By अभिनय आकाश | Jul 24, 2026
आखिरकार लंबे असमंजस के बाद राष्ट्रमंडल खेलों (Commonwealth Games) को अपना नया ठिकाना मिल ही गया—स्कॉटलैंड का ग्लासगो शहर 2026 के इन खेलों की मेजबानी करेगा। लेकिन यह मेजबानी एक बड़े समझौते के साथ आ रही है; 2026 में यह महाकुंभ बेहद सीमित यानी 'ट्रिम डाउन' (Trimmed-down) अवतार में ही नजर आएगा। बर्मिंघम 2022 में जहां 19 खेल शामिल थे, वहीं ग्लासगो 2026 में केवल 10 खेलों को ही जगह दी जा रही है। दरअसल, ऑस्ट्रेलिया के विक्टोरिया राज्य ने लागत का बजट बढ़कर करीब 4.9 अरब डॉलर तक पहुंचने का हवाला देकर पिछले साल अचानक अपने हाथ पीछे खींच लिए थे। विक्टोरिया के पीछे हटने के बाद सिंगापुर और मलेशिया जैसे देशों ने भी भारी वित्तीय जोखिम को देखते हुए मेजबानी से साफ इनकार कर दिया था। यह पहली बार नहीं है—2022 के लिए भी डरबन (दक्षिण अफ्रीका) को चुना गया था, लेकिन आर्थिक तंगी के कारण उसे भी मेजबानी से हाथ धोना पड़ा था। ग्लासगो का यह मॉडल सीजीएफ (CGF) के 100 मिलियन पाउंड के निवेश और विक्टोरिया से मिले मुआवजे के दम पर बिना किसी सरकारी बजटीय बोझ के आयोजित होगा। पिछले छह में से पांच संस्करणों का सिर्फ ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया तक सिमट कर रह जाना इन खेलों की सिकुड़ती वैश्विक अपील को साफ दर्शाता है। एशियाई और यूरोपीय खेलों जैसी मजबूत क्षेत्रीय प्रतियोगिताओं की बढ़ती लोकप्रियता ने राष्ट्रमंडल खेलों के अस्तित्व पर और गहरा संकट खड़ा कर दिया है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि क्या ये देश अब भी औपनिवेशिक पहचान के साथ आगे बढ़ना चाहते हैं, या फिर राष्ट्रमंडल खेलों का सूरज अब हमेशा के लिए ढलने की कगार पर है?
एथलेटिक्स
तैराकी
आर्टिस्टिक जिम्नास्टिक्स
ट्रैक साइक्लिंग
नेटबॉल
वेटलिफ्टिंग
मुक्केबाजी
जूडो
बॉल्स
ऑस्ट्रेलिया से मिलने वाली लगभग 2.3 मिलियन यूरो की फ़ंडिंग विक्टोरिया सरकार की ओर से CGF को दिए जाने वाले मुआवज़े का हिस्सा है। ये खेल को और बेहतर बनाएगी। लेकिन सवाल यह है कि जब खेल का शेड्यूल बस एक साल दूर है, तब भी कोई आकर्षक मेज़बान क्यों नहीं मिल पा रहा है? विक्टोरिया ने अनुमानित लागत 6 बिलियन ऑस्ट्रेलियाई डॉलर (लगभग 4.9 बिलियन अमेरिकी डॉलर) बताई थी। ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है; 2015 में डरबन को 2022 के खेलों का मेज़बान चुना गया था, लेकिन 17 महीने बाद ही आर्थिक दिक्कतों के कारण दक्षिण अफ़्रीकी शहर से मेज़बानी छीन ली गई, जिसके बाद बर्मिंघम आगे आया। पिछले छह आयोजनों में से पाँच बार ये खेल या तो ब्रिटेन में हुए या ऑस्ट्रेलिया में। कॉमनवेल्थ गेम्स के फ़ायदों और एक मल्टी-स्पोर्ट इवेंट के तौर पर इसके अहम अनुभव को लेकर कुछ खास बातें कही जाती हैं, लेकिन इन खेलों की प्रासंगिकता पर भी सवाल उठ रहे हैं। ये खेल ब्रिटिश एम्पायर गेम्स से शुरू हुए थे और इसमें हिस्सा लेने वाले देश ब्रिटिश उपनिवेश रहे हैं। एशियाई गेम्स और यूरोपियन गेम्स जैसे क्षेत्रीय आयोजनों के कारण कॉमनवेल्थ गेम्स की अहमियत पर सवाल उठते हैं। तो सवाल यह है कि क्या देश अब भी उपनिवेशों के तौर पर अपनी पहचान दिखाना चाहते हैं या अब कॉमनवेल्थ गेम्स को खत्म करने का समय आ गया है?