अदालतों से फटकार खाकर भी नहीं सुधर रही देश की पुलिस

By योगेंद्र योगी | Apr 21, 2025

नेताओं की हाथों की कठपुतली बनी पुलिस प्रणाली देश के आम लोगों का विश्वास जीतने में पूरी तरह नाकाम रही है। पुलिस का आचरण और व्यवहार आजादी के बाद भी सामंती बना हुआ है। अपराध रोकने की जिम्मेदारी निभाने वाली पुलिस के अपराधियों की तरह आचरण करने से वर्दी दागदार हो रही है। पुलिस राज्यों के अधिकार क्षेत्रों में होने के कारण सत्तारुढ़ दलों के इशारों के बगैर काम नहीं करती है। ऐसे ही हालात पुलिस पर पक्षपात करने के जिम्मेदार हैं। अधिनस्थ से लेकर देश की शीर्ष अदालत कई बार पुलिस की कारगुजारियों को उजागर किया है। इसके बावजूद पुलिस के रवैये में कोई खास बदलाव नहीं आया है। सुप्रीम कोर्ट ने दीवानी मामले में आपराधिक कानून लगाने पर उत्तरप्रदेश (यूपी) पुलिस को फटकार लगाई। अदालत ने कहा कि यूपी पुलिस की ओर से दीवानी मामलों में दर्ज की गईं प्राथमिकियों पर गौर करने से पता चलता है कि राज्य में कानून का शासन पूरी तरह ध्वस्त हो गया है।   

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भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ का हिस्सा रहे न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला ने कोलकाता चिकित्सक के बलात्कार-हत्याकांड की सुनवाई के दौरान कहा था कि कोलकाता पुलिस ने इस मामले को जिस तरह से संभाला, वह कुछ ऐसा है जो उन्होंने अपने जीवन के 30 वर्षों में नहीं देखा। शीर्ष अदालत ने अप्राकृतिक मौत के मामले के पंजीकरण में देरी की आलोचना की। पुलिस की मौजूदा कार्यप्रणाली को लेकर देश में कई सुधार करने के प्रयास हुए हैं, किन्तु सत्तारुढ़ दलों के नेताओं ने ऐसे प्रयासों को नाकाम करने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी। स्वतंत्रता के बाद से ही, इस व्यवस्था में सुधार की मांग उठती रही है, क्योंकि यह भ्रष्टाचार, अकुशलता और जनता में अविश्वास का कारण बनी हुई है।   

पुलिस सुधारों के लिए कई आयोगों और समितियों का गठन किया गया। राष्ट्रीय पुलिस आयोग (1977-1981) और वर्ष 1971 में बनी गोर समिति की रिपोर्ट की सिफारिशें धूल खा रही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी वर्ष २००६ में प्रकाश सिंह मामले में पुलिस सुधारों पर कई निर्देश दिए। जिनमें यह भी शामिल था कि राज्य पुलिस प्रमुखों का दो वर्ष का निश्चित कार्यकाल होगा। निर्देशों में राज्य सुरक्षा आयोगों की स्थापना, वरिष्ठ अधिकारियों के लिये निश्चित कार्यकाल और कानून एवं व्यवस्था से जाँच को अलग करना शामिल था। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की भी राज्यों ने पालना नहीं की। इसे देश के सभी राज्यों ने या तो लागू नहीं किया या फिर निर्देशों को आधे-अधूरे तरीके से लागू किया गया ताकि पुलिस में सत्तारुढ़ दलों का हस्तक्षेप पूरी तरह से बना रह सके। इन सिफारिशों को लागू नहीं करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है।   दिल्ली की वर्ष 2019 की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि 72 प्रतिशत पुलिस अधिकारियों ने मामलों की जाँच करते समय राजनीतिक दबाव का अनुभव किया है। पुलिस प्राय: अत्यधिक बल का प्रयोग करती है, विशेषकर विरोध प्रदर्शनों और नागरिक अशांति से निपटने में। अप्रैल, 2017 से मार्च, 2022 तक पिछले पाँच वर्षों में देश भर में पुलिस हिरासत में मौत के कुल 669 मामले दर्ज किये गए।  इसके अलावा, भारत में अपराध विज्ञान के क्षेत्र में इतने सारे अवसर होने के बावजूद, प्रति 0.1 मिलियन जनसंख्या पर केवल 0.33 फोरेंसिक वैज्ञानिक हैं, जबकि विदेशों में प्रति 0.1 मिलियन जनसंख्या पर 20 से 50 वैज्ञानिक हैं। पुलिस अधिकारियों का अपर्याप्त प्रशिक्षण इस मुद्दे को और भी गंभीर बना देता है।   

एक रिपोर्ट में पाया गया कि देश में 11 राज्य पुलिस कर्मियों के लिये केवल एक कंप्यूटर/लैपटॉप था, जबकि कुछ बड़े राज्यों में वर्ष 2022 में 30 या उससे अधिक कर्मियों के लिये केवल एक प्रणाली थी। केंद्र सरकार द्वारा महिलाओं की संख्या बढ़ाने के लगातार प्रयासों के बावजूद देश में पुलिस बलों में केवल 11.75 प्रतिशत महिलाएँ हैं। प्रतिनिधित्व की यह कमी महिलाओं को अपराधों की रिपोर्ट करने से हतोत्साहित करती है और लिंग आधारित हिंसा के मामलों को ठीक से नहीं निपटा पाती। पुलिस अधिकारी कानून प्रवर्तन से लेकर चुनाव ड्यूटी तक अनेक भूमिकाएँ निभाते हैं, लेकिन उन्हें पर्याप्त आराम या उचित पारिश्रमिक नहीं मिलता। कम वेतन से व्यावसायिकता हतोत्साहित होती है और भ्रष्टाचार की संभावना बढ़ती है, जिससे जनता का विश्वास प्रभावित होता है।   

पुलिस कार्यों में राजनीतिक हस्तक्षेप ने व्यावसायिकता और स्वतंत्रता को समाप्त कर दिया है। बार-बार स्थानांतरण, राजनीतिक विरोधियों के विरुद्ध कार्रवाई करने का दबाव और जाँच एजेंसियों के दुरुपयोग ने कानून प्रवर्तन की विश्वसनीयता को कमज़ोर कर दिया है। राजद्रोह कानूनों का मनमाना प्रयोग तथा कार्यकर्ताओं और पत्रकारों की लक्षित गिरफ्तारियाँ इस बात को उजागर करती हैं कि पुलिसिंग प्राय: विधि के शासन के बजाय राजनीतिक हितों से प्रेरित होती है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल द्वारा वर्ष 2017 में कराए गए एक सर्वे के मुताबिक भारत में पुलिस विभाग सबसे ज्यादा भ्रष्ट है। अदालतों की समय-समय पर कड़ी फटकार के बावजूद देश में पुलिस का रवैया बदला नहीं है। यह सिलसिला तब तक जारी रहेगा, जब तक पुलिस नेताओं के हस्तक्षेप से मुक्त नहीं होगी।

- योगेन्द्र योगी

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