By उमेश चतुर्वेदी | Apr 23, 2026
प्रधानमंत्री रहते अटल बिहारी वाजपेयी ने कोलकाता की यात्रा की थी। उस दौरे पर उन्होंने तत्कालीन रेल मंत्री के कालीघाट स्थित घर का दौरा किया था। तब उन्होंने मंत्री की मां से उलाहना दिया था, आपकी बेटी मुझे बहुत परेशान करती हैं। कहना न होगा कि वह शख्सियत डेढ़ दशक से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री है। ममता बनर्जी लड़ाका है। धूल से उठकर राजनीतिक आसमान का तारा अगर वे बनी हुई हैं, उसकी वजह उनका सघर्षशील व्यक्तित्व ही है। लेकिन कोलकाता के मैदान में इस बार यह योद्धा फंसा नजर आ रहा है। भारतीय जनता पार्टी जिस तरह उनसे दो-दो हाथ कर रही है, निश्चित तौर पर उसके पीछे नरेंद्र मोदी की अगुआई में बंगाल की धूल में लगातार परिश्रम कर रहे बीजेपी के कार्यकर्ता हैं। आज अगर बंगाली की सियासी लड़ाई आर-पार के दौर में आ चुकी है तो इसके पीछे अमित शाह की रणनीति काम कर रही है।
साल 2021 में राज्य में तृणमूल कांग्रेस को 213 सीटें और करीब 44 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि बीजेपी को 38 प्रतिशत वोट के साथ 77 सीटों पर संतोष करना पड़ा था। हालांकि 2016 के विधानसभा चुनावों के मुकाबले देखें तो पार्टी ने तीन सीट और करीब 28 प्रतिशत वोट की तुलना में बड़ी छलांग लगाई। अमित शाह ने इसी बुनियाद को मजबूत करते हुए आगे बढ़ने की रणनीति बनाई। इसके तहत उन्होंने दो बातों पर जोर दिया। उन्होंने उन गढ़ों को और मज़बूत बनाने की रणनीति बनाई, जहां पहले से ही पार्टी मजबूत स्थिति में है। इसके साथ ही उन चुनाव क्षेत्रों में आधार बढ़ाने की कोशिश तेज की, जहां 2021 में वह बहुत कम अंतर से हारी थी। इसके साथ ही अमित शाह ने पार्टी के भीतर की गुटबाज़ी को भी सुलझाने की कोशिश की। राज्य में पार्टी के अध्यक्ष रहे दिलीप घोष के बारे में माना जा रहा था कि वे नाखुश हैं। अमित शाह ने उनसे मुलाकात करके तृणमूल से आए शुभेंदु अधिकारी से बीच उनके मतभेदों को दूर करने की कोशिश की।
ममता बनर्जी ने पिछली बार बंगाली माटी और मानुष यानी स्थानीय को मुद्दा बनाया था। उन्हें इस मुद्दे से पिछली बार मदद भी मिली। इस बार भी ममता विपक्ष यानी बीजेपी के नेताओं के बाहरी होने का आरोप लगा रही हैं। इसके जवाब स्वरूप अमित शाह ने ऐलान किया है कि अगर पश्चिम बंगाल में पार्टी सत्ता में आई तो राज्य का मुख्यमंत्री ‘धरती का बेटा’ यानी स्थानीय व्यक्ति ही बनेगा। पार्टी ने इस बार घुसपैठ को भी बड़ा मुद्दा बनाया है। राज्य में विशेष पुनरीक्षण अभियान के दौरान राज्य में नब्बे लाख वोटरों के नाम हटाने को लेकर ना सिर्फ सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस समेत समूचा गैर बीजेपी दल मुद्दा बना रहे हैं। हालांकि अमित शाह चुनाव आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान यानी एसआईआर के कदम को सही बताया है। बीजेपी यहीं नहीं रूकी है, उसने वादा किया है कि अगर वह सत्ता में आई तो राज्य से अवैध घुसपैठियों की पहचान करेगी और उन्हें बाहर करेगी। इसके साथ ही पार्टी ने सत्ता में आने के पैंतालीस दिनों के अंदर सीमा पर बाड़ लगाने के लिए केंद्र सरकार को जमीन देगी। बीजेपी ने इसके जरिए बांग्लादेश की ओर हो रही पशु तस्करी को रोकने का भी ऐलान किया है।
राज्य में भ्रष्टाचार को भी बड़ा मुद्दा बनाने में बीजेपी कामयाब रही है। इसमें अतीत में हुई भ्रष्टाचार की घटनाओं ने मदद की है। यहां का शिक्षक भर्ती घोटाला रहा, जिसकी सुनवाई करते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट ने 26 हजार नौकरियां रद्द कर दी थी। इसके साथ ही राशन और मिड-डे मील, मनरेगा A जॉब कार्ड घोटाला भी सुर्खियां बनता रहा है। बीजेपी ने इस बार इसे भी मुद्दा बनाया है। इन मामलों में तृणमूल के बीस से ज्यादा नेताओं को जेल भेजा गया। हालांकि तृणमूल कांग्रेस इसे केंद्र की बदले की कारर्वाई बताती रही है। यही वजह है कि पार्टी ने दागी नेताओं को टिकट भी दिया है। इसकी वजह से भद्रलोक के बीच तृणमूल को सवालों के घेरे में लाने की पुरजोर कोशिश अमित शाह और उनकी बीजेपी कर रही है।
ऐसे ढेरों मामले हैं, जिनकी वजह से बीजेपी सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस को जबरदस्त चुनौती देती नजर आ रही है। इसका मतलब यह नहीं है कि तृणमूल कांग्रेस ने सरेंडर कर दिया है। ममता की अगुआई में पार्टी अब भी पुरजोर तरीके से मैदान में खड़ी है। इस वजह से इस बार भी मुकाबला सीधे तौर पर ममता बनाम बीजेपी ही नजर आ रहा है। हालांकि सही तौर पर कहें तो इस बार मुकाबला ममता बनाम अमित शाह है। इस जंग में अमित शाह सफल होंगे या ममता एक बार फिर उन्हें मात देने में कामयाब रहेंगी, यह तो चार मई को मतगणना के बाद ही पता चल पाएगा।
- उमेश चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं