Uniform Civil Code II | हिंदू-मुस्लिम-सिख ईसाई पर UCC के आने से क्या पड़ेगा प्रभाव

By अभिनय आकाश | Jul 10, 2023

समान नागरिक संहिता (यूसीसी) के निर्माण की वकालत कर रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर धर्मों के बीच बहस के द्वार खोल दिए हैं। यूसीसी का मुख्य उद्देश्य विवाह, तलाक, गोद लेने, विरासत, उत्तराधिकार और संरक्षकता से संबंधित वर्तमान कानूनों को सुव्यवस्थित करना होगा। यदि यूसीसी लागू किया जाता है, तो यह विवाह के लिए न्यूनतम कानूनी उम्र तय करने, द्विविवाह को खत्म करने और अंतर-धार्मिक विवाह से जुड़े मुद्दों को हल करने में सक्षम होगा। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 के अनुसार, राज्य पूरे देश में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा। चूंकि कई धर्म अपने स्वयं के व्यक्तिगत कानूनों का पालन करते हैं जो अंतर-व्यक्तिगत संबंधों और संबंधित मुद्दों को नियंत्रित करते हैं, यूसीसी का उद्देश्य इन व्यक्तिगत कानूनों को प्रतिस्थापित करना और सभी के लिए लागू एक सामान्य कानून लाना है। ऐसे में आइए जानते हैं कि यूसीसी लागू होने पर विभिन्न धर्मों और उनके व्यक्तिगत कानूनों पर क्या प्रभाव पड़ेगा।

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समान नागरिक संहिता का हिंदू धर्म पर प्रभाव

अगर यूसीसी आता है तो हिंदू विवाह अधिनियम (1955) और हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम (1956) जैसे मौजूदा कानून में संशोधन करना होगा। उदाहरण के लिए, हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 2(2) कहती है कि इसके प्रावधान अनुसूचित जनजातियों पर लागू नहीं होंगे। कानून की धारा 5(5) और 7 में कहा गया है कि प्रथागत प्रथाएं प्रावधानों पर हावी हो जाएंगी। लेकिन यूसीसी इन सभी अपवादों की अनुमति नहीं देगा। 

सिख धर्म पर प्रभाव

सिखों की विवाह कानून 1909 के आनंद विवाह अधिनियम के अंतर्गत आते हैं। हालाँकि, इसमें तलाक का कोई प्रावधान नहीं है। सिखों में तलाक के लिए हिंदू विवाह अधिनियम द्वारा शासित होते हैं। लेकिन यदि यूसीसी पेश किया जाता है, तो आनंद अधिनियम के तहत पंजीकृत सभी समुदायों और विवाहों पर एक सामान्य कानून लागू होने की संभावना है।

पारसी धर्म पर क्या प्रभाव पड़ेगा

पारसी विवाह और तलाक अधिनियम, 1936 के तहत जो भी महिला किसी दूसरे धर्म के व्यक्ति से शादी करती है, वह पारसी रीति-रिवाजों के सभी अधिकार खो देती है, लेकिन अगर यूसीसी आता है, तो यह प्रावधान समाप्त हो जाएगा। पारसी दत्तक पुत्रियों के अधिकारों को मान्यता नहीं देते हैं, जबकि दत्तक पुत्र केवल पिता का अंतिम संस्कार कर सकता है। इसलिए, यदि यूसीसी पेश किया जाता है, तो सभी धर्मों के लिए संरक्षकता और हिरासत कानून समान होंगे और ये ही चलेगा। 

ईसाई धर्म पर क्या पड़ेगा असर

यूसीसी ईसाई व्यक्तिगत कानून जैसे विरासत, गोद लेने और उत्तराधिकार को प्रभावित करेगा। लेकिन ईसाई तलाक अधिनियम 1869 की धारा 10ए(1) के तहत आपसी सहमति से तलाक के लिए आवदेन देने से पहले पति-पत्नी को कम से कम दो साल तक अलग रहना अनिवार्य है। लेकिन यूसीसी आने के बाद ये खत्म हो जाएगा। 

मुस्लिम धर्म पर क्या पड़ेगा प्रभाव

मुस्लिम पर्सनल (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 में कहा गया है कि शरीयत या इस्लामी कानून शादी, तलाक और भरण-पोषण का मार्गदर्शन करेगा। अगर यूसीसी आता है तो शरीयत कानून के तहत शादी की न्यूनतम उम्र बदल जाएगी और बहुविवाह को खत्म किया जा सकेगा।

मुसलमानों को क्यों सबसे ज्यादा दिक्कत

शादी, तलाक, गुजारा भत्ता, विरासत, गोद, शादी की उम्र ये वो विषय हैं जिसको लेकर मुसलमानों को समान नागरिक संहिता से सबसे ज्यादा परेशानी है। दरअसल, भारत में मुस्लिम पुरुषों को चार शादी की इजाजत है। 2019-21 के दौरान एनएफएचएस-5 के डेटा के अनुसार 1.9 प्रतिशत मुस्लिम महिलाओं ने माना है कि उनके पति की दूसरी बीबीयां हैं। मुस्लिमों में तलाक को लेकर अपना शरिया कानून है। शरीयत में इस बारे में विस्तार से बताया गया है। इसी के तहत मुसलमानों को पर्सनल लॉ में छूट मिली है। शरिया तलाक का कानून भारत में मौजूद अन्य धर्मों के कानून या स्पेशल मैरिज एक्ट से अलग है। तलाक के बाद महिला को गुजारा भत्ता के मामले में मुसलमानों में अलग नियं हैं। इसके तहत मुस्लिम पुरुष अपनी पत्नी को इद्दत की अवधि (तलाक के तीन महीने 10 दिन) तक ही गुजारा भत्ता देने के लिए बाध्य हैं। भारत में लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र 18 साल रखी गई है, जबकि पर्सनल लॉ में मुस्लिम लड़की के लिए 15 साल के बाद शादी की अनुमति दी गई है। भारत में गोद लेने का अधिकार है लेकिन इस्लाम में गोद लेने की इजाजत नहीं है। इसके अलावा हिंदुओं में बेटा-बेटी को संपत्ति में बराबर का अधिकार दिया गया है। मुसलमानों को इस मामले में हस्तक्षेप का डर बना हुआ है। 

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