अदालत ने पूछा- क्या यूसीसी के लिव इन प्रावधान पर नए सुझाव मांग सकता है उत्तराखंड

By Prabhasakshi News Desk | Feb 28, 2025

नैनीताल । उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार से पूछा है कि क्या वह प्रदेश में हाल में लागू समान नागरिक संहिता (यूसीसी) पर नए सुझाव आमंत्रित कर सकती है और जहां भी आवश्यक हो, संशोधन करने पर विचार कर सकती है। उच्च न्यायालय के वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति मनोज तिवारी और न्यायमूर्ति आशीष नैथानी की खंडपीठ ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से यह सवाल बृहस्पतिवार को सहवासी (लिव—इन) संबंधों के बारे में यूसीसी के प्रावधानें को चुनौती देने वाली दो नयी याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान किया।

वीडियो कांफ्रेंस के जरिए सुनवाई में शामिल हुए मेहता ने इस सवाल के जवाब में कहा कि सभी सुझावों का हमेशा स्वागत है। मुख्य स्थायी वकील सी एस रावत के अनुसार, अदालत ने मौखिक रूप से सॉलिसिटर जनरल से राज्य विधानसभा से यूसीसी में आवश्यक संशोधन करने का आग्रह करने को भी कहा। उत्तराखंड में इस वर्ष 27 जनवरी से यूसीसी लागू हुआ है। अदालत ने मुख्य स्थायी वकील के जरिए राज्य सरकार से यह भी जानना चाहा कि क्या वह यूसीसी में आवश्यक बदलाव के लिए तैयार है।

जनहित याचिकाओं ने लिव—इन संबंधों के अनिवार्य पंजीकरण के समय युगल से मांगी जाने वाली सूचनाओं की संवैधानिकता को इस आधार पर चुनौती दी है कि इससे उनकी निजता का उल्लंघन होने की आशंका है। उच्च न्यायालय ने इस याचिका को भी पहले दायर अन्य याचिकाओं के साथ जोड़ दिया है जिन पर एक साथ एक अप्रैल को सुनवाई होनी है। अदालत ने राज्य सरकार को इस मामले में जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया है। जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय ने एक याचिकाकर्ता की वकील वृंदा ग्रोवर से पूछा कि क्या लिव—इन संबंधियों के अनिवार्य पंजीकरण के यूसीसी के प्रावधानों को गैर संवैधानिक के रूप में चुनौती दी जा सकती है।

अदालत ने कहा कि लिव—इन संबंधों की संख्या बढ़ती जा रही है लेकिन उन्हें पूरी सामाजिक स्वीकृति नहीं है। उसने कहा कि कानून केवल बदलते समय को समायोजित करने और लिव-इन संबंधों में रहने वाली महिलाओं और ऐसे संबंधों से पैदा हुए बच्चों के अधिकारों को सुरक्षा देने की बात कर रहा है। ग्रोवर ने कहा कि लिव—इन संबंधों के पंजीकरण से संबंधित यूसीसी के प्रावधानों से व्यक्तिगत जीवन में निगरानी और पुलिसिंग के जरिए घुसपैठ होगी। ग्रोवर ने उस प्रावधान पर सवाल उठाया जिसके तहत लिव—इन युगल द्वारा अनिवार्य पंजीकरण के समय उपलब्ध कराई गयी जानकारी तत्काल पुलिस को दे दी जाएगी।

उन्होंने कहा कि उल्लंघन के मामलों में पुलिस को उचित कार्रवाई करने का अधिकार होगा लेकिन अधिनियम में उचित कार्रवाई को परिभाषित नहीं किया गया है। ग्रोवर ने यूसीसी के तहत के तहत महिलाओं से यह पूछे जाने के औचित्य पर भी सवाल उठाया कि क्या वे लिव-इन संबंध को खत्म कर रही हैं और क्या वे गर्भवती हैं। उन्होंने कहा कि यह उनकी निजता का उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि ऐसे प्रावधान महिलाओं को सुरक्षा देने की बजाय उनकी स्थिति और खराब कर सकते हैं क्योंकि अधिकारियों के पास उनका निजी विवरण होने से उनका उत्पीड़न हो सकता है।

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