By अभिनय आकाश | Oct 10, 2026
आंदोलनजीवी शब्द आखिर आया कहाँ से और यह किसी आधिकारिक सरकारी दस्तावेज़ में कैसे दर्ज हो गया? यह तीखा सवाल किसी राजनीतिक मंच पर नहीं, बल्कि इलाहाबाद हाईकोर्ट की उस पीठ ने उठाया है जो पत्रकार सत्यम वर्मा पर लगे राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) की वैधता परख रही है। मामला अप्रैल 2026 में नोएडा के मज़दूर आंदोलन से जुड़ा है, जहाँ न्यूनतम वेतन की मांग को लेकर 8 अप्रैल से शुरू हुआ प्रदर्शन 13 अप्रैल तक आते-आते पथराव और हिंसा में बदल गया। इसके चार दिन बाद 17 अप्रैल को यूपी पुलिस ने हिंसा भड़काने के आरोप में पत्रकार सत्यम वर्मा को गिरफ्तार किया और फिर 12 मई को गौतमबुद्ध नगर की ज़िलाधिकारी मेधा रूपम ने उन पर रासुका (NSA) तामील कर दिया। डीएम मेधा रूपम खुद चर्चा के केंद्र में हैं। एक तरफ पत्रकार पर सख्त कार्रवाई को लेकर, तो दूसरी तरफ उनकी पहचान मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की बेटी के रूप में भी है, जो पहले से ही चुनाव आयोग की प्रक्रियाओं को लेकर विपक्ष के निशाने पर हैं। जब सत्यम की हिरासत को जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की खंडपीठ में चुनौती दी गई, तो 8 अक्टूबर को फैसला सुरक्षित रखते हुए अदालत ने सीधे प्रशासन की मंशा और शब्दावली पर ही सवाल दाग दिए।
याचिका में हिरासत आदेश और उसके परिणामस्वरूप पारित आदेशों को रद्द करने के साथ-साथ सत्यम वर्मा की तत्काल रिहाई तथा कथित अवैध हिरासत के लिए मुआवजे की मांग की गई है। याचिका का मुख्य आधार यह है कि हिरासत आदेश इस तथ्यात्मक रूप से असंभव धारणा पर आधारित था कि सत्यम वर्मा 13 अप्रैल 2026 को नोएडा में हिंसा में शामिल थे। याचिका के अनुसार, सीसीटीवी फुटेज और कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर) से पता चलता है कि वर्मा उस दिन लगभग 500 किलोमीटर दूर लखनऊ में थे, जहां उन्हें उसी दिन दोपहर 2:14 बजे हसनगंज पुलिस ने कथित तौर पर हिरासत में लिया था।
पीठ ने सवाल किया कि इस प्रकार की शब्दावली आधिकारिक सरकारी हिरातस दस्तवेज में कैसे आई। साथ ही, एनएसए के तहत हिरासत के आधारों को लेकर अलग से उल्लेख किया गया। बेंच ने सवाल किया कि केवल एक विशेष विचारधारा को धारण करना या साहित्य रखना निवारक हिरासत का आधार कैसे बन सकता है।
8 फरवरी 2021 की बात है। देश के पीएम नरेंद्र मोदी राज्यसभा में खड़े थे। राष्ट्रपति के अभिभाषण धन्यवाद प्रस्ताव पर बोलने के लिए। पीएम मोदी ने उस दिन कहा हम लोग कुछ शब्दों से परिचित हैं। श्रमजीवी, बुद्धिजीवी यह सारे शब्द से हम सब परिचित हैं। लेकिन मैं देख रहा हूं कि पिछले कुछ समय से देश में एक नई जमात पैदा हुई है। एक नई बिरादरी सामने आई है और वो है आंदोलनजीवी। ये जमात आप देखेंगे। वकीलों का आंदोलन है। वहां नजर आएंगे। स्टूडेंट्स का आंदोलन है। वहां नजर आएंगे। मजदूरों का आंदोलन है। वो वहां नजर आएंगे। कभी पर्दे के पीछे तो कभी पर्दे के आगे। यह पूरी टोली है जो आंदोलनजीवी है। यह आंदोलन के बिना जी नहीं सकते हैं और आंदोलन से जीने के लिए जीने के रास्ते ढूंढते रहते हैं। नरेंद्र मोदी देश की संसद में जब यह बयान दे रहे थे तब दिल्ली की सीमाओं पर किसान बैठे हुए थे। केंद्र सरकार के तीन कृषि कानूनों के खिलाफ धरना चल रहा था। पीएम ने इस बयान के करीब 8 महीने बाद खुद ही तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने का ऐलान किया था और किसानों से आंदोलन खत्म करने की अपील की थी। इस संदर्भ के साथ पहली बार देश की संसद में नरेंद्र मोदी ने आंदोलनजीवी शब्द उछाला।