का कोई लिखित रिकॉर्ड नहीं रखा गया। बस एक मैप पर लाइनों के सहारे आउटर तिब्बत को इनर तिब्बत और इनर तिब्बत को चीन से अलग कर दिया गया। दो मानचित्र आए। पहला 27 अप्रैल 1914 को जिसपर चीन के प्रतिनिधि ने दस्तखत कर दी। दूसरा आया 3 जुलाई 1914 को ये डिजेस्ड मैप था जिस पर चीन ने हस्ताक्षर से इनकार कर दिया। दूसरी ओर भारत में मैकमोहन लाइन को दर्शाता हुआ मानचित्र आधिकारिक रूप से 1938 में प्रकाशित हो गया था और तब ही से ये मान्य है।

डोकलाम संकट क्या था?

16 जून 2017 हिमालय की ठंडी हवा के बीच एक संकरी पहाड़ी सड़क पर कुछ सैनिक आमने-सामने खड़े थे। गोलियां नहीं चली थी। लेकिन उंगलियां ट्रिगर के बेहद करीब थी। और अगर उस दिन एक भी गोली चल जाती तो शायद एशिया का नक्शा बदल जाता। यह कहानी है डोकलाम की। एक ऐसी पहाड़ी जमीन की जिसका नाम 2017 से पहले बहुत कम लोगों ने सुना था। डोकलाम, भूटान, चीन और भारत के ट्राई जंक्शन के पास स्थित एक छोटा सा पठार। लेकिन रणनीतिक रूप से यह जगह साधारण नहीं थी। चीन कई सालों से इस इलाके पर अपना दावा करता रहा था। भूटान इसे अपनी जमीन मानता था और भारत भारत के लिए यह सिर्फ भूटान का मुद्दा नहीं था। यह अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल था। क्योंकि डोकलाम के ठीक दक्षिण में है सिलीगुड़ी कॉरिडोर जिसे चिकन नेक भी कहा जाता है। 16 जून 2017 को चीनी पीपल्स लिबरेशन आर्मी ने डोकलाम क्षेत्र में सड़क निर्माण शुरू किया। भूटान ने औपचारिक रूप से इसका विरोध किया। थिम्पू से बीजिंग तक विरोध दर्ज हुआ। लेकिन जमीन पर बुलडोजर चलते रहे। भूटान और भारत के बीच 1949 से एक विशेष मित्रता संधि रही है जिसे 2007 में अपडेट किया गया। इस समझौते के तहत दोनों देश एक दूसरे के सुरक्षा हितों में सहयोग करते हैं। जब भूटान ने खतरा महसूस किया तो नजरें भारत की ओर उठी।  18 जून 2017 भारतीय सेना की एक टुकड़ी सिक्किम सेक्टर से आगे बढ़ी और डोकलाम में चीनी निर्माण दल के सामने खड़ी हो गई। बिना गोली चलाए बिना युद्ध की घोषणा किए लेकिन स्पष्ट संदेश के साथ आगे नहीं। चीन ने इसे सीमा का उल्लंघन कहा।  करीब 73 दिन तक सैनिक सिर्फ कुछ मीटर की दूरी पर खड़े रहे। कई बार धक्कामुक्की हुई। कई बार पत्थर चले। लेकिन गोलियां अब भी शांत थी। जुलाई और अगस्त की रातें बेहद तनावपूर्ण थी। किसी भी पल हालात बिगड़ सकते थे। दोनों देशों की वायुसेना हाई अलर्ट पर थी। राजनयिक चैनल खुले थे लेकिन भरोसा बंद दरवाजों के पीछे फंसा था। हर सैनिक जानता था अगर आदेश आया तो पीछे हटने का विकल्प नहीं होगा। फिर 28 अगस्त 2017 को एक घोषणा हुई। दोनों देशों ने डिसंगेजमेंट पर सहमति जताई।

चीन की बॉर्डर विलेज स्ट्रैटर्जी

चीन सभी क्षेत्रों में एलएसी के पास गांवों का निर्माण कर रहा है। राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने साल 2021 में अरुणाचल प्रदेश की सीमा के पास तिब्बत के एक गांव का दौरा किया था। कानून की घोषणा से पहले ही, पूर्वी क्षेत्र में 1,300 किलोमीटर से अधिक लंबी एलएसी पर भारतीय सेना की अभियानगत तैयारियों को देख रहे कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल मनोज पांडे ने कहा कि सीमा पर चीन की तरफ कुछ क्षेत्रों में नए गांव स्थापित किए गए हैं और भारत ने अपनी अभियानगत रणनीति में इसका संज्ञान लिया है क्योंकि आवासों को सैन्य उद्देश्यों के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है। लोग वहां कितनी मात्रा में बसे हैं, यह अलग सवाल है। लेकिन हमारे लिए यह चिंता का विषय है कि वे आवासों को सैन्य उद्देश्यों के लिए कर सकते हैं। लेफ्टिनेंट जनरल हुड्डा ने कहा कि चीन हमेशा अपने दावों को मजबूत करने के लिए नागरिक आबादी का इस्तेमाल करता रहा है। उन्होंने डेमचोक की स्थिति का उल्लेख किया, जहां कुछ "तथाकथित नागरिकों" ने एलएसी के भारतीय हिस्से में तंबू गाड़ दिए और इस मुद्दे का समाधान होना बाकी है।

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