Middle East में बढ़ा तनाव, Crude Oil की कीमतों से Corporate India पर मंडराया बड़ा आर्थिक संकट।

By Ankit Jaiswal | Mar 02, 2026

मिडिल ईस्ट में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच भारत की कई बड़ी लीस्टेड कंपनियां अपने क्षेत्रीय जोखिम का आकलन करने में जुटी हैं। अमेरिका और इजरायल के ईरान पर हमलों के बाद हालात संवेदनशील बने हुए हैं। मौजूद जानकारी के अनुसार इंफ्रास्ट्रक्चर, एविएशन, ऊर्जा, उपभोक्ता वस्तुएं, लॉजिस्टिक्स और फार्मा समेत 30 से अधिक कंपनियां प्रत्यक्ष या परोक्ष जोखिम के दायरे में आ सकती हैं।

गौरतलब है कि मिडिल ईस्ट भारत के कुल माल निर्यात का लगभग 17% हिस्सा लेता है और कुल कच्चे तेल की 55% आपूर्ति करता है। इसके अलावा, भारत को मिलने वाले रेमिटेंस का बड़ा हिस्सा भी इसी क्षेत्र से आता है। ऐसे में संघर्ष लंबा खिंचता है तो इसका असर चालू खाते के घाटे और महंगाई दोनों पर पड़ सकता है।

तेल विपणन कंपनियां सबसे पहले झटका महसूस कर रही हैं। हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड, इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड और भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड जैसी कंपनियों के मार्जिन पर सीधा असर पड़ता है। ब्रेंट में हर एक डॉलर की बढ़ोतरी से इनके ईबीआईटीडीए में 7-9% तक गिरावट आ सकती है, यदि खुदरा कीमतों में बदलाव न किया जाए।

इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में लार्सन और टुब्रो का मिडिल ईस्ट एक्सपोजर सबसे ज्यादा है, जहां उसका बड़ा ऑर्डर बुक निर्भर है। इसके अलावा केईसी इंटरनेशनल और कल्पतरु प्रोजेक्ट्स इंटरनेशनल लिमिटेड की परियोजनाएं भी क्षेत्रीय स्थिरता पर निर्भर हैं। समुद्री मार्गों में रुकावट से प्रोजेक्ट निष्पादन और लागत दोनों प्रभावित हो सकते हैं।

एविएशन सेक्टर भी दबाव में है। इंडिगो की अंतरराष्ट्रीय क्षमता का बड़ा हिस्सा मिडिल ईस्ट से जुड़ा है। हवाई क्षेत्र में प्रतिबंध और एटीएफ कीमतों में वृद्धि दोहरा असर डाल सकती है। एयरपोर्ट और पोर्ट ऑपरेटर जैसे अदानी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन लिमिटेड और जीएमआर एयरपोर्ट्स लिमिटेड को भी माल ढुलाई और यात्री ट्रैफिक में गिरावट का जोखिम है।

गैस वितरण कंपनियां जैसे इंद्रप्रस्थ गैस लिमिटेड और गुजरात गैस लिमिटेड एलएनजी कीमतों में उछाल से प्रभावित हो सकती हैं। उर्वरक कंपनियों के लिए भी वैश्विक यूरिया कीमतों में बढ़ोतरी सब्सिडी बोझ बढ़ा सकती है।

उपभोक्ता और फार्मा सेक्टर की कई कंपनियों का 5-10% राजस्व मिडिल ईस्ट से आता है। ऑटो और टायर कंपनियों पर कच्चे तेल से जुड़े इनपुट कॉस्ट और फ्रेट चार्ज का दबाव बढ़ सकता है।

हालांकि इस पूरे परिदृश्य में डिफेंस सेक्टर संभावित लाभार्थी के रूप में उभर रहा है। रक्षा बजट में लगातार बढ़ोतरी और भू-राजनीतिक अस्थिरता के कारण भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड, हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड और डेटा पैटर्न्स इंडिया लिमिटेड जैसी कंपनियों के लिए अवसर बढ़ सकते हैं।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि होर्मुज कितने समय तक सुरक्षित और खुला रहता है। यदि आपूर्ति लंबे समय तक बाधित होती है तो यह केवल शेयर बाजार की अस्थायी गिरावट नहीं, बल्कि व्यापक आर्थिक दबाव का संकेत हो सकता है और कॉरपोरेट इंडिया के लिए यह दौर एक गंभीर परीक्षा साबित हो सकता है।

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