जनहित के नाम पर रखी गई कुर्सी (व्यंग्य)

By डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त' | Jan 06, 2026

बृजमोहन लाल की कुर्सी बहुत पुरानी थी। इतनी पुरानी कि उस पर बैठते ही आदमी इतिहास में चला जाता था। कुर्सी जानती थी कि उस पर कौन क्यों बैठा है। बृजमोहन लाल कहते थे—“मैं जनहित में बैठा हूँ।”

वे जब भी उठते, कुर्सी को देखकर कहते—“बस पाँच मिनट।”

पाँच मिनट वर्षों में बदल जाते। कुर्सी उनके शरीर की तरह थी—अगर अलग कर दी जाए तो पहचान खत्म हो जाए। लोग उन्हें आदमी नहीं, पद के नाम से जानते थे।

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एक दिन सरकार ने आदेश निकाला—

“अब कुर्सियाँ बदली जाएँगी।”

बृजमोहन लाल परेशान हो गए। उन्होंने जनहित का हवाला दिया। बोले—

“अचानक बदलाव से व्यवस्था चरमरा जाएगी।”

व्यवस्था ने सिर हिलाया—वह पहले से चरमराई हुई थी।

बृजमोहन लाल ने तुरंत एक जनहित याचिका दायर की—

“जनहित बनाम कुर्सी परिवर्तन”

अदालत गंभीर हो गई। मामला बड़ा था। कुर्सी बीच में थी।

सुनवाई के दौरान बृजमोहन लाल बोले—

“मैं इस कुर्सी पर नहीं, इस कुर्सी के लिए बैठा हूँ।”

कुर्सी भावुक हो गई।

जनता भ्रमित।

मीडिया ने हेडलाइन चलाई—

“ईमानदार अफ़सर का संघर्ष”

संघर्ष किससे था, यह स्पष्ट नहीं किया गया।

कुछ महीने बीत गए। आदेश ठंडे बस्ते में चला गया।

बृजमोहन लाल की कुर्सी और चमकने लगी। अब उस पर गद्दी लग गई थी—जनहित की।

एक दिन अचानक बृजमोहन लाल रिटायर हो गए।

कुर्सी खाली रह गई—पहली बार।

कमरे में सन्नाटा था।

नया आदमी आया।

वह भी कुर्सी पर बैठा।

कुर्सी मुस्कुराई।

क्योंकि जनहित कभी कुर्सी पर नहीं बैठता—

वह सिर्फ़ बैठाया जाता है।

- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’,

(हिंदी अकादमी, मुंबई से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

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