By अभिनय आकाश | Jul 24, 2026
क्या आप जानते हैं कि ब्रिटिश हुकूमत की सदियों लंबी गुलामी से आज़ाद होने के बाद भी, भारत समेत दुनिया के 56 स्वतंत्र देश आज भी कॉमनवेल्थ यानी राष्ट्रमंडल का हिस्सा क्यों बने हुए हैं? एक ऐसा संगठन जिसके शीर्ष पर आज भी ब्रिटेन का राजा बैठता है, आखिर भारत जैसे महाशक्ति बनते देश के लिए उसकी क्या मजबूरी या कूटनीति है? इस पूरे संगठन की असली कहानी और इसकी चालाक कूटनीतिक नींव साल 1926 की 'बाल्फोर घोषणा' में कैसे रखी गई थी? एक ऐसी घोषणा, जिसने गिरते हुए ब्रिटिश साम्राज्य को बचाने के लिए स्वतंत्र हो रहे देशों को एक नए अदृश्य जाल में बांधने का काम किया और जिसके बदले नियमों ने आगे चलकर आज़ाद भारत के इतिहास को भी प्रभावित किया।
1926 में लंदन में हुए 'साम्राज्यिक सम्मेलन'के दौरान ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर स्वशासी देशों (जैसे कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और दक्षिण अफ्रीका) की स्थिति को स्पष्ट करने के लिए यह घोषणा की गई थी। इस घोषणा के तहत यह माना गया कि ये सभी देश ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर पूरी तरह से स्वतंत्र, स्वायत्त और एक-दूसरे के समान हैं। इन देशों का आंतरिक या बाहरी मामला ब्रिटिश सरकार के अधीन नहीं रहा, हालाँकि वे ब्रिटिश सम्राट के प्रति निष्ठा से जुड़े रहे। इसी घोषणा ने आगे चलकर 1931 में 'वेस्टमिंस्टर की संविधि' का आधार तैयार किया, जिससे ब्रिटिश कॉमनवेल्थ को कानूनी मान्यता मिली।
इसकी शुरुआत अप्रैल 1949 में हुई, जब ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, सीलोन (अब श्रीलंका), भारत, न्यूज़ीलैंड, पाकिस्तान, दक्षिण अफ्रीका और कनाडा के नेता कॉमनवेल्थ प्रधानमंत्री सम्मेलन के लिए लंदन पहुँचे। दुनिया भर में यह दौर नई संधियों, गठबंधनों और समानता की चाहत का था। भारत एक गणतंत्र बनने के अपने अधिकार पर ज़ोर दे रहा था और साथ ही कॉमनवेल्थ में बने रहने की इच्छा भी ज़ाहिर कर रहा था। इस स्थिति ने समूह के सामने एक चुनौती खड़ी कर दी। एक गणतंत्र के तौर पर, भारत अब किंग जॉर्ज VI को अपना राष्ट्राध्यक्ष नहीं मान सकता था। 1926 के बाल्फोर घोषणापत्र में कहा गया था कि ब्रिटिश कॉमनवेल्थ के देश क्राउन के प्रति एक जैसी निष्ठा से जुड़े हुए हैं। आपसी सहयोग की भावना और नई संभावनाओं के वादे के साथ, नेता इस संगठन के भविष्य पर चर्चा करने के लिए एक साथ आए। 26 अप्रैल 1949 यानी 70 साल पहले उन्होंने लंदन घोषणापत्र पर हस्ताक्षर करके आधुनिक कॉमनवेल्थ की नींव रखी। यह घोषणा उस समूह के लिए एक अहम मोड़ साबित हुई और इसने कॉमनवेल्थ को एक नई राह दिखाई। इसने संगठन के नाम से "ब्रिटिश" शब्द हटा दिया और इसके सदस्यों की आज़ादी और बराबरी पर ज़ोर दिया न सिर्फ़ कॉमनवेल्थ के प्रमुख के तौर पर राजा के साथ उनके रिश्तों के मामले में बल्कि 'शांति, आज़ादी और तरक्की' के लिए मिलकर काम करने के मामले में भी। खास बात यह है कि इसमें यह तय किया गया कि क्राउन (शाही सत्ता) को कॉमनवेल्थ संगठन का 'प्रतीक' माना जाएगा। इससे भारत को यह छूट मिली कि वह राजा को अपने देश का राष्ट्राध्यक्ष तो न माने, लेकिन उन्हें कॉमनवेल्थ के प्रमुख के तौर पर मान्यता दे। उस ऐतिहासिक दिन के बाद से कॉमनवेल्थ ने वैश्विक स्तर पर अहमियत हासिल की है। इसके सदस्यों की संख्या बढ़कर 53 देश और 2.4 अरब लोग हो गई है, और अब हर महाद्वीप में इसका प्रतिनिधित्व है।
आज कई लोग सवाल उठाते हैं कि जब यह संगठन ब्रिटिश औपनिवेशिक अतीत की याद दिलाता है, तो भारत आज भी इसका हिस्सा क्यों है? इसके पीछे शुद्ध व्यावहारिक और कूटनीतिक कारण हैं। पहला, यह 56 स्वतंत्र देशों का एक स्वैच्छिक मंच है, जहाँ भारत बिना किसी दबाव के अपनी बात वैश्विक स्तर पर रख सकता है। दूसरा, इसके जरिए अफ्रीका, कैरेबियाई और प्रशांत महासागर के छोटे देशों के साथ भारत के व्यापारिक और रणनीतिक संबंध मजबूत होते हैं। और तीसरा, हर 4 साल में होने वाले 'कॉमनवेल्थ गेम्स' जैसे मंच सदस्य देशों के बीच सांस्कृतिक और खेल संबंधों को बढ़ावा देते हैं।
कुल मिलाकर कहे तो कॉमनवेल्थ का गठन इसलिए हुआ ताकि ब्रिटिश गुलामी का एक साझा इतिहास रखने वाले देश, अपनी आज़ादी को बरकरार रखते हुए, शांति और प्रगति के लिए एक-दूसरे के साथ सहयोग कर सकें। वर्तमान में इस संगठन में 56 देश शामिल हैं।