आतंकवाद और पाकिस्तान- चीन से दो टूक बात करने का समय आ गया

By संतोष कुमार पाठक | Jun 12, 2025

भारत और चीन के रिश्तों के लिहाज से यह सप्ताह बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण होने जा रहा है। लेकिन उससे पहले जम्मू कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले और उसके बाद भारत की बहादुर सेना द्वारा चलाए गए ऑपरेशन सिंदूर के बारे में भी बात करना जरूरी है। भारत के सर्वदलीय सांसदों के प्रतिनिधिमंडल में शामिल 59 नेताओं और पूर्व राजनयिकों ने 33 देशों की यात्रा से वापस लौटने के बाद मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की।

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पाकिस्तान, अमेरिका और आतंकवाद इन तीनों के आपसी संबंधों की कहानी किसी से छिपी नहीं है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने हाल ही में स्काई न्यूज के साथ एक इंटरव्यू के दौरान बस अमेरिका की भूमिका पर फिर से मुहर लगाने का काम कर दिया था। ख्वाजा आसिफ के शब्दों पर गौर कीजिएगा। उन्होंने कहा था कि, “हम करीब तीन दशक से अमेरिका और ब्रिटेन समेत पश्चिमी देशों के लिए यह गंदा काम (आतंकवाद का समर्थन) कर रहे हैं। यह एक गलती थी और हमें इसकी कीमत चुकानी पड़ी, इसीलिए आप मुझसे यह कह रही हैं। अगर हम सोवियत संघ के खिलाफ युद्ध में और 9/11 के बाद की जंग में शामिल नहीं होते, तो पाकिस्तान का ट्रैक रिकॉर्ड बेदाग होता।”

जहां तक अमेरिका की बात है, वहां के नए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के रवैए से उसकी पोल लगातार खुल रही है। पाकिस्तान पर एक के बाद एक अमेरिका जिस तरह की मेहरबानी कर रहा है,वह भी पूरी दुनिया देख रही है। लॉस एंजिल्स में जो कुछ हुआ उसके बाद अमेरिकी जनता को भी अहसास होने लगा है कि उन्होंने कितनी बड़ी गलती कर दी है।

भारत अमेरिकी संबंधों में मचे घमासान के बीच अब हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता अपने सीमाओं की सुरक्षा और पड़ोसी देशों से बेहतर तालमेल स्थापित करना होना चाहिए। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए अब पड़ोसी चीन से दो टूक भाषा में बात करने का समय आ गया है। चीन पाकिस्तान को हर तरह की ना केवल मदद मुहैया करा रहा है बल्कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य देश होने के नाते आतंकवादी संगठनों, आतंकवादियों और पाकिस्तान के लिए ढाल का काम भी कर रहा है। चीन पाकिस्तान के बाद श्रीलंका, म्यामांर , बांग्लादेश और नेपाल के सहारे भी भारत की घेरेबंदी कर रहा है। आखिर भारत इसे कब तक बर्दाश्त कर सकता है ? 

बताया जा रहा है कि, चीन के उप विदेश मंत्री सुन वेईडोंग इस सप्ताह भारत की यात्रा पर आ सकते हैं। इस साल दोनों देशों के बीच यह दूसरी उच्चस्तरीय यात्रा होगी। इससे पहले, भारत के विदेश सचिव विक्रम मिसरी जनवरी में चीन की यात्रा पर गए थे। वहां सुन और मिसरी ने आपसी रिश्तों को सामान्य करने के लिए कई मुद्दों पर सहमति जताई थी। लेकिन पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद जिस तरह से चीन ने खुलकर पाकिस्तान का साथ दिया। उसके बाद से अब माहौल काफी बदल गया है।

भारतीय बाजार के बल पर अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने वाले चीन से अब यह तो पूछा ही जाना चाहिए कि वह पाकिस्तान के रास्ते पर क्यों चलना चाहता है? पाकिस्तान तो आतंकवाद को पालते-पालते एक असफल देश बन चुका है लेकिन चीन जैसे बड़े देश की आखिर क्या मजबूरी है कि उसे आतंकवादियों का साथ देना पड़ रहा है। भारत और चीन के बीच आपस में विवाद है, यह एक कड़वी सच्चाई है लेकिन दुनिया के दो प्रभावशाली और बड़े देश होने के नाते इसे सुलझाने के कई तरीके हो सकते हैं। बातचीत से अगर ये मामले सुलझ जाए तो इससे बेहतर कुछ और नहीं हो सकता लेकिन क्या चीन की सेना इतनी कमजोर हो चुकी है कि अब उसे भी भारत को परेशान करने के लिए पाकिस्तान जैसे नाकाम देश और आतंकवादियों का सहारा लेने की जरूरत पड़ रही है ? 

वक्त आ गया है कि भारत को अब दो टूक शब्दों में चीन से इन सवालों का जवाब मांगना ही चाहिए क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं ही यह कह चुके हैं कि आतंकवाद और व्यापार एक साथ नहीं चल सकते। आतंकवाद के प्रति जीरो टॉलरेंस की यह नीति सिर्फ पाकिस्तान के साथ ही नहीं अपनानी चाहिए बल्कि हर उस देश के साथ अपनानी चाहिए जो किसी भी सूरत में आतंकवादियों का बचाव करता है। भारत को यह कठोर संदेश भारत यात्रा पर आने वाले चीन के उप विदेश मंत्री सुन वेईडोंग के जरिए चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग तक भेजना ही चाहिए।

- संतोष कुमार पाठक

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं।

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